साहित्य का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान इस बार हिंदी के कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को दिए जाने की घोषणा हुई है.
ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की घोषणा पर विनोद कुमार शुक्ल ने बीबीसी से कहा, "ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से मुझे खुशी हुई. मैं अभी भी यह महसूस करता हूं कि मैं क्या कुछ और लिख सकता हूं, उसे लिखूं. मैं यह भी महसूस करता हूं कि मेरे लिखने के लिए अभी बहुत कुछ बचा हुआ है.''
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 1 जनवरी 1937 को जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के उन साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने साहित्य और भाषा में अपने मुहावरे गढ़े हैं.
उनके उपन्यास 'नौकर की कमीज', 'खिलेगा तो देखेंगे' और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' ऐसी रचनाएं हैं, जिन्हें दुनिया भर में सराहा गया. कई भाषाओं में इनके अनुवाद हुए. उनके कहानी संग्रह 'पेड़ पर कमरा', 'आदमी की औरत' और 'महाविद्यालय' भी बहुचर्चित रहे हैं.
वो पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से लिख रहे हैं. उनका पहला कविता-संग्रह ‘लगभग जयहिंद’ 1971 में प्रकाशित हुआ था.
उसके बाद प्रकाशित 'वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह', 'सब कुछ होना बचा रहेगा', 'कविता से लंबी कविता', 'केवल जड़ें हैं', 'एक पूर्व में बहुत से पूर्व', 'अतिरिक्त नहीं' जैसे उनके कविता संग्रह भी चर्चित रहे हैं.
उन्होंने बच्चों के लिए भी कई कहानियां लिखी हैं. 'हरे पत्ते के रंग की पतरंगी' और 'कहीं खो गया नाम का लड़का' बाल रचनाओं में शुमार हैं.
कविता और उपन्यास लेखन के लिए गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप, रजा पुरस्कार, वीरसिंह देव पुरस्कार, सृजनभारती सम्मान, रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार, दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान, भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, पं. सुन्दरलाल शर्मा पुरस्कार जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए 1999 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार भी मिल चुका है.
दो साल पहले ही उन्हें पेन अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिए नाबोकॉव अवार्ड से सम्मानित किया था. एशिया के वे पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें इस सम्मान से नवाज़ा गया है.
पिछले ही साल साहित्य अकादमी ने उन्हें महत्तर साहित्य अकादमी की सदस्यता से सम्मानित किया था.