बड़े बदलाव से गुज़रती ब्रिटेन की लेबर पार्टी

- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
दुनिया भर में ज़्यादातर लोग कामगार या किसान हैं, इसलिए 'कॉमन-सेंस' यही कहता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी ख़ासी हिस्सेदारी होनी चाहिए, मगर पूंजीवादी लोकतंत्र में ऐसा शायद ही कहीं दिखता है.
भारत में श्रमिक संगठन बुरी तरह पस्त हो चुके हैं लेकिन यूरोप में ब्रिटेन, जर्मनी, स्पेन और फ्रांस कुछ ऐसे देश हैं जहाँ लेबर पार्टी, वर्कर्स पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी सरीखे नामवाले दल या तो सत्ता में हैं या मज़बूत विपक्ष हैं.
ये ज़रूर है कि उनके तेवर भी पहले वाले नहीं है हालाँकि नाम और पुराने काम की वजह से कामगार वर्ग का समर्थन उन्हें आज भी मिलता है.
ऐसी ही पार्टी है ब्रिटेन की लेबर पार्टी, जो एक बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रही है. पार्टी मज़दूर संगठनों की उपज है और उनसे सीधे तौर पर जुड़ी रही है, अब तक व्यवस्था ऐसी रही है कि उन संगठनों के सदस्यों का चंदा अपने-आप लेबर पार्टी के खाते में जाता है.
मिलिबैंड का प्रस्ताव
लेकिन अब लेबर नेता एड <link type="page"><caption> मिलिबैंड</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/05/100512_labour_milliband_vv.shtml" platform="highweb"/></link> ने प्रस्ताव रखा है कि तीस लाख यूनियन मेंबरों का चंदा सीधे पार्टी के खाते में जाने के बदले स्वेच्छा पर आधारित हो, इसे कुछ लोग एक साहसिक क़दम मान रहे हैं तो कुछ आत्मघाती.
श्रमिक संगठनों का मानना है कि लेबर पार्टी उनसे किनारा करने की कोशिश के तहत ऐसा कर रही है, वहीं कुछ लोग इसे नीतिगत स्तर पर लेबर पार्टी की आज़ादी की लड़ाई बता रहे हैं.
भारत के हिसाब से देखें तो ये ऐसा ही है कि कम्युनिस्ट पार्टी, ट्रेड यूनियनों से अलग होने की कोशिश करे या फिर भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से. माना जा रहा है कि एड मिलिबैंड ट्रेड यूनियन नेताओं की पकड़ से बाहर निकलना चाहते हैं जो पार्टी को हर साल अस्सी लाख पाउंड का चंदा देते हैं.
मगर <link type="page"><caption> मिलिबैंड</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/05/100515_milibands_psa.shtml" platform="highweb"/></link> का कहना है कि वे व्यापक चुनाव सुधार चाहते हैं, उनके कुछ प्रस्ताव काफ़ी दिलचस्प हैं जिनके बारे में भारत को भी सोचना चाहिए क्योंकि यह बहस भारत के लिए नई नहीं है, जिन चीज़ों को भ्रष्टाचार की जड़ माना जाता है उनमें राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग भी है.
सुझाव

ब्रिटेन में विपक्ष के नेता का सुझाव है कि राजनीतिक दलों की फंडिंग सरकार करे, इसके अलावा वे आम जनता से <link type="page"><caption> चंदा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/rolling_news/2012/04/120422_britian_brown_rn_sa.shtml" platform="highweb"/></link> लें, मगर चंदे के एकाउंट में पूर्ण पारदर्शिता हो और कोई भी व्यक्ति किसी पार्टी को पाँच हज़ार पाउंड यानी लगभग पाँच लाख रुपए से अधिक चंदा न दे सके.
ये देखना दिलचस्प होगा कि इस पर सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी की क्या प्रतिक्रिया होगी क्योंकि पार्टी की आमदनी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा निजी चंदों से आता है, अक्सर ये चंदे बड़े पूंजीपतियों की तिजोरी से आते हैं जो लाखों पाउंड होते हैं.
एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि "एड मिलिबैंड अपनी एक आँख गँवाकर, कंज़रवेटिव पार्टी को अंधा कर देना चाहते हैं".
बहरहाल, मंशा आँख फोड़ने की हो या चुनाव सुधार की, असल बात यही है कि लेबर पार्टी मज़दूर संगठनों से अपने रिश्तों को लेकर असहज है क्योंकि वह कई मायनों में मॉर्डन दिखना चाहती है, ख़ास तौर पर पूंजीपतियों के सामने.
वहीं कंज़रवेटिव पार्टी भी अमीरों के साथ अपने रिश्तों को लेकर बहुत सहज होने से डरती है, क्योंकि उसे सिर्फ़ अमीरों का चंदा नहीं, आम जनता का वोट भी चाहिए.
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