पेट्रोल बम के ख़ौफ़ से जूझता एक देश

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ढाका से
26 दिसंबर की दोपहर मोहम्मद आलमगीर अपनी दुकान के लिए सब्ज़ी ख़रीद कर एक बस में बैठे ही थे कि एकाएक उनके सामने एक तेज़ विस्फोट हुआ और उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया.
40 वर्षीय आलमगीर को होश आने में तीन दिन लगे. जब होश आया तो लगा चेहरे पर कोयले की भट्टी जल रही है और हाथों की उँगलियाँ ढूंढने पर भी नहीं मिल रहीं.
दरअसल आलमगीर की बस जब बांग्लादेश के गाज़ीपुर ज़िले से गुज़र रही थी तो कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी बस पर पेट्रोल बमों से हमला किया था.
जब उनकी आँख खुली तो उन्होंने ख़ुद को ढाका मेडिकल कॉलेज की 'बर्न यूनिट' यानी अस्पताल में जले हुए लोगों का इलाज करने वाले विभाग के एक बिस्तर पर पड़ा पाया.
आलमगीर जब अस्पताल लाए गए थे तब उनका शरीर 62% जल चुका था.
'बदन में आग'

उन्होंने बताया, "बस की खिड़की के पास बैठे थे, एकाएक नीचे से किसी ने कुछ बोतल की तरह का उछाला. जब गोद में गिरा तो देखा उसमे आग लगी थी और फिर कुछ याद नहीं."
कुछ ऐसी ही कहानी 52 वर्षीय जहाँआरा बेगम की है. छह दिसंबर, 2013 की सुबह वे अपने किसी रिश्तेदार से मिलने एक ऑटो रिक्शे में बैठ कर जा रही थीं.
राजधानी ढाका से बाहर निकले हुए कुछ ही मिनट हुए थे कि एकाएक ऑटो रिक्शा के दोनों तरफ दो मोटरसाईकिलें चलने लगीं और उनमे से एक के सह-चालक ने थ्री-व्हीलर के भीतर दो बड़ी बोतलें फेंक दीं.
इंसके बाद जो धामाका हुआ उसके बारे में जहाँआरा बेगम को कुछ भी याद नहीं.
वो कहती हैं, "मैं तो चिल्लाने लगी थी जब लगा बदन में आग सी लग गई है. बाल झुलस रहे थे, मुँह से ख़ून बाहर आ रहा था और मैं होश भी खो रही थी."
एक ही वजह

फ़िलहाल जहाँआरा ख़तरे से तो बाहर बताईं जा रहीं हैं लेकिन शायद उम्र भर ठीक से चल सकने में उन्हें दिक्क़त रहेगी.
इस तरह के तामाम हादसों के पीछे की एक ही वजह है. पेट्रोल बम.
ढाका के सह पुलिस आयुक्त मोनिरुल हसन के मुताबिक़ इस पेट्रोल बम को बनाने में महज़ एक घंटा लगता है और इसमें लागत आती है क़रीब 50 से 100 टका यानी औसतन 75 भारतीय रुपए.
लेकिन सवाल ये है कि ये पेट्रोल बम बनता कैसे है?
मोनिरुल हसन ने बताया, "एक कांच की बोतल में क़रीब पौन लीटर पेट्रोल और उनमें एक पलीता चाहिए. हमला करने से ठीक पहले पट्टी में आग लगा कर इसे निशाने पर फेंक दिया जाता है. उसके तुरंत बाद इसमें एक विस्फोट होता है जिससे इसके दायरे में आने वाले कम से कम तीन-चार लोग प्रभावित ज़रूर होते हैं."
महामारी

रहा सवाल इसके इस्तेमाल और इसकी रोकथाम का.
मोनिरुल हसन ने कहा, "पिछले एक महीने से ये पेट्रोल बम फेंकने की घटनाएँ इतनी बढ़ गईं हैं कि पूरे बांग्लादेश में इनकी संख्या एक हज़ार को पार चुकी हैं. हमने मोटरसाइकिलों पर पीछे बैठने का प्रतिबन्ध लगा दिया है और सभी पेट्रोल पम्पों को निर्देश दे दिए गए हैं कि खुला तेल न बेचें."
लकिन हक़ीक़त यही है कि आज बांग्लादेश एक ऐसे हमले से ख़ौफ़ में हैं जिसके बारे में यहाँ के लोगों ने कुछ महीने पहले तक सुना भी नहीं था और देखा भी नहीं था.
मैं जब पेट्रोल बम से हताहत हुए लोगों की सुध लेने अस्पताल पहुंचा और वहाँ पड़े बिस्तरों का तांता देखा तो लगा कि ये पेट्रोल बम हमले तो महामारी की शक्ल अख्तियार करते जा रहे हैं.
कई ऐसे मरीज़ देखे जिनके बारे में न तो यहाँ पर लिखने लायक़ है और न ही आपको बताने लायक, क्योंकि वे ज़िन्दगी और मौत के बीच बस करवट ले रहे थे.
'सांस में आग'

ख़ुद ढाका मेडिकल कॉलेज में वर्ष 1986 में बर्न यूनिट को स्थापित करने वाले डॉक्टर शुमंतोलाल सेन ने स्वीकार किया कि इस तरह के मामले उन्होंने अपने करियर में पहले कभी नहीं देखे.
उन्होंने बताया, "आज की तारीख़ में पूरे बांग्लादेश मे इस तरह की एक ही सुविधा है. लेकिन हिंसा के चलते हमारे ऊपर इतना दबाव है कि मरीज़ फ़र्श पर लेते हैं. पेट्रोल बम से नुक़सान यही है कि प्रभावित व्यक्ति आग को सांस में लेने पर मजबूर हो जाता है."
"सिर्फ़ हमारे यहाँ, पिछले एक महीने में हम 84 ऐसे लोगों के इलाज में लगे रहे हैं. उनमे से 19 की मौत यहीं पर हुई. दूसरों का इलाज किसी तरह जारी है."
डॉक्टर शुमंतोलाल सेन ने कहा कि पेट्रोल बम हमले में घायल हुए लोगों का इलाज करने के साथ साथ उनकी प्लास्टिक सर्जरी भी करनी पड़ती है क्योंकि शरीर में बुरे घाव होने के कारण उनकी त्वचा पूरी तरह जल चुकी होती है.
राजनीतिक खींचा तानी

अबु मियाँ की हालत ठीक वैसी है जैसी डॉक्टर शुमंतोलाल सेन ने बयान की थी.
इनका चेहरा हमेशा के लिए ख़राब हो चका है और हाथ की उँगलियों को एक दूसरे से अलग करने के लिए प्लास्टिक सर्जरी के बावजूद कई वर्ष लगेंगे. अबु एक मिस्त्री का काम करते हैं और ढाका से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर अपने गहर को जा रहे थे जब इनकी बस में एक एक करके तीन पेट्रोल बम फेंके गए.
दुर्भाग्यवश एक बम इनकी गोद में आकर गिरा और इनके चेहरे और हाथ पर असर कर गया. रोज़ दिहाड़ी कमा कर के घर चलाने वाले 42 वर्षीय अबु मियां कब ठीक होंगे इसका न तो उन्हें पता है न ही घर में इंतज़ार कर उनके बच्चों को.
लेकिन इस बात का पता सभी को है कि पिछले एक महीने से बांग्लादेश में चुनाव में हिस्सा लेने या न लेने को लेकर जो राजनीतिक खींचा तानी चल रही है, उसमें ज़्यादातर निर्दोष लोग ही चपेट में आ रहे हैं.
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