फ़ुल क्रीम दूध, मक्खन वाकई ख़तरनाक हैं?

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    • Author, डेविड रॉबसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

मोटे तौर पर ये माना जाता है कि मक्खन, चीज़ और फ़ुल क्रीम वाला दूध स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं होते हैं.

ये भी कहा जाता रहा है कि इन डेयरी उत्पादों से धमनियों में वसा जमा होती है और इसके चलते हृदय संबंधी रोग होते हैं.

लेकिन वास्तविकता क्या है?

फ़ुल क्रीम दूध

कई दशकों से ये माना जाता है कि मक्खन, चीज़ और फ़ुल क्रीम वाले दूध में मौजूद सैचुरेटेड फैट, मानव शरीर के रक्त में कैलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ाते हैं और इससे हार्ट अटैक होने की आशंका बढ़ जाती है.

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संभवत इन वजहों से कई स्वास्थ्य संस्थाएं लोगों को भोजन में कृत्रिम मक्खन और वेजिटेबल ऑयल के इस्तेमाल की सलाह देती हैं, जिनमें पॉली अन-सैचुरेटेड फैट्स होते हैं और वह नुकसान नहीं पहुंचाते.

लेकिन बीते कुछ सालों में ऐसे अध्ययन सामने आए हैं जो पुरानी सोच और जानकारी को संदेह में ला देते हैं. एनल्स ऑफ़ इंटरनल मेडीसिन की एक समीक्षा में कहा गया है कि सैचुरेटेड फैट से हृदय रोग पर कोई असर नहीं पड़ता.

वैसे ये विश्लेषणात्मक अध्ययन के नतीजे हैं. लेकिन शोधकर्ताओं के एक दल ने इस मसले पर गंभीर काम करने का फ़ैसला लिया. उन्होंने प्रयोग में हिस्सा लेने वाले लोगों को आठ सप्ताह तक लगातार 27 फ़ीसदी फ़ैट वाला चीज़ खिलाया.

प्रयोग के बाद ये देखा गया है कि इन लोगों में कोलेस्ट्रोल का स्तर ज़ीरो फैट का खाना खाने वाले लोगों से कम था.

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लेकिन इसमें सबसे चौंकाने वाला नतीज़ा क्या रहा? फ़ुल क्रीम वाले दूध और मक्खन में ज़्यादा कैलोरी होने के बाद भी जो लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, उनमें सेमी स्किम्ड दूध वाले की तुलना में मोटापे से ग्रस्त होने की आशंका ज़्यादा नहीं होती.

12 अलग अलग अध्ययनों में ज़्यादा कैलोरी वाले दूध का सेवन करने वाले लोग कहीं ज़्यादा दुबले पतले पाए गए हैं. यह भी संभव है कि वसा भी कई बार मेटाबॉलिज्म को रेगुलेट करती हो, इससे आप कहीं ज़्यादा कैलोरी बर्न करते हों.

ये भी हो सकता है कि फ़ुल क्रीम वाले डेयरी उत्पाद लंबे समय तक भूख नहीं लगने देते. इसके चलते संभव है कि लोग नुकसानदायक स्नैक्स कम खाते हों.

ऐसे में ज़ाहिर है कि हमें इसकी वजह मालूम नहीं है लेकिन सभव है कि फ़ुल क्रीम दूध भी आपको पतला रखा सकता हो.

पेश्चराइज़्ड दूध

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आम लोगों में ये डर होता है कि पेश्चराइज़्ड दूध के इस्तेमाल से एक्जीमा, अस्थमा और प्रतिरोधी संबंधी मुश्किलें हो सकती हैं.

वास्तविकता क्या है- कहा जाता है कि दूध को पेश्चराइज़ करने में कई उपयोगी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिनमें एलर्जी से बचाव करने वाला प्रोटीन भी शामिल है.

इसके अलावा दूध को पेश्चराइज़ करने के दौरान कई ऐसे रोगाणु भी नष्ट हो जाते हैं, जो हमारे पाचन तंत्र को बेहतर बनाते हैं, प्रतिरोधी क्षमता को बेहतर करते हैं और कैंसर से हमारी सुरक्षा करते हैं.

कई चिकित्सकों को ये अपरिपक्व सोच लगती है. उनके मुताबिक पेश्चराइज़ करने के दौरान दूध को थोड़ा गर्म किया जाता है, लेकिन उसमें सभी पोषण बने रहते हैं.

जहां तक नेचुरल दूध में मौजूद रोगाणुओं से होने वाले फ़ायदे का सवाल है ,तो यह बहुत स्पष्ट नहीं हैं. अलर्जी नहीं होने की वजहें दूसरी और अलग अलग हो सकती हैं.

उल्टे यह देखा गया है कि कच्चा दूध पीना ख़तरनाक हो सकता है. इससे टीबी और पेट संबंधी रोग, यानी ई कोलाई या सालमोनेला जैसी बीमारियों का ख़तरा बढ़ सकता है, यानी पेश्चराइज़्ड दूध पीना ज़्यादा फ़ायदेमंद है.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में मूल <link type="page"><caption> लेख यहां</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20151029-are-any-foods-safe-to-eat-anymore-heres-the-truth" platform="highweb"/></link> पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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