क्या आप फ़ोन पर बात करने से डरते हैं?

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बहुत से लोगों को फ़ोन पर बात करने से डर लगता है. फ़ोन की घंटी बजते ही वो परेशान हो जाते हैं.
आज मोबाइल फ़ोन के ज़माने में लोग अपने फ़ोन से चिपके रहते हैं. मगर इस दौर में भी बहुत से लोग हैं जो फ़ोन की आवाज़ से घबरा जाते हैं.
इस बीमारी को 'टेलीफ़ोबिया' नाम दिया गया है. तमाम देशों और समाज के लोग फ़ोन के डर के शिकार हैं.
'टेलीफ़ोबिया' के बीमार अनजान लोगों से भरे कमरे में भाषण देने से ज़रा भी नहीं कतराएंगे. मगर टेलीफ़ोन पर बात करना उन्हें डरा देता है.
जॉयबल नाम की कंपनी चलाने वाली जिल इज़ेनस्टैट कहती हैं कि फ़ोन पर बात करना लोगों के लिए बहुत पेचीदा मसला है. आपको चुटकियों में जवाब सोचना होता है. किसी की बात को लगातार ग़ौर से सुनना होता है.

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आज तमाम ऐसी तकनीकें आ गई हैं जो हमें फ़ोन के अलावा दूसरे ज़रियों से बातचीत करने का मौक़ा मुहैया कराती हैं. ऐसे में फ़ोन पर बात करने से डरने वालों को भी आसानी हो गई है.
मगर आज ज़िंदगी ऐसी हो गई है कि फ़ोन से दूरी बनाना मुमकिन नहीं. ऐसे में ज़रूरत 'टेलीफ़ोबिया' से छुटकारा पाने की है.
फिलहाल तो ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जो ये बताए कि दुनिया में कितने लोग इस बीमारी से परेशान हैं. लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो फ़ोन पर बात करने से घबराते हैं.
कई बार लोगों को इस वजह से अपने करियर में भारी नुक़सान भी उठाना पड़ता है. लोग लंबे वक़्त तक फ़ोन पर बात करने से कतराते रहते हैं. वो तभी बात करते हैं जब ऐसा करना उनके लिए मजबूरी बन जाए.

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वैसे 'टेलीफ़ोबिया' कोई नई बीमारी नहीं. 1986 में ही जॉर्ज डडली और शैनन गुडसन ने क़िताब लिखी थी, ''द साइकोलॉजी ऑफ सेल्स कॉल रिलक्टेंस''.
इसी तरह 1929 में ब्रिटिश कवि रॉबर्ट ग्रेव्स ने लिखा था कि उन्हें पहले विश्वयुद्ध में मिले ज़ख़्म के बाद फ़ोन पर बात करने से डर लगने लगा था. यानी 'टेलीफ़ोबिया', फ़ोन ईजाद होने के वक़्त की ही बीमारी है. हालांकि हाल के दिनों में स्मार्टफ़ोन के बढ़ते चलन की वजह से ये बीमारी भी काफ़ी नज़र आने लगी है.
इसकी वजह सिर्फ़ फ़ोन नहीं. कई बार अनजान लोगों से बात करने में हिचक या डर भी इसकी वजह होती है. किसी को नाराज़ करने का डर भी फ़ोन पर बात करने से हिचक पैदा करता है.
ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो फ़ोन पर बतियाते वक़्त हकलाने लगते हैं. उन्हें लगता है कि सामने वाले की नज़र में वो बुद्धू साबित हो रहे हैं. ऐसे लोग ई-मेल या टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए बात करने को तरजीह देने लगते हैं.

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सेल्स मार्केटिंग वालों को ट्रेनिंग देने वाले सेल्स ट्रेनर, जेफ़ शोर कहते हैं कि सेल्स वाले इसलिए फ़ोन पर बात करने से डरते हैं कि कहीं ग्राहक को नाराज़ न कर दें. वो लोगों की ज़िंदगी में दख़ल देने के डर से भी फ़ोन करने से कतराते हैं.
जापान जैसे कई देशों में किसी को नाराज़ करना बेहद बुरा माना जाता है. ऐसी सभ्यताओं में रहने वाले लोग किसी को नाराज़ करने के डर से भी फ़ोन पर बात नहीं करते.
इसी तरह इंडोनेशिया में लोग रोज़ाना सैकड़ों टेक्स्ट मैसेज करेंगे, मगर फ़ोन पर बात करने से गुरेज करेंगे. कई लोगों को ना सुनने से भी डर लगता है. इसलिए वो फ़ोन नहीं करना चाहते.
अब सवाल ये है कि इस बीमारी यानी 'टेलीफ़ोबिया' से निपटा कैसे जाए?
इसका सीधा सा जवाब है चुनौती का सामना करके. डर की आंखों में आंख डालकर बात करके.

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'टेलीफ़ोबिया' दूर करने में मदद करने वाले थेरेपिस्ट लोगों से पूछते हैं कि आख़िर उन्हें किस वजह से डर लगता है. उनके ज़हन में क्या ख़याल आते हैं?
फिर ऐसे हालात 'टेलीफ़ोबिया' के शिकार लोगों के इर्द-गिर्द पैदा किए जाते हैं, जिसके ज़रिए उन्हें समझाया जाता है कि ये इतनी बुरी बात भी नहीं, जितना वो डर रहे हैं. धीरे-धीरे लोग फ़ोन करने की हिचक से छुटकारा पाने लगते हैं.
शुरुआत पिज़्ज़ा ऑर्डर करने से होती है.
जेफ़ शोर कहते हैं कि फ़ोन पर बातचीत शुरू करने से पहले आपके दिमाग़ में एक प्लान होना चाहिए कि आने वाले हालात से कैसे निपटना है. किससे कैसे बात करनी है.
सेल्स वालों को ये तय कर लेना चाहिए कि वो लोगों को ये समझाएं कि उनकी बातचीत या उनके ऑफ़र से लोगों की ज़िंदगी बेहतर होगी. अगर आपकी बातचीत में सामने वाले के लिए दिलचस्प ऑफर नहीं है, तो बेहतर हो कि आप फ़ोन न ही करें.
आज के दौर में 'टेलीफ़ोबिया' की बीमारी आमतौर पर सेल्स से जुड़े लोगों में ही देखी और समझी गई है. मगर आम ज़िंदगी में भी लोग इसके शिकार होते हैं. जैसे कि वक़ील, सलाहकार और ऐसे बहुत से पेशेवर लोग जिनके लिए फ़ोन पर बात करना ज़रूरी होता है.
कई बार तो नौकरी के लिए इंटरव्यू भी फ़ोन पर होता है. अगर आप 'टेलीफ़ोबिया' के शिकार हैं तो ऐसे इंटरव्यू में आपके लिए दिक़्क़त हो सकती है.
हालांकि कई बार टीम मैनेजर, अपने मातहतों के ऐसे डर के साथ एडजस्ट कर लेते हैं. जैसे कि अमरीका की मौली ईरानी. वो अमरीका के कई शहरों में स्थित चाय-पानी रेस्टोरेंट की मैनेजर हैं. वो अपने 180 कर्मचारियों में से ज़्यादातर को मैसेज भेजकर बात करती हैं.

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मौली कहती हैं कि कई बार उनके मातहत उनसे बातचीत के लिए दिमाग़ी तौर पर तैयार नहीं होते. वो अचानक फ़ोन आने पर घबरा जाते हैं. इसीलिए वो मैसेज के ज़रिए उनसे अपनी बात कहती हैं. इससे उनके कर्मचारियों को भी सहूलत होती है.
'टेलीफ़ोबिया' की बीमारी इतनी बड़ी बीमारी भी नहीं कि उससे निपटा न जा सके. बस कोशिश की ज़रूरत होती है. हालांकि आज तकनीक से इतने ज़रिए मुहैया करा दिए हैं कि फ़ोन पर बात करने की मजबूरी ख़त्म होती जा रही है.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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