मोदी-शरीफ़ की मुलाकात से कम होगी तल्खी?

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- Author, हारून रशीद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
जिस तरह अंतिम समय में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाक़ात तय हुई इससे किसी बड़े ऐलान या फ़ैसले की उम्मीद करना काफ़ी हद तक बेमानी था.
दोनों के बीच रूस में करीब 50 मिनट तक बातचीत हुई.
लेकिन अगर दोनों देशों की बीच वार्ता की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की ही बात करें तो इसे निश्चित रूप से बड़ी कमयाबी माना जाएगा.
दोनों पड़ोसी देशों के बीच हाल के दिनों में जिस तरह की तल्ख़ियां बढ़ी हैं उसमें यह मुलाक़ात ही शांति तलाशने वालों के लिए बहुत है.
कहीं भारत की खुफ़िया एजेंसी रॉ पर पाकिस्तान की एक पार्टी को मदद करने की रिपोर्टें आईं तो कहीं नियंत्रण रेखा पर लगातार मुठभेड़ ने माहौल तनावपूर्ण बनाए रखा.
ऊपर से यह माना जाता है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी धमकी भरे बयान लगातार जारी करने की फैक्टरी लगा रखी है ताकि यह तल्ख़ियां कम न हों.
ऐसे में लगता है कि अक़्ल के नाखून लिए गए और तनाव कम करने की कोशिशें हुईं. पहले टेलीफ़ोन हुए और अब मुलाक़ात.
नेपाल में पिछले साल नवंबर में आमने-सामने आने के बाद दोनों नेता दूसरी बार हाथ मिलाएंगे.
'भारत की पहल'

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विदेश मामलों पर प्रधानमंत्री के विशेष सहायक तारिक़ फ़ातमी ने स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान भारत से वार्ता की बहाली के लिए फिर से संपर्क नहीं करेगा, अगर भारत को पाकिस्तान से बात करनी है तो उसे पहल करनी होगी.
इसलिए उधर से पहल हो गई.
विदेश मामलों के विशेष सहायक ने ये बातें बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में कहीं.
जब उनसे पूछा गया कि आपके इन कड़े बयानों से तो नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध निकट भविष्य में बेहतर हो पाने की उम्मीद है तो उन्होंने कहा कि धारणा सही है.
पाकिस्तानी शुक्र कर रहे हैं कि कम से कम इस बारे में तारिक़ फ़ातमी की धारणा ग़लत साबित हुई है.
अमरीकी हस्तक्षेप

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और हो भी क्यों न. दोनों देशों के संबंधों में हो रहे इस सुधार में अमरीका का भी हस्तक्षेप है.
जब नवाज़ शरीफ़ को मोदी साहब का फोन आया तो तुरंत उसके बाद अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी ने भी पाकिस्तानी नंबर घुमाया और बात की.
इससे साबित हुआ कि पीछे से अमेरिका भी तनाव कम करने के प्रयासों का हिस्सा था.
क्या है उम्मीद?

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कश्मीर पाकिस्तान की विदेश नीति में हमेशा से केंद्र बिंदु रहा है.
कश्मीर जैसे पुराने और ऐतिहासिक विवादों में तो इस बैठक में कोई बात होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन अगर वो आजकल पैदा होने वाले रोज के छोटे-मोटे मुद्दों जैसे कि सीमा पर झड़पें और बयानों की जंग बंद करवाने में सफल हो जाएं तो महत्वपूर्ण सफलता मानी जा सकती है.
करने को तो दोनों देशों के बीच बहुत कुछ है, बस नेताओं की अंतर्दृष्टि चाहिए.
वे लाइन और एक्शन चाहिए जिसके तहत पाकिस्तान अपने देश के अंदर आतंकवाद पर कुछ हद तक काबू पाने में सफल होता दिखाई देता है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर भी पड़ोसियों के साथ संबंध बेहतर हों.
यह केवल अफगानिस्तान तक सीमित न हो बल्कि ईरान और भारत के साथ भी इसे आगे बढ़ाया जाए. इस इलाक़े की भलाई इसी में है.
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