'देर रात फ़ोन क़ॉल यानी संस्कृति भ्रष्ट'

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो देर रात बातें करने के लिए फ़ोन कंपनियों के पैकेज पर रोक लगाने संबंधी पाकिस्तान सरकार के फ़ैसले की कड़ी आलोचना हो रही है.
मोबाइल कंपनियां अपना बिज़नेस बढ़ाने के मक़सद से ग्राहकों को रात में सस्ती या मुफ्त कॉल का प्रलोभन देती हैं.
पाकिस्तान की सूचना तकनीक और दूरसंचार मंत्री अनुषा रहमान का कहना है कि 'ये कंपनियां पाकिस्तान की संस्कृति भ्रष्ट कर रही हैं.'
समाचार पत्र 'द नेशन' के मुताबिक़ हाल ही में रहमान ने पाकिस्तानी सीनेट को बताया था कि सरकार ने मोबाइल कंपनियों को सख़्त निर्देश दिए हैं कि वो रात में दिए जाने वाले पैकेज तुरंत बंद कर दें.
सदन में ताहिर हुसैन मशद्दी के रखे प्रस्ताव पर टिप्पणी करते हुए अनुषा रहमान ने कहा था कि कंपनियों को ये बंद कर देना चाहिए.
हालांकि देश का नागरिक समाज, सोशल मीडिया और उपभोक्ता वर्ग इस प्रस्ताव के हक़ में नहीं हैं.
पाकिस्तान के एक अन्य अख़बार 'टुडे' के मुताबिक, "लोगों का मानना है कि परिभाषित किए जाने के लिहाज से संस्कृति एक बेहद सूक्ष्म शब्द है और ये तभी कहा जा सकता है जब वाकई इसे नष्ट किया जा रहा हो."
इसके अलावा लोग सरकार के इस क़दम को उनकी आज़ादी में दखल मान रहे हैं.
लाहौर कंज़र्वेटिव सोसायटी के डॉ. ऐजाज़ अनवर का कहना है ‘‘हमें अपने बच्चों को ऐसी सीख देनी चाहिए जिससे वो सही और ग़लत में फ़र्क करने में ख़ुद सक्षम हो सकें. मोबाइल पर बातें करने पर रोक लगाने का मतलब उन्हें लिखकर चैटिंग करने की ओर धकेलेगा. ये पिछली पीढ़ी के बच्चे नहीं हैं. ये इंटरनेट वाली पीढ़ी है.’’
बदलाव की बयार

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले क़ुद्सिया सज्जाद मानते हैं कि टीवी चैनलों के आने के बाद समाज काफ़ी बदल चुका है और रात में बातें करना इसी बड़े बदलाव का एक पहलू है. सज्जाद मानते हैं कि इन पर रोकर लगाने से मसला सुलझेगा नहीं.
ऐसे ही एक अन्य कार्यकर्ता साजिद मिन्हास ने पाकिस्तान टुडे से कहा है कि ''इस तरह के क़दम अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं. मिन्हास कहते हैं कि दूरसंचार कंपनियां पाकिस्तान में दुनिया की सबसे सस्ती दरों पर कॉल मुहैया कराती हैं इसलिए ये रणनीति का हिस्सा है. ऐसे किसी भी क़दम से उनका पूरा बिज़नेस मॉडल प्रभावित होगा.''
ट्विटर पर इसे लेकर ज़्यादा प्रतिक्रिया तो नज़र नहीं आई लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इसे उनकी निजता पर हमला माना है.
पत्रकार अरशद शरीफ़ ने टवीट् किया कि "शॉर्टकट अपनाने की बजाय व्यवस्था पर ध्यान देने की ज़रूरत है. परिवार, माता-पिता और शिक्षक एक इंसान के नैतिक मूल्य निर्धारित करते हैं ना कि रात में फ़ोन पर बातें करना.
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