ढाका के हादसे में बिखरी ज़िंदग़ियाँ

<link type="page"><caption> बांग्लादेश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130428_bangladesh_collapse_rescue_sp.shtml" platform="highweb"/></link> की राजधानी ढाका के बाहरी इलाक़े में इमारत गिरने के हादसे में मारे गए अपने पति के शव के मिलने का इंतजार कर रहीं कमोला बेगम के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं.
उनके पति 42 साल के मोहम्मद हनीफ उन सैकड़ों लोगों में शामिल थे जो हादसे के समय इस <link type="page"><caption> आठ मंजिला इमारत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130427_bangladesh_building_arrest_pkp.shtml" platform="highweb"/></link> में काम कर रहे थे.
उनकी विधवा पूछती हैं, “अब मैं अपनी बच्चियों को कैसे पालूंगी.” इतना कहकर वो बेहोश हो जाती हैं.
आधे घंटे बाद उन्हें फिर होश आता है लेकिन आंसू हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. मोहम्मद हनीफ चार लोगों के इस परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे. वो राणा प्लाजा में स्थित एक कपड़ा फैक्ट्री में सुपरवाइजर थे.
अंधेरा
कमोला बेगम ने कहा कि फैक्ट्री के मालिक ने हनीफ को फोन करके काम पर जाने को कहा था. उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि मत जाइए लेकिन वो बोले कि एक जरूरी ऑर्डर है और उन्हें एक महीने का वेतन भी मिल सकता है. लेकिन अब वो इस दुनिया में नहीं हैं.”
कमोला बेगम ने कहा, “मेरी जिंदगी तबाह हो गई है. जीवन में चारों तरफ अंधेरा है. मेरे पास सरकारी मदद पर निर्भर रहने के सिवा अब कोई चारा नहीं है.”

माना जा रहा है कि जब <link type="page"><caption> राणा प्लाजा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130426_bangaladesh_building_demonstration_ap.shtml" platform="highweb"/></link> इमारत ढही थी तो उसमें करीब 3000 लोग काम कर रहे थे. इमारत में पहले दिन दरार दिखने के बाद बैंक और कई दुकानें बंद कर दी गई थीं. लेकिन इमारत में स्थित तीन कपड़ा फैक्ट्रियों में काम बदस्तूर जारी था.
इस हादसे में जान गंवाने वालों में सिलाई मशीन ऑपरेटर 32 साल की सलमा बेगम भी शामिल हैं. वो अपने 12 साल के बच्चे सालेह को घर में छोड़कर काम पर गई थीं लेकिन वहां से लौटकर नहीं आईं.
आँसुओं के सैलाब में डूबे सालेह कहते हैं, “ड्यूटी पर जाने से पहले मां ने मुझे खाना दिया. मैंने इमारत गिरने की आवाज़ सुनी और दौड़कर वहां गया. मैं मां की तलाश में भटकता रहा लेकिन वो नहीं मिली. चार दिन की तलाश के बाद उनका शव मिला.”
दर्द
सालेह ने कहा कि वो अपनी मां से बहुत प्यार करते थे जबकि मां पढ़ाई नहीं करने पर उन्हें झिड़कती थीं. उन्होंने कहा, “मां हर समय मुझे कहती थी कि पढ़ाई क्यों नहीं करते हो. लेकिन मैं नहीं सुनता था. मैंने स्कूल छोड़ दिया था. अब कौन डांटेगा.”
सालेह की दो बहनें हैं. उसके पिता मोस्ताफिजर 38 साल के हैं और रिक्शा चलाते हैं. वो बेहतर जीवन की तलाश में उत्तरी बांग्लादेश के जिला रंगपुर से <link type="page"><caption> सावर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130424_bangladesh_collapse_dp.shtml" platform="highweb"/></link> आए थे.
उन्होंने कहा, “मैं अपनी पत्नी से खुश था. पैसे और दुश्वारियों को लेकर हमारे बीच कहासुनी होती थी लेकिन फिर हम एक हो जाते थे.”
मोस्ताफिजर ने कहा कि उनकी पत्नी एक अच्छी मां थी और उनकी कमाई से परिवार को बड़ी मदद मिलती थी. लेकिन वो ओवरटाइम की अपनी कमाई बचाकर रखती थी.
सपने
उन्होंने कहा, “मैं जानता था कि ये जरूरी है. हम दोनों ने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे." लेकिन उनके सपनों की दुनिया अब उजड़ चुकी है.

उनकी पत्नी ने इससे पहले जो गारमेंट फैक्ट्री छोड़ी थी उस पर अब भी चार महीने का वेतन बकाया है. उन्होंने कहा, “फैक्ट्री के मालिक और मैनेजर धमकी देते थे कि काम पर नहीं आए तो तनख्वाह काट दी जाएगी. इमारत पर दरार पड़ने के बाद भी उन्होंने यही कहा था. मैंने सलमा से कहा कि वो न जाए लेकिन वो नहीं मानी.”
इस हादसे में अपनों को खो चुके लोगों की मांग है कि इसके लिए जो दोषी हैं उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.
सावर में पुलिस से अपनी पत्नी सलमा का शव लेने आए मोस्ताफिजर ने कहा, “वे धोखेबाज हैं. उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए."












