पाकिस्तान संकट: लोग क्या चाहते हैं?

पाकिस्तान में सरकार विरोधी प्रदर्शन

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पाकिस्तान में जारी संकट ने कई सवाल खड़े किए हैं. एक तरफ़ जनता स्थिरता चाहती है तो दूसरी तरफ़ राजनेता हलचल मचाए हुए हैं.

इमरान ख़ान ने जब तीन हफ़्ते पहले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस्तीफ़े और नए चुनाव कराने की मांग को लेकर इस्लामाबाद कूच किया था तो उन्हें लगा था कि पूरा देश उनके साथ लामबंद हो जाएगा.

लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ और पाकिस्तान की जनता क्या चाहती है, पढ़िए स्तंभकार अहमद राशिद का विश्लेषण.

नवाज़ शरीफ़ का समर्थन

इमरान ने जैसा सोचा था उसके ठीक विपरीत हुआ. सारा देश इमरान, उनके समर्थकों और उनके इन दावों के ख़िलाफ़ हो गया कि पिछले साल हुए आम चुनावों में धांधली हुई थी.

नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी

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लगभग सभी राजनीतिक धड़ों ने <link type="page"><caption> शरीफ़ का समर्थन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/08/140825_wusat_blog_pakistan_imran_sr.shtml" platform="highweb"/></link> किया. यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी उनका ही साथ दिया.

पाकिस्तान के कारोबारी तबके, व्यापारियों, सिविल सोसायटी, मीडिया, वकीलों और अदालतों सभी ने सरकार, संविधान और यथास्थिति के प्रति अपना मजबूत समर्थन ज़ाहिर किया.

इनमें से कई लोगों ने इमरान की मांग को ग़ैर क़ानूनी और असंवैधानिक करार दिया, लेकिन मुद्दा यह नहीं था.

वास्तव में पाकिस्तान के लोग ऐसा संकट और हालात नहीं चाहते थे जिससे सेना की सीधी भूमिका में वापसी हो सके.

कहां चूक गए इमरान

इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी. इमरान को सलाह दी गई थी कि शरीफ़ प्रशासन ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा, वह देश छोड़ देंगे और पाकिस्तान उनके जाने का स्वागत करेगा.

इसके बजाय देश ने मज़बूती के साथ एक पक्ष लिया, जो शरीफ़ के पक्ष में हो यह जरूरी नहीं, लेकिन यह देश के स्थायित्व के पक्ष में था.

इमरान ख़ान

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यहीं पर <link type="page"><caption> इमरान ख़ान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/08/140821_imran_khan_demand_pakistan_vs.shtml" platform="highweb"/></link> और उनके तमाम सलाहकार मात खा गए.

पाकिस्तानी जनता ने दशकों के सैन्य शासन, राजनीतिक अस्थिरता, बेनज़ीर भुट्टो की हत्या, इस्लामी चरमपंथ का उभार, अर्थव्यवस्था का बिखराव देखा.

लोगों ने 1990 के दशक में सरकारों के बनने और गिरने का दौर भी देखा था और वे इन सबसे मुक्ति के लिए तड़प रहे थे.

<link type="page"><caption> पढ़िएः पाक: क़ादरी-इमरान का धरना होगा ख़त्म?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/08/140828_pakistan_dharna_ra.shtml" platform="highweb"/></link>

पहले ही टल सकता था संकट

पिछले साल जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की निर्वाचित सरकार ने पहली बार बिना किसी सैन्य दख़ल के अपना कार्यकाल पूरा किया और फिर चुनाव के बाद नई सरकार ने सत्ता सौंपी तो जनता को राहत महसूस हुई.

नवाज़ शरीफ़

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हालांकि चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे, लेकिन अधिकांश लोगों ने सत्ता के लोकतांत्रिक हस्तांतरण के लिए इसे जायज़ माना.

सत्ता के मद में चूर शरीफ़ ने चार निर्वाचन क्षेत्रों में पुनर्मतदान की इमरान की मांग को नहीं माना.

अगर उन्होंने पिछले साल यह मांग मान ली होती तो संभव है कि मौजूदा संकट टाला जा सकता था.

लोग आगे बढ़ना चाहते हैं

यह इमरान के अहम का मसला भी नहीं है (उनको भी अच्छा लगता है कि कोई उन्हें 'कप्तान' या 'प्रधानमंत्री' कहे). साथ ही यह शख़्सियतों और उनके टकराव का मसला भी नहीं है.

न ही यह पारिवारिक संबंधों का मामला है. शरीफ़ ने अपने मंत्रियों को ज़्यादा अधिकार देने के बजाए अपने रिश्तेदारों को अहम पदों पर नियुक्त किया है. उनकी इस नीति के कारण पार्टी में भी असंतोष बढ़ रहा है.

पाकिस्तान के लोग राजनीति में शक्तिशाली सेना की कथित दखलंदाज़ी और उसकी ख़ुफ़िया इकाई आईएसआई से तंग आ गए हैं.

पाकिस्तान सेना

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इसलिए सैन्य हस्तक्षेप, शरीफ़ का इस्तीफ़ा, फिर से चुनाव जैसे किसी भी समाधान को देश के बड़ी आबादी का समर्थन हासिल नहीं है.

लोग स्थायित्व और बेहतर सुरक्षा चाहते हैं ताकि अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें.

इस्लामिक स्टेट और तालिबान

लोग सरकार से दो चीज़ें चाहते हैं, बेहतर प्रशासन और अर्थव्यवस्था में सुधार. लेकिन इमरान ने तो केवल अगला प्रधानमंत्री बनने का वादा किया है.

पाकिस्तान, तालिबान

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स्थिरता का संदेश समान रूप से सेना तक भी पहुंचना चाहिए.

लोग <link type="page"><caption> सेना के उस खेल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/08/140820_pakistan_imran_politics_analysis_vr.shtml" platform="highweb"/></link> से तंग आ चुके हैं जिसके तहत वह कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में अपने मंसूबों को आगे बढ़ाने के लिए छद्म इस्लामी समूहों को समर्थन दे रही है.

आज पाकिस्तानी तालिबान और लाहौर तथा अन्य पंजाबी शहरों में सक्रिय इस्लामी गुट सीरिया और इराक़ के इस्लामिक स्टेट जितने ही ख़तरनाक हैं.

पाकिस्तान

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पाकिस्तान में लोग इस्लामी अतिवाद नहीं स्थायित्व चाहते हैं. वे अगला जन्म सुधारने के बजाय शिक्षा चाहते हैं जिससे उन्हें बेहतर अवसर और रोज़गार मिले.

संभव है कि पिछले एक महीने घटनाक्रम से लोगों में लोकतंत्र के प्रति निराशा का भाव पैदा हो लेकिन उन्हें स्थिरता तो किसी भी क़ीमत पर चाहिए.

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