असम यूनिवर्सिटी ने अपने सिलचर कैंपस में छात्रों को इफ़्तार दावत आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है. यूनिवर्सिटी का कहना है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखता है.
वहीं यूनिवर्सिटी के छात्रों ने इस फैसले को पक्षपाती बताया और इसे एक धर्म के साथ अन्याय करार दिया है.
ग्रेजुएशन, पोस्ट- ग्रेजुएशन और रिसर्च स्कॉलर्स ने रमज़ान के मौके पर "दावत-ए-इफ़्तार 2025" आयोजित करने की योजना बनाई थी.
यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे पोस्ट- ग्रेजुएशन के छात्र रेज़ाउल करीम आज़ाद चौधरी ने बताया कि पिछले दो सालों से इस तरह के आयोजन हो रहे थे, जिनमें यूनिवर्सिटी के अधिकारी, यहां तक कि रजिस्ट्रार भी शामिल होते थे.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, “इस साल भी हमने यह आयोजन किया और 10 मार्च को प्रशासन से अनुमति मांगी. प्रशासन ने बताया कि कुलपति (वीसी) और रजिस्ट्रार दोनों मौजूद नहीं हैं, इसलिए प्रक्रिया में देरी हो रही है.”
“19 मार्च को रजिस्ट्रार ने अनुमति देने से इनकार कर दिया और कहा कि हमें वीसी के लौटने तक इंतजार करना होगा.”
चौधरी ने बताया कि इफ़्तार दावत के लिए छात्र अपने पैसे जुटाते हैं, लेकिन देर से अनुमति मिलने के कारण इस साल इसे रद्द करना पड़ा.
उन्होंने कहा, “वीसी अगले हफ्ते लौटेंगे, लेकिन तब तक हमारे पास आयोजन के लिए फंड इकट्ठा करने और तैयारी करने का समय नहीं रहेगा. इसलिए हमें इसे रद्द करना पड़ा. यह अन्याय है क्योंकि इसी यूनिवर्सिटी में अन्य धार्मिक कार्यक्रमों की अनुमति दी जाती है.”
आयोजकों के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में ये कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहे हैं और इसमें सभी धर्मों के छात्र शामिल हुए थे.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, असम यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार प्रदोष किरण नाथ ने कहा, "हम धार्मिक मामलों में सीधे शामिल नहीं होते, इसलिए हम आधिकारिक रूप से किसी भी धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं दे सकते.”
उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया कि छात्रों को आयोजन करने से मना नहीं किया गया है, बल्कि केवल आधिकारिक अनुमति देने से इनकार किया गया है, ताकि नियमों का पालन किया जा सके.
उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि वे अपने जोखिम पर इसे आयोजित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी. उन्होंने आधिकारिक अनुमति मांगी थी, जो हम नहीं दे सकते क्योंकि भारत का संविधान हमें किसी धार्मिक आयोजन को बढ़ावा देने की अनुमति नहीं देता.”
छात्रों ने इस फैसले की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की, जिससे बहस छिड़ गई. ज्यादातर लोगों ने यूनिवर्सिटी के फैसले की आलोचना की, जबकि कुछ ने इसका समर्थन किया.