इंसान और जानवरों के दूध में क्या समानता?

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दुनिया में हर साल 70 करोड़ टन दूध पैदा होता है. इसमें से 90 फ़ीसद उत्पादन पालतू जानवरों से होता है.
इनमें गाय, भैंस और बकरी से लेकर ऊंट और भेड़ तक शामिल हैं. कुल दूध उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा इंसानों के इस्तेमाल में आता है.
इंसान, इन पालतू जानवरों के अलावा, अल्पाका, एल्क, इलामा, मूज़ नाम के अमरीकी हिरण और याक तक का दूध इस्तेमाल करता है.
ख़ुद इंसानों के भी दूध निकलता है. लेकिन, इसकी दुनिया के कुल दुग्ध उत्पादन में गिनती नहीं होती.
क्योंकि इसका कारोबार नहीं होता. मां बनने वाली ज़्यादातर महिलाएं, अपने बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं, जिससे कि बच्चे को पोषण मिले और वो तेज़ी से बढ़ सके.
मगर कभी आपने सोचा है कि इंसान के दूध और बाक़ी जानवरों के दूध में क्या फ़र्क़ होता है? और इंसानों का दूध किन जानवरों के दूध से मिलता है?
इस बारे में हुए तजुर्बों से कई दिलचस्प बातें मालूम हुई हैं.
जितने भी स्तनपायी जानवर होते हैं, उन सबके दूध होता है. चाहे फिर वो अंडे देने वाले प्लैटीपस हों, कंगारू हों, ख़रगोश, बाघ, दरियाई घोड़े, बंदर या फिर डॉल्फिन.

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मगर हर नस्ल के जानवर की ज़रूरत और उसके रहने का माहौल अलग होता है.
इस वजह से उनके दूध में भी अंतर होता है. हालांकि दूध में जो तत्व होते हैं वो कमोबेश एक से होते हैं.
मगर उनकी तादाद, ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग जानवरों में अलग होती है.
अब जैसे सील को ही लीजिए. ये बेहद सर्द माहौल में रहती है.
जैसे ही मादा सील बच्चे देती है, इस बच्चे के बदन पर वसा की मोटी परत हो जानी चाहिए, वरना उत्तरी अटलांटिक की भयानक ठंड में उसका बचना मुश्किल होगा.
सील का बच्चा ठंड में बचेगा नहीं तो वो तैरना और शिकार करना कैसे सीखेगा? वो भी इतने सर्द माहौल में.
इसी वजह से मादा सील के दूध में 61 फ़ीसद फैट होता है. और केवल पांच फ़ीसद प्रोटीन. कार्बोहाइड्रेट या चीनी की मात्रा तो महज़ एक फ़ीसद होती है.
सील अक्सर अपने बच्चे बर्फ़ के तैरते टुकड़ों पर देती है, ताकि ये बच्चे पोलर बियर का शिकार बनने से बच सकें.
तो इनके पास बचने के लिए बहुत कम मौक़ा होता है. इन्हें सिर्फ़ चार दिन के अंदर, रोज़ाना सात किलो फैट की ज़रूरत होती है.
इसीलिए मादा सील के दूध में इतना फैट होता है. ताकि वो अपने बच्चों को भयंकर सर्दी से बचने के लिए तैयार कर सकें.

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इनके मुक़ाबले, घास चरने वाले, गर्म माहौल में रहने वाले जानवरों के पास अपने बच्चे पालने के लिए काफ़ी वक़्त होता है.
इसलिए इनकी माओं का दूध हल्का और पतला होता है. जब बच्चे भूख महसूस करते हैं तो माएं उन्हें दूध पिला देती हैं.
इसीलिए गैंडे के दूध में केवल 0.2 फ़ीसद फैट होता है और गोरिल्ला के दूध में 1.5 फ़ीसद.
इंसान का दूध भी काफ़ी पतला होता है. इसमें 90 फ़ीसद हिस्सा तो पानी का होता है.
क्योंकि इंसान के बच्चे पलने में काफ़ी वक़्त लेते हैं तो इनकी माओं को उन्हें सील की तरह फ़ौरन ढेर सारा पोषण देने की ज़रूरत नहीं होती.
वो आराम से, धीरे-धीरे ऐसा कर सकती हैं. इसीलिए इंसान के दूध में 4 फ़ीसद फैट, 1.3 फ़ीसद प्रोटीन और 7.2 फ़ीसद लैक्टोज़ होता है. बाक़ी का तो सिर्फ़ पानी होता है.
मानवों के विज्ञान के जानकार केटी हाइंड और लॉरेन मिलिगन बताते हैं कि ज़ेब्रा के दूध की बनावट भी कमोबेश इंसान जैसी होती है.
ज़ेब्रा के दूध में भी 1.6 फ़ीसद प्रोटीन, 2.2 फ़ीसद फैट, 7 फ़ीसद लैक्टोज़ और 89 फ़ीसद पानी होता है.
यानी ज़ेब्रा और इंसान का दूध कमोबेश एक जैसा होता है.
जबकि जानवरों के विकास की प्रक्रिया में दोनों के बीच क़रीब दस करोड़ साल का फ़ासला है.

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यानी ज़ेब्रा, इंसानों से 10 करोड़ साल पहले धरती पर पैदा हुए थे.
हालांकि दोनों की ज़रूरत में फ़र्क़ है. इंसान के बच्चे धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए उन्हें एक साथ ज़्यादा पोषण की ज़रूरत नहीं.
इसीलिए इंसान का दूध पतला होता है. वहीं, ज़ेब्रा बेहद गर्म माहौल में पैदा होते हैं. इससे उनके शरीर से पसीना निकलता है.
ताकि बदन ठंडा रह सके, उनके बच्चों को ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है, इसीलिए ज़ेब्रा के दूध में इंसान के दूध के बराबर ही पानी होता है.
अमरीका की ऑबर्न यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक एमी स्कीबिएल ने 130 जानवरों के दूध पर रिसर्च की है. इसके चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं.
स्कीबिएल के मुताबिक़, एक जैसी नस्ल वाले जानवरों के दूध में समानता पायी जाती है.
साथ ही किसी जानवर के दूध के बारे में ये देखकर पता लगाया जा सकता है कि वो कितने वक़्त तक अपने बच्चों को दूध पिलाता है.
जैसे डॉल्फ़िनें अपने बच्चों को 18 महीने तक दूध पिलाती हैं.
इसी तरह मांस खाने वाले जानवरों के दूध में ज़्यादा फैट और प्रोटीन मिलता है, जैसे कि शेर या बाघ.
वहीं घास खाने वाले जानवरों का दूध पतला होता है. जैसे कि जिराफ़.
वैज्ञानिक मानते हैं कि सबसे पहले जिस जानवर के दूध निकलना शुरू हुआ था, वो आज से 16 करोड़ साल पहले पैदा हुआ था.

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उसका विलुप्त हो चुके जीव का नाम साइनैप्सिड था.
हालांकि जानवरों में दूध क्यों बनना शुरू हुआ, इसकी वजह को लेकर वैज्ञानिकों में मतभेद हैं.
कुछ लोग मानते हैं कि जानवरों के बच्चों की बीमारियों से लड़ने की ताक़त बढ़ाने के लिए माओं के दूध होने लगा था.
जिसे पीकर उनके बच्चे, अपने माहौल में मज़बूती से रह सकें.
वहीं कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि ये बच्चों को पोषण मुहैया कराने के लिए क़ुदरती विकास की प्रक्रिया के दौरान पैदा हुआ.
वहीं कुछ ये मानते हैं कि शुरुआती स्तनपायी अंडे देने वाले थे.
उनके अंडों के इर्द-गिर्द एक खोल बनाने के लिए दूध का स्राव जानवरों में शुरू हुआ होगा.
अब वजह चाहे जो भी हो, हमारे लिए तो ये बहुत अच्छा हुआ.
क्योंकि हम ख़ाली दूध तो पीते नहीं, इससे बटर निकाला जाता है, चीज़ बनती है, पनीर निकाला जाता है.
इसी से खोया बनाकर तमाम तरह की मिठाइयां बनती हैं.
इसके अलावा फ्रूट क्रीम और आइसक्रीम बनाने में भी तो दूध का इस्तेमाल होता है.
तो, इसके लिए किसको शुक्रिया कहेंगे? अरे भाई, साइनैप्सिड नाम के उस जीव को, जिसके बारे में कहा जाता है कि सबसे पहले उसी के दूध होना शुरू हुआ था.
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