क्या है अमरीकी बजट पर झगड़ा?

वाशिंगटन में बजट के ऊपर झगड़ा लगता है सालाना रस्म बन गया है. अब फिर ख़बरें गर्म हैं कि रिपब्लिकन पार्टी और सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी की राजनीतिक कुश्ती के चलते दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पटरी से उतर सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर सरकार और इसके विरोधी सांसदों के बीच कोई समझौता नहीं होता है तो मंदी से बाहर खिसक रही अमरीकी अर्थव्यवस्था वापस मंदी के भंवर में फंस जाएगी. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के बीच तनाव इस बार पिछली इस बार से ज़्यादा है. हालत पर एक नज़र
क्या अमरीका ठप हो जाएगा ? कब ?
एक अक्टूबर से.

तकनीकी रूप से अमरीकी संसद को सरकार को देश चलाने के लिए राष्ट्रीय बजट को 30 सितंबर तक पास करना होता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में जब भी सरकार और संसद के बीच टकराव की हालत पैदा होती है कुछ सीमित अवधि के बजट पास कर दिए जाते हैं ताकि देश चलता रहे.
अगर अगले सप्ताह तक संसद से किसी किस्म का कोइ बजट पास नहीं होता है तो देश की तमाम व्यवस्थाओं को चलाने के लिए सरकार के पास कोई पैसा नहीं होगा.
तमाम "गैर ज़रूरी कर्मचारियों" को घर बैठा दिया जाएगा. अमरीका के करीब 21 लाख सरकारी कर्मचारियों में से लगभग 7 लाख से ऊपर इसी श्रेणी में आते हैं.
केवल हवाई अड्डों में हवाई यातायात का संचालन करने वाले, फ़ौजी और सीमा सुरक्षा बल के लोगों को छोड़ तमाम कर्मचारी प्रभावित होंगे.
संघीय सरकार द्वारा चलाये जा रहे पार्क बंद हो जायेंगे, देश की सरकार नए पासपोर्ट नहीं जारी कर पायेगी और तो और व्हाईट हाउस में से भी कई कर्मचारियों को काम पर ना आने के लिए कह दिया जाएगा .
इसके पहले ऐसा कभी हुआ है?
इसके पहले साल 1995 के दिसंबर में ऐसे हालात 28 दिन के लिए बने थे. उस वक़्त राष्ट्रपति बिल क्लिंटन थे. साल 2011 में भी ऐसे हालात बनते बनते बचे थे.
अगर बजट पास हो जाता है तो सब चैन की बंसी बजा सकते हैं ?
इतनी जल्दी नहीं. कई लोगों के लिए 1 अक्टूबर की सीमा रेखा उतनी चिंता जनक नहीं है जितनी वो सीमा रेखा जो अक्टूबर के मध्य में आने वाली है. क्योंकि अगर कर्ज़ की सीमा रेखा नहीं बढ़ी तो अमरीकी सरकार ने जो पहले से क़र्ज़ ले रखे हैं उनको समय पर चुकाना मुश्किल हो जाएगा.

अमरीकी वित्त मंत्री जैक ल्यु पहले से हिसाब खातों में किसी तरह से रास्ता निकाल कर देश के बिलों का भुगतान कर रहे हैं. देश की संघीय सरकार के क़र्ज़ लेने की 16.7 ख़रब डॉलर की सीमा रेखा तो मई में ही निकल गई.
कई दूसरे विकसित देशों से अलग अमरीका में कार्यपालिका नहीं विधायिका या संसद यह तय करते हैं कि सरकार कामकाज चलाने के लिए कितना क़र्ज़ ले.
इसके पूर्व में क़र्ज़ लेने की सीमा बिना किसी नाटकीय घटनाक्रम के बढ़ते आई है. साल 1960 से यह सीमा 78 बार बढ़ाई जा चुकी है. पर पिछले तीन साल से रिपब्लिकन बराक ओबामा के साथ इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. रिपब्लिकन बजट में अपनी पसंद के बदलाव चाहते हैं.
इसके पहले 2011 में आखिरी मौके पर दोनों पक्षों के बीच होने वाले दांव पेंचों के चलते क्रेडिट एजेंसी स्टैण्डर्ड एंड पूअर अमरीकी अर्थव्यवस्था की रेटिंग गिरा दी थी ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था.
तो यह पूरा हंगामा फिर से क्यों हो रहा है?
क्योंकि दोनों में से कोई भी पक्ष चंद महीनों से ज़्यादा के अमरीकी बजट के बिन्दुओं पर राज़ी नहीं हुआ है. दोनों ही पक्षों ने छोटी-छोटी बातों पर कुछ तोल-मोल किया और तात्कालिक काम चलाऊ रास्ते निकाल लिए लेकिन मुख्य बिन्दुओं पर रास्ता नहीं निकला.
इस बार यह झगड़ा मुख्य रूप से राष्ट्रपति बराक ओबामा के अमरीकी स्वास्थ्य क्षेत्र में किये गए सुधारों पर है. रिपब्लिकन किसी तरह से इसे लागू नहीं होने देना चाहते. ओबामा द्वारा लाये बदलावों में से कई 1 अक्टूबर लागू हो जायेंगे.

रिपब्लिकन पार्टी मानती हैं कि सरकार को कम से कम क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी रखना चाहिए.
ज़्यादा से ज़्यादा अमरीकी लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाने के उद्दयेश से किए गए इन सुधारों को रिपब्लिकन पार्टी के सहयोग के बिना ही संसद से पास करा लिया गया था.
रिपब्लिकन इस सुधारों के पास होने के बाद से 42 बार इस बिल को रद्द करने या इसमें व्यापक बदलाव के लिए वोट डाल चुके हैं.
क्या कोई रास्ता निकल सकता है?
ज़्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि व्हाईट हाउस और संसद के बीच कोई रास्ता निकल आएगा और संसद के दोनों सदन कम से कम तीन महीने के लिए तो बजट पास कर ही देंगे.
हर किसी को अंदाज़ हैं कि अगर कोई देश अपने ख़र्चों का भुगतान नहीं कर पाता है तो क्या-क्या हो सकता है. अमरीका ने आज तक ऐसा नहीं किया है. अमरीका में अनिश्चितता के कारण भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाज़ार विचलित हैं और गिर रहे हैं.
ओबामा अपनी बात पर अड़े हुए हुए हैं और वो मानते हैं कि उनका दूसरी बार चुनाव जीतना इस बात का सबूत हैं कि अमरीकी जनता उनसे सहमत है.
दूसरी तरफ रिपब्लिकन सांसद भी अड़े हुए हैं.
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