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दूध जो महीनों ख़राब नहीं होता है!
- Author, वेरोनिक ग्रीनवुड
- पदनाम, बीबीसी फ़्य़ूचर
दूध आम तौर पर ज्यादा दिनों तक नहीं चलता. ख़राब हो जाता है. दूध का पास्चराइजेशन किया जाता है, ताकि इसमें मौजूद बैक्टीरिया खत्म हो जाएं.
लेकिन ये दूध भी ज्यादा दिनों तक नहीं चलता. फ्रिज में रखने के बावजूद ये कुछ ही दिनों में ख़राब हो जाता है.
लेकिन पिछले पचास-साठ सालों से ऐसा दूध बेचा जा रहा है, जो बिना फ्रिज में रखे हुए भी हफ्तों नहीं, महीनों तक ख़राब नहीं होता.
वैक्स पेपर से बने डिब्बों में बंद करके बेचे जाने वाले इस दूध को कई तरह से 'ट्रीट' किया जाता. इस खास ट्रीटमेंट के कुछ असर तो हमें पता हैं, मगर कुछ जानकारियां तो वाक़ई हैरान करने वाली हैं.
इस दूध को UHT या अल्ट्रा हीट ट्रीटेड मिल्क के नाम से बेचा जाता है. इसे खराब होने से बचाने के लिए जिस प्रक्रिया से गुजारा जाता है वो बेहद मुख्तसर सी होती है.
इसके मुकाबले पास्चराइज़ेशन में काफ़ी वक़्त लगता है. पास्चराइज़ेशन का नाम इसे ईजाद करने वाले वैज्ञानिक लुई पास्चर के नाम पर पड़ा था.
इसमें दूध को क़रीब पंद्रह सेकेंड तक 72 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है. फिर इसे ठंडा किया जाता है. इससे दूध के सभी बैक्टीरिया तो नहीं मरते.
ख़ास तौर से वो बैक्टीरिया जो इंसान को नुक़सान नहीं पहुंचाते, वो नहीं मरते. इस दूध को फ्रिज में रखकर कुछ दिनों में इस्तेमाल करना होता है.
अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजलैंड में इस्तेमाल होने वाला ज़्यादातर दूध ऐसा ही होता है.
लेकिन बहुत से यूरोपीय देशों में UHT दूध बेचा जाता है. इस दूध को दोगुने तापमान यानी 140 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है, वो भी केवल तीन सेकेंड के लिए.
बेहद अधिक तापमान की वजह से दूध में मौजूद सारे बैक्टीरिया मर जाते हैं. यानी गर्म करने से जो दूध मिलता है वो कीटाणुरहित होता है. इसे साफ-सुथरे पैकेट में बंद किया जाता है.
जब तक पैकेट नहीं खोला जाता, ये दूध ख़राब हो ही नहीं सकता.
ऐसा नहीं है कि इस दूध के साथ आप कोई भी खिलवाड़ कर सकते हैं. ये बीस से तीस डिग्री सेल्सियस में ही बचा रह सकता है.
इसीलिए जब इसे पैक करके दूसरे देशों में भेजा जाता है, तो कई बार ऐसा होता है कि भयंकर गर्मी की वजह से इसमें मौजूद कीटाणु के स्पोर या बीजाणु सक्रिय हो उठते हैं.
ऐसी हालत में जब आप इसका पैकेट खोलते हैं तो लगता है कि ये जेली या दही की तरह जम गया है.
इसकी वजह दूध को गर्म करने से इसमें केमिकल रिएक्शन होता है. जब दूध को 140 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किया जाता है, तो इसमें मौजूद व्हे प्रोटीन के थक्के बन जाते हैं.
इसी तरह गर्म होने की वजह से दूध में 'मेललार्ड रिएक्शन' नाम का केमिकल रिएक्शन होता है.
ये वही केमिकल रिएक्शन है जिससे कैरामेल, या भूनने से भूरे हुए टोस्ट का स्वाद बेहतरीन लगता है.
जब दूध को गर्म करते हैं तो इसमें मौजूद प्रोटीन और शुगर के बीच 'मेललार्ड रिएक्शन' होता है. कई एंजाइम भी बिखर जाते हैं.
हालांकि बेहद जरूरी एंजाइम प्लाज़्मिन पर दूध को गर्म करने का असर नहीं होता. मगर 'मेललार्ड रिएक्शन' से सल्फर के कई रूप बनते हैं, जिससे ट्रीटमेंट के बाद दूध में हल्का गाढ़ापन और थक्के जैसे बनने लगते हैं.
दूध से अंडे वाली बू आने लगती है. हालांकि एक हफ्ते में ये बू पूरी तरह से गायब हो जाती है.
गर्म होने के बाद प्लाज़्मिन एंजाइम सक्रिय हो जाता है. ये दूध में मौजूद प्रोटीन को कई हिस्सों में बांटने का काम करता है.
जिससे वो एक दूसरे से चिपकने लगते हैं. इसी वजह से दूध में हल्के थक्के से पड़ जाते हैं. शायद 'मेललार्ड रिएक्शन' की वजह से ही UHT दूध में मिठास ज़्यादा होती है.
ये पास्चराइज़्ड दूध से ज़्यादा सफ़ेद भी होता है. शायद गर्म होने की वजह से दूध की व्हे प्रोटीन और दूसरी चीज़ें चमकने लगती हैं.
सल्फ़र की वजह से दूध का स्वाद भी एकदम अलग लगता है.
वैसे तो सबको ये UHT दूध पसंद नहीं आता. मगर, कई देशों के बाजारों में इसकी भारी मांग है. चीन में इस दूध की मांग दस फ़ीसद सालाना की दर से बढ़ रही है.
चीन की भारी मांग की वजह से ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और जर्मनी के डेयरी उद्योग काफ़ी फल-फूल रहे हैं.
इस दूध की सबसे बड़ी कमी ये है कि इससे चीज़ नहीं बनाया जा सकता. वैज्ञानिकों ने कई बार इससे चीज़ बनाने की कोशिश की, मगर वो नाकाम ही रहे हैं.
क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के हिल्टन डीथ कहते हैं कि अगर हम इसे ज़्यादा वक़्त देंगे तो शायद UHT दूध से चीज़ भी तैयार हो जाए, मगर उसमें 11-12 घंटे का वक़्त लग सकता है.
रिसर्च से शायद ये वक़्त और कम किया जा सके. जिससे हम आगे चलकर अल्ट्रा हीट ट्रीटेड दूध से चीज़ बना सकें. मगर, इसमें आम चीज़ जैसा स्वाद शायद ही आए.
तब तक हमें इस दूध के बाक़ी तरह के इस्तेमाल से ही तसल्ली करनी होगी.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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