'तालिबान से बात करने का सही वक्त है'

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- Author, अहमद राशिद
- पदनाम, लेखक एवं पत्रकार, पाकिस्तान
तालिबान के नए प्रमुख मावलावी हैबतुल्ला अख़ुंज़ादा का चुनाव विवादों में घिरा रहा है.
मावलावी हैबतुल्ला कंधार के जाने-माने धार्मिक नेता हैं. उन्होंने कभी भी लड़ाई के मैदान में तालिबान का नेतृत्व नहीं किया है.
वे क्वेटा के नज़दीक कुचलाक में एक मशहूर मदरसा चलाते थे. इसकी वजह से बहुत सारे तालिबान लड़ाके, उनके राजनीतिक रूप से रसूखदार नहीं होने के बावजूद बहुत उनकी इज़्ज़त करते हैं.
90 के दशक में वे तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के धार्मिक सलाहकार हुआ करते थे. धार्मिक फतवे और तालिबान के फ़रमान जारी करने में उनकी अहम भूमिका रहती थी.
तालिबान के साथ बातचीत करने के लिहाज से आने वाले कुछ हफ़्ते और महीने बड़े कूटनीतिक अवसर मुहैया कराने वाले हैं. यह तालिबान तक पहुंचने की कोशिश करने का सही समय है.
इस वक्त अमरीका, नाटो देशों, पाकिस्तान और ईरान को तालिबान से संपर्क साधने के हर संभव प्रयास करने चाहिए.
अफ़ग़ानिस्तान से बात करने के लिए तालिबान को तैयार करने का भी यह सही समय है.
इस उम्मीद के साथ कि तालिबान की प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी, एक उद्देश्यपूर्ण कूटनीतिक प्रयास शुरू करना चाहिए.

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बहुत साफ़ है कि चार देशों की संयुक्त वार्ता अब दम तोड़ चुकी है. ख़ासकर पाकिस्तान के ढुलमुल रवैये ने तालिबान पर कभी बातचीत के लिए दबाव बनाया ही नहीं.
पाकिस्तान का यह रवैया इस बात से आसानी से देखा जा सकता है कि उसने अब तक तालिबानी नेता मुल्ला मंसूर को पाकिस्तानी पासपोर्ट और पहचान पत्र मिलने पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है.
मुल्ला मंसूर ने बिना किसी पूछताछ के 18 बार दुबई की यात्रा की है.
पाकिस्तानी फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इस उम्मीद में एक साल बिता दिया कि वे तालिबान को बातचीत के लिए आमने-सामने बिठा सकेंगे.
लेकिन आख़िर में यह क़वायद बेकार गई और तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में कई और जीतें दर्ज करता रहा.
हालांकि अमरीका और नाटो की कम दिलचस्पी भी इसकी एक वजह रही.
अब एक दूसरी तरह की कूटनीतिक पहल की ज़रूरत है. इसके लिए पाकिस्तान और अमरीका के ऊपर निर्भरता को खत्म करना चाहिए.

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तालिबान के जो नेता अब पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से बाहर रह रहे हैं, उनके साथ दूसरे देशों की सरकारों को बात करना चाहिए.
ख़ासकर क़तर में तालिबान के प्रभावशाली गुटों के कमांडर अब एकत्रित हो चुके हैं.
क़तर और दूसरे अरब देशों को तालिबान के साथ बातचीत की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए राजी करना चाहिए.
अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को भी तालिबान के साथ शांतिपूर्ण तरीके से मिलना चाहिए. क्योंकि सीधी मुलाकात ज़्यादा बेहतर हालात बनाते हैं.
अमरीका को भी तालिबान के नेताओं से संपर्क करने के लिए एक टीम का गठन करना चाहिए.
यह इस लिहाज़ से भी बहुत अहम है कि तालिबान लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान पहले राष्ट्रपति अशरफ ग़नी के बजाए अमरीका से बात करना चाहता है.
अमरीका और अशरफ ग़नी को भी इस पर सहमत होना चाहिए.

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अमरीका ने छह साल पहले क़तर तालिबान से बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने की पहल की थी, लेकिन वे कटुतापूर्ण तरीक़े से ख़त्म हो गई.
पाकिस्तान के ऊपर भी सिर्फ अमरीकियों की तरफ से ही नहीं बल्कि आस-पास के देशों की तरफ से भी इस दिशा में दबाव बनाना चाहिए.
तालिबान नेताओं को पाकिस्तान में घूमने और शांति वार्ता के सिलसिले में जिससे भी वो मिलना चाहे, उनसे मिलने की इजाज़त देनी चाहिए.
भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत सारी असफल शांति वार्ताओं के बावजूद इन दोनों देशों को एक-दूसरे के साथ अफ़ग़ानिस्तान पर बात करनी चाहिए.
पाकिस्तान की फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान में भारत की संभावित भूमिका को लेकर संशकित रहती है. जरूरत है इस अविश्वास को दूर करने की.
एक नया तालिबानी नेतृत्व जो कि पाकिस्तान पर कम निर्भर होता हुआ दिख रहा है, उससे तत्काल संवाद स्थापित करने की जरूरत है.
इससे पहले की देर हो जाए और एक बार फिर पूरी जीत का दावा करने वाले कट्टरपंथी हावी हो जाए तालिबान के साथ कूटनीतिक पहल की शुरुआत कर देनी चाहिए.
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