पाक चुनाव: हमें अछूतों की तरह अलग करके रखा गया है

मुहीबुर्रहमान
इमेज कैप्शन, मुहीबुर्रहमान अहमदिया बिरादरी से संबंधित हैं और वो चुनावों में हिस्सा नहीं लेते.

मुहीबुर्रहमान का ताल्लुक़ अहमदिया बिरादरी से है और वो 11 मई को होने वाले आम चुनावों में वोट डालने का इरादा नहीं रखते.

मुहीबुर्रहमान पिछले 50 बरस से वकालत के पेशे से जुड़े हुए हैं और ख़ुद को एक ज़िम्मेदार नागरिक भी समझते हैं लेकिन सवाल ये है कि आख़िर वो <link type="page"><caption> चुनावों </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130316_pakistan_ahmed_rashid_da.shtml" platform="highweb"/></link>में वोट क्यों नहीं डालते.

इस सवाल के जवाब में मुहीबुर्रहमान कहते हैं, ''चुनावों के लिए तैयार किए गए मत पत्रों में अहमदियों के लिए एक अलग रंग दिया गया है. गुलाबी रंग अहमदियों का होगा. यानी हमें अछूतों की तरह अलग करके रखा गया है. और फिर कोई ऐसा हलफ़नामा हमें दिया जाए जिस पर हस्ताक्षर करना मेरी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ हो तो मैं ऐसा करके चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेना चाहता.''

अहमदियों को पाकिस्तान में ग़ैर-मुस्लिम क़रार दिया गया है और इस मांग को लेकर आंदोलन करने वाली संगठन तहरीक-ए-तहफ़्फ़ुज़-नामूस-ए-रिसालत के प्रमुख मौलाना अब्दुर्रऊफ़ फ़ारूक़ी का मानना है कि चुनावों में हिस्सा न लेने का अहमदियों का फ़ैसला संविधान से बग़ावत करने जैसा है.

मौलाना फ़ारूक़ी का कहना है, ''अहमदियों को चाहिए कि वो 1973 के संविधान और सर्वसम्मति से सभी मुसलमानों के ज़रिए लिए गए फ़ैसले का सम्मान करें. वो पाकिस्तान संविधान के अनुसार अपनी स्थिति को स्वीकार करें और अपने वोट को क़ादियानियों की हैसियत से नामांकित करवाएं और क़ादियानियों की तरह एसेंबली में जाकर अपने संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करें.''

पाकिस्तान में चुनावों की तैयारी ज़ोर पकड़ चुकी है लेकिन अहमदी बिरादरी ख़ुद को इससे पूरी तरह से अलग रखे हुए है.

1973 के संविधान संशोधन

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि पाकिस्तान की अहमदी बिरादरी ने 1973 के बाद देश में होने वाले किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है.

पाक चुनाव
इमेज कैप्शन, अहमदियों का आरोप है कि धर्म के आधार पर उनके साथ भेद भाव किया जाता है.

पाकिस्तानी राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषक रसूल बख्श रईस कहते हैं, ''अहमदी बिरादरी पाकिस्तान में वोट डाल सकते हैं, अपने प्रतिनिधि खड़े कर सकते हैं और एसेंबली में मौजूद विशेष सीटों पर उम्मीदवार भी बन सकते हैं. चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए उन पर कोई भी क़ानूनी और संवैधानिक पाबंदी नहीं है. लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिवेश में उनका प्रतिनिधित्व न होने की बुनियादी वजह उनके धार्मिक नेतृत्व का फ़ैसला है कि अहमदी लोग पाकिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा न लें.''

पाकिस्तान में लंबे समय तक अहमदी लोग दूसरे नागरिकों के साथ मिलकर चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेते थे लेकिन 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल ज़ियाउल हक़ ने संविधान में आठवां संशोधन करके देश में अलग चुनाव कराने का फ़ैसला कर दिया जिसके बाद <link type="page"><caption> अल्पसंख्यकों</caption><url href=" Filename: http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/12/121206_pakistan_hindu_minorities_pn.shtml" platform="highweb"/></link> की सीटों और वोटरों को अलग कर दिया गया.

उसके बाद 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने तमाम अल्पसंख्यकों के लिए संयुक्त चुनावा का सिस्टम दोबारा शुरू किया. 2002 में हुए देश में हुए आम चुनाव में अल्पसंख्यकों समेत सभी नागरिकों के लिए एक वोटर लिस्ट है लेकिन पाकिस्तान के सवा लाख अहमदियों के लिए अभी भी अलग सूची है.

'धर्म के आधार पर भेद-भाव'

अहमदी जमात के लोगों का दावा है कि पाकिस्तान में धर्म के आधार पर उन्हें अपने नागरिक अधिकारों से महरूम किया गया हालाकि नागरिक अधिकारों का धर्म से कोई लेना देना नहीं होता है.

अहमदी लोगों ने वोटर लिस्ट में अपने नामों को डलवाया भी नही है.

चुनाव आयोग ने ये जानकारी पहचान पत्र बनाने वाली संस्था से लेकर न केवल इससे मतदाता सूची तैयार की बल्कि उन जानकारियों को अपनी वेबसाइट पर भी सार्वजनिक कर दिया है जिसे अहमदी लोग अपनी सुरक्षा के लिए ख़तरा समझते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक रसूल बख़्श का मानना है कि दूसरे अल्पसंख्यकों की तरह अहमदी बिरादरी भी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन कर अपने हितों की रक्षा ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कर सकती है.