मध्य-पूर्व का दौरा ख़त्म कर अमेरिकी
विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन अब लंदन पहुंच गए हैं, जहां उन्होंने मध्य-पूर्व में युद्धविराम को लेकर अरब देशों के विदेश
मंत्रियों के साथ चर्चा की.
इससे पहले उन्होंने कहा कि इसराइल-ग़ज़ा
युद्धविराम को लेकर कई सप्ताह से रुकी बातचीत फिर से शुरू होने वाली है.
ब्लिंकन ने क़तर में कहा कि कई
हफ़्तों बाद पहली बार मध्यस्थ फिर से मिलेंगे ताकि ग़ज़ा में युद्धविराम के लिए
रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने की कोशिश की जा सके.
हालांकि हमास इसमें हिस्सा लेगा या
नहीं इसे लेकर अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं है. हमास के एक अधिकारी ने मीडिया से कहा है
कि अगर इसराइल शर्तों पर सहमत हो जाता है तो, वो भी युद्ध रोकने के लिए तैयार है.
इसके बाद अब ये ख़बर आ रही है कि
इसके लिए इसराइल की तरफ से वहां की खुफिय़ा एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया
रविवार को दोहा पहुंच रहे हैं.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड फ़ेयर्स
में वरिष्ठ रीसर्च फेलो फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी ने बीबीसी दिनभर कार्यक्रम में
कहा, “एक साल से बातचीत चल रही है और कुछ नया नहीं हुआ
है. इस बार एक बात जो अलग है वो ये है कि ये वार्ता याह्या सिनवार की मौत के बाद
हो रही हैं.”
“हमास के ऊपर एक अलग तरह का दबाव है
कि उसके नेता की मौत के बाद उसे कमज़ोर माना जा रहा है. लेकिन हमास ने कोई नया
नेता नहीं चुना है. उसके पास मज़बूत नेता नहीं हैं. पर युद्ध को लेकर न इसराइल की
स्थिति में बदलाव है और न हमास की शर्तों में बदलाव है. हमास का सहायक समूह
हिज़बुल्लाह भी अलग मोर्चे पर लड़ रहा है.”
उन्होंने कहा, “जब तक दोनों पक्ष अपनी शर्तें थोड़ी नहीं बदलेंगे
और दो कदम आगे नहीं बढ़ेंगे, ऐसा नहीं
लगता कि बात बनेगी.”
अमेरिका की भूमिका पर सवाल
फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी कहते है, “जहां तक अमेरिका की बात है तो उसकी घरेलू नीति और मुद्दे हैं जो उसकी पोज़ीशन पर प्रभाव डालते हैं. अमेरिका अपने लोगों को बताना चाहता है कि अब भी मध्य-पूर्व में उसका वर्चस्व है. वो ये भी जताना चाहता है कि अगर हमने संघर्ष को चलने दिया है तो हम विराम भी लगा सकते हैं.”
उन्होंने कहा, “उसका अपना इंटरेस्ट तो है साथ ही डर भी है कि कहीं वो मध्य-पूर्व से निकल गया तो चीन या रूस, उस क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर सकते है.”
“लेकिन अमेरिका की भूमिका को लेकर सवाल उठ सकते हैं. अमेरिका खुले आम इसराइल की मदद कर रहा हैं. दूसरी तरफ विश्वास की कमी भी बढ़ रही है क्योंकि कई फ़लस्तीनी कहते हैं कि अमेरिका इसराइल के साथ है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि वो अगर इसराइल के इतना क़रीब है, तो वो मध्यस्थ का किरदार कैसे निभा सकता है.”
फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं, “इसराइल को ये लग रहा है कि उसका मिशन अब पूरा हो गया है क्योंकि हमास के बड़े नेताओं की मौत हो गई है.”
“लेकिन वहां भी प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू पर घरेलू दबाव है. सवाल उठ रहा है कि याह्या सिनवार की मौत के बाद उसका अब क्या लक्ष्य है, बंधक घर कब आएंगे. और फिर लोग भी यह पूछ रहे हैं कि अब लड़ाई का क्या होगा.”