पाकिस्तान सरकार को किस-से डर लगता है!

अमरीकी अख़बार न्यू यॉर्क टाइम्स पर पाकिस्तान में लगे सेंसर से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं.
इस पर अमरीका में चिंता जताई जा रही है.
अखबार के स्थानीय प्रकाशक द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने जनवरी महीने में दो बार न्यू यॉर्क टाइम्स की कुछ सामग्रियां हटा दीं.
इसी महीने अर्द्धसैनिक बलों ने इस्लामाबाद में तैनात अख़बार के संवाददाता के घर पर छापा भी मारा.
इस घटनाओं के बाद अख़बार पाकिस्तान में अपने संस्करण को चलाए रखने पर गंभीरता से विचार करने लगा है.

'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने 29 जनवरी को उस तस्वीर को हटा दिया, जिसमें चीन में एक पुरुष को अपने पुरुष साथी का गाल चूमते दिखाया गया है.
यह तस्वीर टाइम्स की उस ख़बर के साथ लगाई गई थी, जिसमें यह कहा गया था कि चीन में समलैंगिक विवाह पर लगे प्रतिबंध को अदालत में चुनौती दी गई है.
'टाइम्स' ने साफ़ किया कि इसने ख़ुद वह तस्वीर नहीं हटाई है. उसने कहा, "पाकिस्तान स्थित हमारे प्रकाशक ने वह तस्वीर हटा दी."
इसी तरह, 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने 3 जनवरी को 'टाइम्स' में छपी बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्षता समर्थक ब्लॉगर से जुड़ी ख़बर भी हटा दी थी.
मार्च 2014 में भी सेंसरशिप की एक घटना हुई थी. 'टाइम्स' ने कहा था कि इसके पाकिस्तानी साझेदार ने अल क़ायदा के पूर्व प्रमुख ओसामा बिन लादेन पर छपी एक ख़बर को भी सेंसर कर दिया था.

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इस ख़बर में आरोप लगाया गया था कि पाकिस्तान सरकार को साल 2011 में हुए अमरीकी ऑपरेशन के पहले ही एबटाबाद में चरमपंथी प्रमुख के छिपे होने की जानकारी थी.
'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के संपादक कमाल सिद्दीकी ने सेंसरशिप का बचाव करते हुए कहा कि स्थानीय कर्मचारियों की हिफ़ाजत के लिए ऐसा किया गया था.
उन्होंने कहा कि 'न्यू यॉर्क टाइम्स' के साथ पहले ही इस पर सहमति हो गई थी कि 'स्थानीय समस्या' हुई तो वे किसी आर्टिकल या तस्वीर को छापने से इंकार कर सकते हैं.
उन्होंने 'टाइम्स' को प्रबंधन को भेजे एक ई-मेल में लिखा, "आपकी ही तरह मैं भी सेंसरशिप के ख़िलाफ़ हूं. पर द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के संपादक के रूप में मुझे इस तरह के आर्टिकल छपने से पैदा होने वाले ख़तरों का भी ख़्याल रखना है."

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अख़बार के इस्लामाबाद संवाददाता सलमान मसूद के घर पर 12 जनवरी को छापा बग़ैर वारंट के मारा गया.
अमरीका स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि हालिया कोशिशें सरकार और सेना की आलोचना करने वाले लोगों को डराने की है.
इसके पहले साल 2013 के मई महीने में अख़बार के पाकिस्तान ब्यूरो प्रमुख डीक्लैन वॉल्श को चुनावों के पहले महज़़ 48 घंटे के नोटिस पर देश से बाहर कर दिया गया था.
ऐसा सिर्फ़ 'न्यू यॉर्क टाइम्स' के साथ ही नहीं हुआ है.

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सेना के अधिकारियों ने बीते नवंबर में लाहौर स्थित 'डेली टाइम्स' को मजबूर किया था कि वह दो स्तंभकारों को निकाल दे. इसका नतीजा यह हुआ कि अख़बार के संपादक ने ही इस्तीफ़ा दे दिया था.
इसी महीने 'डॉन' मीडिया समूह के टीवी की खबर संग्रह करने गई गाड़ी पर हमला हुआ. सूचना मंत्री ने इसे 'अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला' क़रार दिया था.
ह्यूमन राइट्स वॉच ने बोलने की आज़ादी पर शिकंजा न कसने की अपील सरकार से की है. इसने कहा, "सरकार अपने कदम वापस ले. वह उन क़ानूनों में संशोधन करे या उन्हें वापस ले जिससे अभिव्यक्ति आज़ादी में कटौती की जा सकती है."












