जिन अरब महिलाओं ने उठाया फिल्म बनाने का जोखिम

यह मौका है फिल्म को समर्पित अरब <link type="page"><caption> महिलाओं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130401_britain_survey_dp.shtml" platform="highweb"/></link> की काबलियत से रूबरू होने का. इस साल लंदन में 'बर्ड्स आई व्यू' फिल्म फेस्टिवल होने वाला है और यह फेस्टिवल कुछ खास है.
इस बार यह फेस्टिवल अरब महिलाओं द्वारा बनाई गई फीचर फिल्मों पर केंद्रित है.
आखिर क्या कारण है कि इतना भव्य और मशहूर <link type="page"><caption> फिल्म</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/02/130218_international_europe_film_audience_sensors_pa.shtml" platform="highweb"/></link> फेस्टिवल इस बार अरब की <link type="page"><caption> महिला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130306_pakistan_women_mountaineer_pic_gallery_pn.shtml" platform="highweb"/></link> फिल्म निर्माताओं को तरजीह दे रहा है?
इसका जवाब इस फेस्टिवल के कार्यक्रमों की निदेशक एलम शकरेफर के पास है. उनके अनुसार, अरब महिला फिल्मकारों की फिल्में पूरी दुनिया में बेजोड़ हैं. एलम बताती हैं, "पिछले साल जब हम कतर, दुबई और अबू धाबी की यात्रा पर थे, हमने यहां की अरब महिलाओं का फिल्मों के प्रति उत्साह, जज़्बा देखा.” वह आगे बताती हैं, “अरब में फिल्म निर्माण की नई लहर चल पड़ी है, और महिलाएं इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं.”
पहचान
इस कार्यक्रम की शुरुआत होगी एनीमेरी जाकिर की फिल्म प्रीमियर ‘वेन आइ सॉ यू’ से. 2007 में बनी यह फिल्म किसी फलीस्तीनी महिला की बनाई पहली फिल्म है. <link type="page"><caption> ब्रितानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130319_agra_woman_assault_va.shtml" platform="highweb"/></link> मूल की पहली मिस्री निर्देशक की फिल्में भी इस <link type="page"><caption> फेस्टिवल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/01/130131_fire_festival_gallery_aa.shtml" platform="highweb"/></link> की विशेषता हैं. यह निर्देशक हैं, 24 साल की हना अब्दुल्ला. इनकी फिल्म ‘द शैडो ऑफ ए मैन’ दिखाई जा रही है. 'वज़दा' की निर्देशक हायफा अल-मंसूर इस उपलब्धि से उत्साहित होकर कहती हैं, “हम आज की पीढ़ी हैं.”
'वज़दा' सऊदी अरब की किसी महिला द्वारा बनाई गई पहली फीचर फिल्म है. अल-मंसूर का कहना है, “युवा महिलाएं बड़ी तादाद में ऑनलाइन हो रही हैं. वह सब अपनी एक खास पहचान बनाने को उतावली हैं” वह आगे कहती हैं, “उनकी फिल्म बनाने की महत्वाकांक्षा और अरब की कई सामाजिक परंपराओं का आपस में टकराव स्वाभाविक है. इस टकराव ने अरब की महिला फिल्म निर्माताओं के लिए इस तरह के कई खूबसूरत तनाव पैदा कर दिए हैं.” दूसरी ओर, अरब में फिल्म से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं की स्थिति के बारे में नादिन कृश, जिन्होंने अल-अरबिया न्यूज चैनल पर बिग स्क्रीन सिनेमा की पहल की, बताती हैं, “मध्य पूर्व देशों में सांस्कृतिक परिदृश्य बदल रहा है. औरतें दमन, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार को चुनौती दे रही हैं और यहीं से उनकी कामयाबी की दास्तां शुरू होती है.” नादिन कृश आगे कहती हैं, “यही नहीं, दर्जनों ऐसी महिला फिल्म-निर्माता हैं जो देश के बाहर रहती हैं. वे सभी अपनी सफलता की कहानी अपने वतन आकर सबसे शेयर कर रही हैं. वे सब बेहद खुश हैं.”
बदलाव

हालांकि, शकरेफर के अनुसार अरब का यह फलता-फूलता फिल्म कारोबार निवेश के मामले में अभी जूझ ही रहा है. यहां दोहा फिल्म संस्थान है जो लेबनान, जार्डन और दुबई में उभरते फिल्म निर्माताओं की वित्तीय मदद कर रहा है. शकरेफर बताती हैं कि यहां अरब देशों में स्थानीय स्तर पर होने वाला अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल भी मौजूद हैं. यह फेस्टिवल यहां के स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ पूरे फिल्म उद्योग को विकास के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इन फिल्मों की वित्तीय परेशानी को ऑनलाइन फंडिंग एजेंसियां भी आगे आकर हल कर रही हैं. अरब मूल की अमरीकी निर्देशक जहेन नवजेम ने अल-मदान पर एक डॉक्यूमेंट्री, ‘द स्क्वायर’ बनाई है. इस डॉक्यूमेंट्री ने सनडांस फिल्म फेस्टिवल में ऑडिएंस अवार्ड जीता. वह अपनी इस सफलता का श्रेय इन्हीं ऑनलाइन फंडिंग एजेंसियों को देती हैं. 38 साल की जहेन नवजेम ने फिल्म बनाते समय अनुभव की गई अपनी परेशानियों को हमारे साथ साझा किया.
इसके बारे में वह बताती हैं, “फिल्म शूट करने के दौरान मुझे पीटा गया, गोलियां चलाई गईं, यहां तक कि गिरफ्तार भी किया गया.” इस बीच अरब स्प्रिंग या 'अरब देशों के वसंत' नाम से विख्यात इस आंदोलन में यहां के हिप-हॉप संगीत की भूमिका पर अरब की चार महिलाओं ने एक डॉक्यूमेंट्री बना डाली.
कई मुकाम

कतर के नार्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय से स्नातक चार महिलाओं ने इस पहलकदमी के लिए खूब <link type="page"><caption> वाह-वाही</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2013/01/130115_international_us_plus_laden_film_hit_aa.shtml" platform="highweb"/></link> बटोरी. वह डॉक्यूमेंट्री थी, ‘द लिरिक्स रिवोल्ट’ अपने उस अनुभव के बारे में बताते हुए उनमें से एक फलीस्तीनी फिल्म निर्देशक राणा खालिद अल-खतीब कहती हैं, “हम अपनी कहानियां सारी दुनिया को बताना चाहते हैं. अपने इस सफर में हमें युवा फिल्म-निर्माताओं की काफी मदद मिली.”
इस फेस्टिवल में हिस्सा लेने वाली 36 साल की अरब की एक और महिला फिल्म निर्माता हैं. इनका नाम है चेरिन डेविस.
इस साल हुए 'सनडांस फिल्म फेस्टिवल' की शुरुआत चेरिन की फ़ीचर फ़िल्म 'मे इन द समर' से हुई.
चेरिन डेविस कहती हैं, “यहां फिल्म की राह में कांटे ही कांटे हैं. मगर हम महिलाओं ने इस चुनौती को स्वीकारा. हमने जीवन के बेहद करीब और साहस से भरी कहानियों पर फिल्म बनाई.” चेरिन ने आगे बताया, “एक महिला का फिल्म बनाना आज भी समाज की प्रचलित धारा के विपरीत ही माना जाता है.” चेरिन ने इन सारी चुनौतियों से जूझते हुए अपना एक मुकम्मल <link type="page"><caption> मुकाम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/11/121123_porn_actor_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> बनाया है.
हिम्मत और हौसले से जगमगाते हुए चेहरे से वो कह उठती हैं, “अब वक्त हमारा है.”












