तीन लोगों से आईवीएफ को इंग्लैंड में इजाज़त

- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज
इंग्लैंड सरकार ने तीन लोगों से डीएनए लेकर बच्चों को जन्म देने के लिए अनुमति देने की पूरी तैयारी कर ली है.
इस तरह की <link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/04/130411_test_tube_baby_dp.shtml" platform="highweb"/></link><link type="page"><caption> आईवीएफ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/04/130411_test_tube_baby_dp.shtml" platform="highweb"/></link> तकनीक को सरकार का समर्थन मिल गया है. इंग्लैंड ऐसी अनुमति देने वाला पहला देश होगा.
इस प्रस्ताव का अंतिम मसौदा साल के अंत तक आ जाएगा. अनुमान है कि 2014 में इस पर संसद में बहस और मतदान होगा. अगले दो सालों में यह सुविधा लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगी.
विशेषज्ञों का कहना है कि तीन व्यक्तियों वाले आईवीएफ से माता से शिशु में जाने वाले उन माइटोकांन्ड्रिया को ख़त्म किया जा सकता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक होते हैं या उसे कमजोर करते हैं.
इस निर्णय के विरोधियों का कहना है कि यह अनैतिक है और यह इंग्लैंड को गिरावट की राह पर ले जाएगा.
आलोचकों का यह भी कहना है कि ज़रूरतमंद दंपति बच्चा गोद ले सकते हैं या फिर डिम्ब दान देने वालों की सहायता ले सकते हैं.
माइटोकॉन्ड्रिया

माइटोकॉन्ड्रिया एक कोशिका होती है. इसे मानव शरीर का पावर हाउस भी कहते हैं. इससे पूरे शरीर को ऊर्जा मिलती है.
बच्चे में माइटोकॉंन्ड्रिया माता ही के डिम्ब से आता है.
समस्याजनक माइटोकॉंन्ड्रिया 65,000 बच्चों में से एक बच्चे को प्रभावित करता है. इस समस्याजनक माइटोकॉंन्ड्रिया से ग्रस्त बच्चे को ऊर्जा की कमी महसूस हो सकती है. मांस-पेशियों में कमजोरी हो सकती है. दृष्टिहीनता और ह्रदयाघात हो सकता है. कुछ अपवाद मामलों में इससे मृत्यु भी हो सकती है.
शोधकर्ताओं का दावा है कि किसी दानदाता के अण्डज के प्रयोग से बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है.
अनुमान है कि इस इलाज से साल में करीब दस दंपतियों को लाभ हो सकता है.
इस तकनीक के प्रयोग से जन्म लेने वाले बच्चों में दो अभिभावकों का डीएनए होगा और इसी में तीसरे दाता के डीएनए का जरा सा हिस्सा होगा. गौरतलब है कि माइटोकॉंन्ड्रिया का अपना ख़ुद का डीएनए होता है.
'संवेदनशील मामला'

साल की शुरुआत में ब्रिटेन की संस्था ‘द ह्यूमन फर्टिलाइज़ेशन एंड एमब्रिऑलोजी अथॉरिटी’ की जनमत आधारित रिपोर्ट में कहा गया था कि इस विचार पर आमतौर पर लोगों का समर्थन प्राप्त है और ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि आईवीएफ असुरक्षित है.
इंग्लैंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी प्रोफेसर डैम सैली डेविस ने कहा कि “वैज्ञानिकों ने पूरी तरह नई तकनीक का विकास किया है. इस तकनीक से बीमारियों के एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में जाने में रोक लग सकेगी. इससे उन परिवार को नई उम्मीद मिलेगी जो नहीं चाहते कि उनके बच्चे उनकी बीमारियाँ ग्रहण करें.”
डॉ सैली कहती हैं कि “हमारी कोशिश है कि हम जीवन-रक्षक चिकित्सा का जल्द से जल्द अमल में लाएँ. निस्संदेह यह काफी संवेदनशील मामला है लेकिन मुझे निजी तौर पर इससे कोई दिक्कत नहीं है.”
वैज्ञानिकों ने दो ऐसी नई तकनीकों का विकास किया है जिसकी सहायता से माता से आनुवंशिक सूचनाएँ लेकर दाता के स्वस्थ अण्डजों में प्रवेश करा दिया जाता है.
परिणामस्वरूप ऐसे बच्चों का जन्म होता है जिनमें <link type="page"><caption> तीन व्यक्तियों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/03/130320_baby_birth_vs.shtml" platform="highweb"/></link> से प्राप्त आनुवंशिक सूचनाएँ होंगी.
<link type="page"><caption> इन बच्चों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2012/07/120703_testtube_baby_ml.shtml" platform="highweb"/></link> में बीस हज़ार से ज़्यादा जीन उसके माता-पिता के होंगे और 37 माइटोकॉंन्ड्रिया जीन दाता के होंगे.
दूरगामी ख़तरे

इस प्रयोग के बहुत दूरगामी परिणाम हो सकते हैं क्योंकि वैज्ञानिकों भविष्य में भी आनुवंशिक रूप से प्राप्त जीनों में छेड़छाड़ करते रहेंगे.
जब से इस तरह के प्रयोग की बात सामने आई है तभी से इसका विरोध भी हो रहा है.
ह्यूमन जेनेटिक्स अलर्ट के निदेशक डॉ. डेविड किंग कहते हैं, “ये तकनीक ग़ैर-ज़रूरी और असुरक्षित है. असल में ज़्यादातर लोगों ने इसे ख़ारिज कर दिया था. यह एक ख़तरनाक निर्णय है. यह लक्ष्मणरेखा को लांघने जैसा है. इसका परिणाम यही होगा कि मनचाहे डिजाइनर बच्चों का बाज़ार खुल जाएगा.”
आनुवंशिक बीमारी की वजह से अपने छह बच्चे खो चुकी शैरोन बर्नार्डी कहती हैं, "आपको रोज इस दर्द के साथ जीना पड़ता है. आप इससे कभी भी उबर नहीं पाते. अगर यह तकनीक पहले आई होती तो मेरी ज़िदंगी आज कुछ अलग होती."
मस्तिष्क और स्नायु तंत्र को प्रभावित करने वाले मीलस सिंड्रोम से पीड़ित रैशेल कीन इस तकनीक के विरोधियों के दावे को ख़ारिज करते हुए कहती हैं, "हम किसी गिरावट वाले रास्ते पर नहीं जा रहे हैं. इसके हानि-लाभ की व्यापक जाँच के बाद इस स्तर तक पहुँचने के पीछे कुछ कारण हैं. आगे भी इसकी समीक्षा होती रहेगी. यह एक आदर्श बच्चे पाने का मामला नहीं है. ऐसा नहीं है कि मुझे एक नीली आँखों वाला बच्चा चाहिए. हम घातक बीमारियों से बचने के बारे में सोच रहे हैं. "
‘द ह्यूमन फर्टिलाइज़ेशन एंड एमब्रिऑलोजी अथॉरिटी’ द्वारा इस बारे में लोगों की राय जानने से पता चला कि लोगों ने सर्वाधिक चिंता इसके दुष्परिणामों को लेकर थी. लोगों को डर था कि जीन परिवर्तन तकनीक का प्रयोग दूसरे कारणों से भी किया जा सकता है.
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