लंदन की सुरक्षा के लिए बने थे समुद्री क़िले

ब्रिटेन का रेड सैंड टॉवर

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इंग्लैंड के समुद्र तट से क़रीब सात मील दूर, समंदर में खड़े ये ढांचे, किसी साइंस-फ़िक्शन फ़िल्म का सीन लगते हैं. मगर, ये ब्रिटेन के शानदार इतिहास के भुला दिए गए पन्ने हैं.

ये फ़ोर्ट ऑफ़ रेड सैंड्स के नाम से मशहूर हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इन्हें 1943 में बनाया गया था. इनका मक़सद था जर्मन एयरफ़ोर्स की बमबारी से लंदन की सुरक्षा करना.

समंदर में क़िले की तरह खड़े इन ढांचों पर दो सौ से ज़्यादा ब्रिटिश सैनिक तैनात किए गए थे, जो दिन-रात आसमान की निगरानी करते थे. ताकि जर्मनी के लड़ाकू विमानों को लंदन पहुंचने से पहले ही तबाह कर सकें.

ब्रिटेन का रेड सैंड टॉवर

समंदर में टेम्स नदी के मुहाने के क़रीब बने इन टॉवर्स तक पहुंचने का इकलौता ज़रिया, नावें हैं. ब्रिटेन में बहुत कम ही लोग इनके बारे में जानते हैं.

इनमें से भी बहुत कम लोग ही यहां तक पहुंचने, इन्हें देखने, इनके बारे में जानने-समझने की कोशिश करते हैं.

मगर, प्रोजेक्ट रेड सैंड नाम का एक ग़ैर सरकारी संगठन इन ऐतिहासिक समुद्री क़िलों की मरम्मत करके इन्हें पुराना गौरव वापस दिलाने की कोशिश में जुटा है.

इन टॉवर्स को अस्थाई तौर पर बनाया गया था लंदन की सुरक्षा के लिए. उसके बाद सरकार ने प्रोजेक्ट को बंद कर दिया और इन समुद्री टॉवर्स को इनके हाल पर छोड़ दिया गया. बीसवीं सदी के साठ के दशक में कुछ उत्साही युवा यहां पहुंचे थे.

ब्रिटेन का रेड सैंड टॉवर

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उन्होंने यहां से एक रेडियो स्टेशन भी शुरू किया था. मगर 1967 में ब्रिटिश सरकार की नीतियों में बदलाव की वजह ये ये समुद्री रेडियो स्टेशन भी बंद हो गया.

इसके बाद इन समुद्री क़िलों की बर्बादी का दौर शुरू हो गया. बेरुख़ी औऱ रख-रखाव की कमी के चलते इनका बुरा हाल हो गया. एक दूसरे को जोड़ने वाले फ़ौलादी गलियारे जंग की वजह से टूटने लगे.

पास से गुज़रते जहाज़ों पर सवार लोगों के सिवा बाक़ी ब्रिटेन ने इन्हें भुला दिया.

मगर, इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में कुछ पूर्व सैनिकों, इंजीनियरों और इतिहास की समझ रखने वालों ने मिलकर प्रोजेक्ट रेड सैंड शुरू किया. इसका मक़सद, ब्रिटेन के इतिहास के इस पन्ने को संजोकर रखना था.

पहली ज़रूरत थी, टॉवर्स की ख़राब हो चुकी बुनियाद को ठीक करना. इसके लिए इस टीम ने समंदर में गोता लगाकर नुक़सान का जायज़ा लिया. और फिर शुरू हुई इतिहास के पन्नों की मरम्मत की ये मुहिम.

मगर समंदर में काम करने में बड़े जोखिम हैं. ख़ास तौर से लोहे के इन टूटे-फूटे क़िलों की मरम्मत का काम. जिस दिन इस रिपोर्ट को बनाने वाली बीबीसी टीम प्रोजेक्ट रेड सैंड की टीम के साथ वहां गई.

उस दिन हवा बहुत तेज़ थी. समुद्र में डुबकी लगाकर, टॉवर की बुनियाद ठीक करने जा रही टीम ने सारी तैयारी कर ली, मगर तेज़ हवा के चलते उन्हें अपना इरादा टालना पड़ा.

ब्रिटेन का रेड सैंड टॉवर

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इन दिक़्क़तों से प्रोजेक्ट रेड सैंड की टीम ज़रा भी हताश नहीं. वो रोज़ आते हैं. यहां मरम्मत का काम करने की कोशिश करते हैं.

वापस जाकर ऑनलाइन अपने अब तक के काम को जांचते परखते हैं. साथ ही वो आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने की तैयारी करते हैं.

सत्तर साल से भी ज़्यादा पुराने इन समुद्री क़िलों के डिज़ाइन पुराने हैं. इनके नक्शे भी प्रोजेक्ट रेड सैंड के लोगों को बमुश्मिल मिल सके. और अब मरम्मत का काम और भी चुनौती भरा है.

मगर, प्रोजेक्ट रेड सैंड की टीम जी-जान से इस काम को अंजाम देने में जुटी है. ताकि, ब्रिटेन की आने वाली पीढ़ियां इतिहास के इन फ़ौलादी पन्नों को देख सकें, इन पर तैनात रहे सैनिकों के क़िस्से जान सकें. उनकी कोशिश क़ाबिले तारीफ़ है.

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