अमन की भीख मांगता पाकिस्तान का एक शहर

पाकिस्तान में मई महीने आम चुनाव होने हैं. इसलिए वहां देश भर में <link type="page"><caption> राजनीतिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130316_pakistan_ahmed_rashid_da.shtml" platform="highweb"/></link> सरगर्मियां बढ़ रही हैं. सभी राजनीतिक दल अलग अलग वादे कर लोगों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन बलूचिस्तान सूबे की <link type="page"><caption> राजधानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130306_international_others_pak_shia_killing_fma.shtml" platform="highweb"/></link> क्वेटा के लोग इन तमाम पार्टियों से बस एक वादा मांग रहे हैं.
क्वेटा के लोगों को सियासी जमातों और नेताओं से ये वादा चाहिए कि उनके शहर में <link type="page"><caption> अमन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130302_others_pak_lashkar_fma.shtml" platform="highweb"/></link> लौटे. दरअसल हाल के सालों में क्वेटा लगातार जातीय और <link type="page"><caption> सांप्रदायिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130303_pakistan_blast_ss.shtml" platform="highweb"/></link> हिंसा का शिकार रहा है. रियासत और सियासत ने वहां लोगों को आपस में बांट दिया है.
एक वक्त था जब <link type="page"><caption> क्वेटा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/02/130220_quetta_shia_bomb_violence_vr.shtml" platform="highweb"/></link> शांत और अमनपसंद शहर के तौर पर जाना जाता था. गर्मियों की छुट्टियों में अकसर लोग यहां का रुख किया करते थे.
लेकिन अब यहां आना खतरे से खाली नहीं समझा जाता है. लोगों को जबरन गायब किया जाना, <link type="page"><caption> अनजान लाशें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130327_pakistan_9_11_army_killed_adg.shtml" platform="highweb"/></link>, धमाके और ‘टारगेट किलिंग’ इस शहर की नई पहचान हैं.
नफरत और इंतकाम की आग
बाचा खान चौक कभी व्यस्त कारोबारी इलाका हुआ करता था. यहां पाकिस्तान के अन्य इलाकों से आने वाले लोग स्थानीय चीजें बड़े शौक से खरीदा करते थे.
लेकिन बम धमाकों के बाद यहां खौफ का साया और सुरक्षा बलों का पहरा रहता है. सूखे मेवों की मार्केट कभी खरीददारों से भरी रहा करती थी.
इन दिनों दुकानें तो भरी रहती हैं लेकिन बाजार वीरान दिखाई देता है.
अशांत हालात से जूझ रहे बलूचिस्तान में महरूमियों के अलावा सियासी और सामाजिक समस्याएं तो कई दशकों से रहे हैं.
लेकिन 2006 में स्थितियां उस वक्त गंभीर हो गईं जब एक सैन्य अभियान में बुजुर्ग नेता अकबर बुगती को मारा दिया गया.
इसके बाद नफरत और इंतकाम की आग पूरे सूबे में फैल गई. इसका खमियाजा उन पंजाबी लोगों को भुगतना पड़ा जो यहां बसे हुए थे.
हमलों का न रुकने वाला सिलसिला

हमलों और टारगेट किलिंग के बाद बहुत से पंजाबी यहां से अपना घर-बार छोड़ कर भागने को मजबूर हो गए. जो बच गए उनकी जिंदगियां सिमट गई हैं.
दिलों में रंजिश आने के बाद इलाकों में भी रुकावटें खड़ी कर दी गईं. शहर भाषाई और सांप्रदायिक आधारों पर बंट गया. जो रिश्त सदियों से बने थे वे अजबनी हो गए.
कई नौजवान गायब हो गए जिसके लिए अकसर सुरक्षा एजेंसियों को जिम्मेदार करार दिया जाता है.
बलूचिस्तान में सुरक्षा की इस स्थिति ने सांप्रदायिक संगठनों को फलने फूलने का पूरा मौका दिया.
इसके नतीजों में ही क्वेटा के हजारा समुदाय के लोगों पर हमलों का न रुकने वाला सिलसिला शुरू हुआ.
'अमन वापस लौटा दो'
हजारा समुदाय के नौजवान जो खेल के मैदान के अच्छे खिलाड़ी माने जाते थे, अब चार दीवारियों में बंद हो कर रह गए हैं.
इमारत में बंद कमरे के अंदर कुछ नौजवान स्नूकर खेलते नजर आते हैं.
समाज में आने वाली बदलावों से भी मीडिया भी खुद अलग नहीं रख सका है. यहां के हालात को दुनिया के सामने रखने की जद्दोजदह में पिछले पांच सालो में 20 से ज्यादा पत्रकारों ने यहां अपनी जान गंवाई है.
वरिष्ठ पत्रकार सलीम शाहिद कहते है कि मीडिया पर सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही तरह के तत्वों का दबाव है.
बलोच हों या पंजाबी हों या हजारा समुदाय के लोग. यहां रहने वाले सभी लोगों में एक बात समान है. वह यह कि हर कोई शहर के हालात से दुखी हैं.
क्वेटा में भी इन दिनों चुनावों की तैयारियों जोर-शोर से चल रही हैं.
किसके घोषणापत्र में क्या है और क्या नहीं है. इसमें शहर के लोगों की कोई खास दिलचस्पी नहीं है. उनकी तो बस एक ही मांग है. शहर का अमन वापस लौटा दो.












