वॉशिंगटन की टैक्सी 'पॉलिटिक्स'

- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
वाशिंगटन की टैक्सी पॉलिटिक्स भी काफ़ी हद तक ड्रॉइंग रूम पॉलिटिक्स की तरह होती है. आप बिना किसी शर्म-संकोच के पूरी दुनिया को नसीहत दे सकते हैं.
बराक ओबामा हों या नवाज़ शरीफ़ सबको सरकार चलाने के नुस्ख़े बता सकते हैं.
और टैक्सी पॉलिटिक्स में तो यह छूट भी होती है कि बगल वाले ड्राइवर पर ग़ुस्सा आ रहा हो, तो उसे अपनी मनपसंद गालियों के साथ भद्दे इशारों से अपनी मन:स्थिति से रूबरू करवा सकते हैं.
नवाज़ शरीफ़ के वॉशिंगटन दौरे की रिपोर्टिंग के दौरान मेरा पाला ऐसे कई टैक्सी चालकों से पड़ा, जिनकी गाड़ी में दिनभर नेशनल पब्लिक रेडियो बजता है, वो पूरी दुनिया की राजनीति और कूटनीति से अवगत रहते हैं और तलाश में रहते हैं मेरे जैसे किसी पैसेंजर की, जिस पर वो अपना विश्व-ज्ञान लाद सकें.
इनमें से एक साहब सोमालिया से थे. पिछले 27 साल से अमरीका में बसे हुए हैं पूरे घर-परिवार के साथ. टैक्सी बिल्कुल नए मॉडल की होंडा गाड़ी और दुनिया की हर समस्या के लिए अमरीका को ज़िम्मेदार मानते हैं.
सुबह के ग्यारह बजे ही वे चिलम का कश लगा चुके थे, आंखें लाल थीं, गाड़ी में गांजे की महक थी. गाड़ी में बैठते ही मुझसे उन्होंने सवाल किया-यहां इतनी भीड़ क्यों है?
मैंने कहा-पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आए हुए हैं.
जवाब था- अरे हां, हां ड्रोन हमले रुकवाने की बात कर रहे हैं भाषणों में. इन सबको पहले से पता होता है कि ड्रोन हमले होने वाले हैं, ये सब बस दिखावा है.
मनमोहन सिंह
उसके बाद पंद्रह मिनट तक मैंने ज़ुबान नहीं खोली और हमारे अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक का मोनोलॉग चलता रहा. फिर उन्होंने सीधा सवाल किया आप पाकिस्तान से हैं? मैंने कहा-नहीं भारत से.
अब तो बस मनमोहन सिंह की शामत आ गई. भाई साहब शुरू हुए- वो जो आपके सिख प्रधानमंत्री हैं, वही कौन से अच्छे हैं. (आदरसूचक संबोधन मैं अपनी तरफ़ से लगा रहा हूं. उनका लहज़ा तो यही था मानो ये सब नेता उनके दरबार के मुलाज़िम हों.) आपके यहां तो इतना भ्रष्टाचार है कि पूछो मत. मेरे कुछ पहचान वाले भारत गए थे और उन्होंने बताया बिना पैसा दिए कोई काम नहीं होता.
मेरे पूछने पर बताया कि वे सोमालिया से हैं. उनके शब्दों में सोमालिया में आजकल अमन और सुकून का माहौल है, जो समुद्री लुटेरों की बात होती है वो पड़ोस के देशों से आए हुए हैं या फिर कुछ गुमराह नौजवान. बिल्कुल सही कह रहे होंगे!
अगले दिन मिले किसी मध्यपूर्व देश से आए हुए ड्राइवर. इनकी ख़ासियत थी आसपास चलती हर गाड़ी को पहले अंग्रेज़ी में और फिर अरबी में चुनी हुई ग़ालियां देना और महिला ड्राइवरों पर ये ख़ास मेहरबान थे. इन्हें पहले से ही पता था कि नवाज़ शरीफ़ शहर में हैं और पूरे शहर की ट्रैफ़िक परेशानियों के लिए वो मियाँ साहब को ही ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे. थोड़ी देर के व्याख्यान के बाद उनका ग़ुस्सा फूटा ओबामा पर.
ग़रीब अमरीका

बोले, “ये आदमी तो जॉर्ज बुश से भी बुरा निकला. इसे क्या लगता है ड्रोन से एक चरमपंथी को निशाना बना लिया और आतंकवाद ख़त्म. ऐसा वही लोग सोचते हैं, जिनका ज़मीनी हक़ीक़त से कुछ लेना-देना नहीं है.”
यह जनाब भी पिछले 35 साल से अमरीका में हैं और एक बार यहां आए तो फिर कभी वापस अपने देश का रुख़ नहीं किया. इनसे बेहतर ज़मीनी हक़ीकत कौन जान सकता है!
और फिर मिले लाहौर के चौधरी साहब. मिलते ही शुरू हुए- फिर आ गए हैं ये लोग अपनी लिस्ट लेकर. यहां तो अमरीकी अपना ही गुज़ारा नहीं चला पा रहे, इन्हें क्या देंगे? पाकिस्तान की हर परेशानी के लिए नवाज़ शरीफ़ ही ज़िम्मेदार हैं...फौज को लोग यूं ही बदनाम करते हैं.
दस मिनट तक मैंने पंजाबी में उनका व्याख्यान सुना, आप जितनी पंजाबी गालियां सोच सकते हैं, सब उनमें शामिल थीं और निशाने पर थे राजनीतिज्ञ. उन्होंने यह भी कहा कि वे पाकिस्तान में राजनीति शास्त्र में ग्रेजुएशन करने के बाद यहां आ गए थे. लेकिन यहां आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए तो टैक्सी ख़रीद ली और आज ऊपर वाले ने बहुत कुछ दे रखा है.
मैंने वर्ल्ड बैंक के दफ़्तर के सामने गाड़ी रोकने को कहा, उन्हें लगा कि वहीं काम करता हूं. जब तक मैं किराये के पैसे निकालता, वो वर्ल्ड बैंक पर शुरू हो चुके थे. मैं जितनी जल्दी निकल सकता था, गाड़ी से निकला. एक नया भाषण सुनने के लिए जितनी हिम्मत चाहिए थी, वो मुझमें अब नहीं बची थी.
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