चीन: पवन ऊर्जा से बिजली की ज़रूरतें पूरी होगी?

चीन
इमेज कैप्शन, झिंगजियांग विंड फार्म में मजदूर एक दिन में दो टर्रबाइन लगा रहे हैं.
    • Author, डेविड शुकमैन
    • पदनाम, विज्ञान संपादक

अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में चीन ने सबसे बड़ा कदम उठाया है.

चीन की योजना अगले छह सालों में पवन टर्बाइन की संख्या को दोगुना से भी ज़्यादा करने की है.

पवन ऊर्जा पैदा करने वाला चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश है. वह अपनी क्षमता में और विस्तार करने की योजना बना रहा है.

चीन की पवन ऊर्जा पैदा करने की <link type="page"><caption> मौजूदा क्षमता</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/12/111213_chile_necktie_vv.shtml" platform="highweb"/></link> 75 गीगावाट है. इसे साल 2020 तक बढ़ाकर 200 गीगावाट करने की योजना है.

इस क्षमता के मुकाबले यदि यूरोपीय संघ के देशों की कुल क्षमता का आकलन किया जाए तो पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उनकी संयुक्त क्षमता मात्र 90 गीगावाट है.

पवन क्षमता के विस्तार के लिए चीन के जिन सात क्षेत्रों को चुना गया है उनमें से एक शिनजियांग का सुदूर पूर्वी इलाका है.

बर्फ से ढकी पहाड़ियों और सर्द रेगिस्तान वाले इस इलाक़े में हजारों की संख्या में टर्बाइन लगाए गए हैं. अतिरिक्त नई इकाइयों को लगाने का काम जोर-शोर से चल रहा है.

चीन

टर्बाइन लगाने वाली कंपनी गोल्डविंड के इंजीनियर जियांग बो कहते हैं, "सात साल पहले हम दो दिन में मात्र एक टर्बाइन ही लगा पाते थे. मगर आज काम की गति का ये आलम है कि एक दिन में हम दो टर्बाइन लगा लेते हैं."

चुनौतियां

पवन ऊर्जा के क्षेत्र में क्षमता विकसित करने के रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं.

शिनजियांग जैसे अधिक हवा वाले इलाक़े उन शहरों से काफ़ी दूर है जहां बिजली की बहुत ज़रूरत है.

पवन ऊर्जा केंद्रों की संख्या अक्सर ग्रिड से टर्बाइन को जोड़ने वाले ज़रूरी कनेक्शनों की संख्या से ज़्यादा हो जाती है. कोयले से पैदा होने वाली बिजली को संभालने की आदी ग्रिड को हवा से पैदा होने वाली बिजली को संभालने में जूझना पड़ता है.

नतीजा ये होता है कि अधिक हवा वाले दिनों में भी कई पवन केंद्रों को बंद करना पड़ता है.

यही वजह है कि पिछले साल चीन में इस तरह के मौकों पर करीब 20 से 30 फीसदी टर्बाइन यूं ही बेकार रह गए. हालांकि पवन ऊर्जा उद्योग से जुड़े लोगोंका कहना है कि इन मुश्किलों का अब हल ढूंढ लिया गया है.

एक बुनियादी सवाल ये है कि चीन में ऊर्जा की बढ़ती भूख को पवन ऊर्जा कितना शांत कर पाएगी.

विशाल बाज़ार

ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक पवन ऊर्जा से देश की मात्र दो फ़ीसदी बिजली का उत्पादन किया जा सका जबकि कोयला 75 फ़ीसदी के साथ बिजली का सबसे बड़ा उत्पादक रहा.

चीन
इमेज कैप्शन, झिंगजियांग में हजारों टर्बाइनों को लगाया जा रहा है.

'ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल' के चीन के निदेशक लिमिंग किआयो का कहना है, "दो फीसदी सुनने में बहुत कम लगता है मगर जब हम चीन में बिजली के कुल उत्पादन के बारे में विचार करेंगे तो ऐसा नहीं पाएंगे."

उन्होंने कहा, "बल्कि पिछले साल परमाणु ऊर्जा को पीछे छोड़ते हुए पवन ऊर्जा कोयले और पनबिजली के बाद तीसरे नंबर पर आ गई है. इसने काफी क्षमता भी विकसित कर ली है."

पवन ऊर्जा से जुड़े बाज़ार का विशाल आकार बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इससे कीमतें कम हुई हैं और नए आविष्कारों को भी बढ़ावा मिला.

हाल तक चीन के पवन ऊर्जा उत्पादक लाइसेंस के तहत पश्चिमी डिजाइन वाले टर्बाइनों का उत्पादन करते थे.

कम खर्चीला

इस 'विंड बूम' से नई डिज़ाइनों की बाढ़ आ गई है. उदाहरण के लिए गोल्डविंड कंपनी ने ऐसे टर्बाइन डिज़ाइन किए हैं जिनमें गियरबॉक्स की ज़रूरत नहीं होती.

इसमें 'सीधे ड्राइव' की क्षमता होती है और इसी वजह से रखरखाव में यह कम ख़र्चीला साबित हुआ है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के पाओलो फ्रैंक्ल का अनुमान है कि चीन में हो रहे इस विकास से वैश्विक स्तर पर कीमतें कम हो जाएंगी. फ्रैंक्ल को उम्मीद है कि सस्ता होने के कारण चीन की टर्बाइन विदेशी खरीदारों को ज़्यादा लुभाएंगी.

उन्होंने कहा, "चीनी उत्पादकों के लिए निर्यात अनुपात बढ़ेगा और एशियाई देशों, लैटिन अमरीका और अफ्रीका में उन्हें नए बाजार मिलेंगे."

सब्सिडी

चीन की सरकार ने अपनी रणनीतियों में अक्षय ऊर्जा को प्राथमिकता दे रखी है. इसकी क्षमता में ज़्यादा से ज़्यादा विस्तार करने के लिए सब्सिडी की व्यवस्था भी की गई है.

चीन
इमेज कैप्शन, अक्षय ऊर्जा को चीन की सरकार ने अपनी प्राथमिकता सूची में रखा है.

चीन के कई शहरों में वायु प्रदूषण का संकट गहरा जाने के कारण अक्षय ऊर्जा को और मजबूत किए जाने की योजना बनाई गई है.

मगर सवाल अब भी वही है कि क्या इन सबके बावजूद कोयले से पैदा होने वाली बिजली की लागत के मुकाबले पवन ऊर्जा की लागत कम हो सकेगी.

गोल्डविंड के वाइस प्रेसिडेंट मा जिनरू को अंदेशा है कि एक वक्त ऐसा आएगा जब जीवाश्म ईंधन का अभाव हो जाएगा.

वे कहते हैं, "एक दिन ऐसा आएगा जब संसाधन सीमित हो जाएंगे और कीमतें ऊंची हो जाएंगी. प्रदूषण उच्चतम स्तर पर होगा. तब समाज इसकी कीमत वसूल करेगा. इसका परिणाम ये होगा कि दीर्घकाल में पवन ऊर्जा कोयले से भी सस्ती हो सकती है."

उनके अनुसार, "पवन ऊर्जा की लागत तकनीकी आविष्कारों से कम हो जाएंगी. और इस तरह विद्युत आपूर्ति के लिए पवन ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक स्तर पर विकास होगा."

कोई देश अगर पवन ऊर्जा का व्यवसायीकरण कर इससे मुनाफा कमा सकता है तो वह चीन है.

और ऐसे भविष्य की झलकियां आपको झिंगजियांग के सिल्क रोड के किनारे देखने को मिल जाएंगी. इस पुराने व्यापार मार्ग पर आपको सफेद टर्बाइन खड़ी मिल जाएंगी. कुछ तैयार तो कुछ अधूरी.

<bold>(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे <link type="page"><caption> फ़ेसबुक पन्ने</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>