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स्वीडन कैसे बन गया जिहाद का निर्यातक?
- Author, याल्दा हक़ीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
स्वीडन एक शांतिप्रिय लोकतांत्रिक देश है और संकट में फंसे कई देशों के लोगों के लिए पनाह लेने की जगह भी रहा है.
इसके बावजूद यहां आकर शरण लेने वालों में कई लोग अपने देश लौट रहे हैं. यहां से तीन सौ से ज़्यादा लोग लड़ने के लिए सीरिया और इराक़ जा चुके हैं.
यूरोप को प्रति व्यक्ति के हिसाब से सबसे अधिक जिहादी निर्यात करने वाले देशों में एक स्वीडन है.
स्वीडन के दूसरे सबसे बड़े शहर गोटेनबर्ग के एक मकान के भूतल में बीबीसी संवाददाता की मुलाक़ात एक महिला से हुई. वह युवती मेक अप लगाए हुए थी, तंग कपड़ों में थी और पश्चिम की महिलाओं की तरह ही दिख रही थी.
लेकिन वे पिछले दिनों सीरियाई शहर रक्क़ा से लौट कर आई थी. उनके पति ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन की ओर से लड़ते हुए मारे गए थे.
जिहादी दुल्हन के रूप में सीरिया में देखे कुछ भयावह चीजों को वे अब भी याद करती हैं.
उनके बिल्कुल बगल के कमरे में एक यज़ीदी महिला के साथ बलात्कार होता रहा और उसकी चीखें उन्हें सुनाई पड़ती रहीं, ग़लती करने पर लोगों को चाबुक लगाए जाते थे या मौत के घाट उतार दिया जाता था, लगातार बमबारी और हवाई हमले होते रहते थे. ये सारी चीजें उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल थीं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब जिहादियों ने जोर्डन के पायलट को जिंदा जला दिया, मैंने पूछा था कि क्या यह इस्लाम के लिहाज़ से ठीक है? जहां तक मैं जानती थी किसी को जलाने की इजाज़त नहीं थी."
इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों की मदद से ही वे किसी तरह सीरिया की सीमा के पार तुर्की और वहां से स्वीडन पंहुचने में कामयाब रहीं.
वे कहती है, "आप जब इस तरह की जगह जाते हैं, आप दुनियादारी के बारे में नहीं सोचते. आप सिर्फ़ यह सोचते हैं कि किस तरह आप जल्दी से जल्दी मर जाएं और स्वर्ग पंहुच जाएं."
गोटेनबर्ग वह जगह है, जहां से अधिक जिहादियों की भर्ती की गई है. पांच लाख के इस शहर से कम से कम 100 लोगों ने चरमपंथियों के साथ मिल कर लड़ने का फ़ैसला किया.
गोटेनबर्ग स्वीडन के सबसे अधिक विविधता वाले शहरों में एक है. जनसंख्या का एक तिहाई हिस्सा अप्रवासी पृष्ठभूमि के लोगों का है, इनमें ज़्यादातर लोग मुसलमान हैं. उत्तर पूर्वी उपनगर एंगर्ड में तो ऐसे लोगों की तादाद 70 फ़ीसद है.
एंगर्ड पुलिस वालों के लिए चुनौती बना हुआ है. पुलिस का मानना है कि इसके एक हिस्से में क़ानून व्यवस्था किसी भी समय चरमरा सकती है और वहां एक समानांतर समाज बन सकता है.
कई लोग चाहते हैं कि समुदाय के लोग शरिया के नियम के मुतबिक चलें. वे कथित रूप से महिलाओं को उनके कपड़ों और पार्टियों में शिरकत करने पर धमकाते हैं. इन पार्टियों में संगीत और नृत्य वगैरह होता है जो उनके हिसाब से 'हराम' है.
दो तिहाई बच्चे 15 साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते पढ़ाई छोड़ देते हैं, बेरोज़गारी की दर 11 फ़ीसदी है, जो स्वीडन के हिसाब से ऊंची है. ये वे लोग हैं, जिन्हें उग्रपंथी लोग बड़ी आसानी से निशाना बना लेते हैं.
उनसे कहा जाता है, "हम एक बड़े भाई या पिता के रूप में आपसे कहना चाहते हैं कि आप नशाखोरी न करें, इसके बजाय हमारे पास आएं, अल्लाह के लिए लड़ें, मुसलमानों की आज़ादी के लिए लड़ें. मुसलमान मारे जा रहे हैं, उनके साथ बलात्कार हो रहा है और आप अपना समय नष्ट कर रहे है. आपको स्वीडन के लोगों से कुछ नहीं मिलने को है."
कई अभिभावक लड़ाई से बदहाल देश छोड़ सुरक्षा की तलाश में स्वीडन आ गए. वे इस देश के शुक्रगुज़ार हैं कि उन्हें यहां इतना कुछ मिला. पर उनके बच्चों को लगता है कि उसके साथ भेदभाव होता है और वे पीछे छूट गए हैं.
सीरिया और इराक़ से यकायक शरणार्थियों की भीड़ आने से समस्या पहले से अधिक जटिल हो गई है. स्वीडन के लोग शरणार्थियों को उदारता से स्वीकार करते हैं. प्रति व्यक्ति की दर से स्वीडन ने यूरोप के किसी भी दूसरे देश से अधिक शरणार्थियों को पनाह दी है.
स्वीडन के इकलौते इंटीग्रेशन अफ़सर उल्फ़ बोस्ट्रॉम इसके लिए पुलिस बल की संख्या में कटौती को ज़िम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं कि पुलिस वालों की तादाद आधी कर दी गई है.
वे मुझे गोटेनबर्ग के एक उपनगर में बने बेलव्यू मस्जिद ले गए. इस मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि इसके तार कई इस्लामी और चरमपंथी संगठनों से जुड़े हुए हैं. सीरिया और इराक़ गए कई लोग इस मस्जिद से जुड़े थे.
चरमपंथी संगनठन अल शबाब के अध्यात्मिक प्रमुख हसन हुसैन यहां साल 2009 में आए थे.
बीबीसी संवाददाता ने एंगर्ड के एक मस्जिद में जुमा की नमाज अदा की. उसने पाया कि मस्जिद के इमाम तीन साल पहले सीरिया से यहां आए थे. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से कहा कि वे स्वीडन के नियम क़ानूनों का पालन करें और समाज में घुल मिल कर रहें. पर एक बार दो युवकों ने उग्रवाद की आलोचना करन के लिए उनका विरोध किया था.
गोटेनबर्ग में पला बढ़ा कोई आदमी आख़िर दुनिया के सबसे शांत और प्रगतिशील देश को छोड़ मध्य पूर्व की हिंसा में शामिल होना क्यों चाहेगा?
ज़्यादातर लोगों ने कहा कि वे ख़ुद को स्वीडिश नहीं मानते.
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या बहुसंस्कृतिवाद के साथ स्वीडन का प्रयोग नाकाम रहा?