कंप्यूटर के जरिए जिंदा होगी मृत भाषाएं

एक ऐसी तकनीक विकसित हुई है जिससे के जरिए लंबे समय से मृत भाषाओं को जिंदा या कहें फिर से चलन में लाने में मदद मिलेगी.
दरअसल शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है जिसके जरिए उन भाषाओं के मूल स्वरूप को फिर से बनाने में मदद मिलेगी जो धीरे धीरे विकसित होकर आज की आधुनिक भाषा का रूप ले चुकी हैं.
इस तकनीक की जांच के लिए शोधकर्ताओं की टीम ने एशियाई और पैसेफिक देशों में मौजूदा समय में बोलचाल में प्रयुक्त 637 भाषाओं के प्राचीन प्रारूप को तैयार किया है.
ये शोध अध्ययन प्रॉसिडिंग्स ऑफ़ द नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस में प्रकाशित हुआ है.
कामयाब है तकनीक
मौजूदा समय में भाषा को फिर से जीवित करने का काम भाषाविद् करते हैं जो काफी परिश्रम वाला है और इसकी रफ़्तार भी धीमी होती है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले के एसोसिएट प्रोफेसर डैन कैलिन कहते हैं, “सभी आंकड़ों को देखने में काफी वक्त लगता है. दुनिया भर में हजारों भाषाएं हैं, जिनमें हजारों शब्द होते हैं. इन भाषाओं के बारे में जाने में सैकड़ों जीवन लग सकते हैं. इनमें हो रहे बादलावों को चिन्हित करने में भी काफी वक्त लगता है. लेकिन कंप्यूटर का इस्तेमाल इस दिशा में नई उम्मीद दिखा रहा है.”
समय के साथ भाषाएं बदलती हैं.
हजारों सालों के सफ़र में छोटे छोटे बदलावों के साथ भाषाएं अलग अलग रुपों में तब्दील होती हैं.
डैन कैलिन, “भाषाओं के इस्तेमाल में होने वाले बदलाव लगभग नियमित होते हैं, समान शब्द समान तरीके से ही बदलते हैं. ये बदलाव ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान और कंप्यूटर पकड़ सकता है. अब अगर इन बदलावों को पहचान लिया जाए और उस प्रक्रिया को उल्टी दिशा में दोहराया जाए तो हम मूल भाषा तक पहुंच सकते हैं.”
इन शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया और एशियाई भाषाओं पर पहले इस तकनीक को आजमाया है.
सात हज़ार साल पुरानी भाषा
एक लाख बयालीस हजार शब्दों के डाटाबेस के जरिए आधुनिक भाषाओं को पुराने प्रारूपों तक पहुंचने में मदद मिली है. इन शोधकर्ताओं का भरोसा है कि पुराने प्रारूप में तब्दील हुई भाषा कोई सात हज़ार साल पहले बोली जाती होगी.
कंप्यूटर तकनीक से प्राप्त बदलावों का मिलान भाषाविदों के बदलाव से किया गया. इसमें 85 फ़ीसदी तक की समानता देखी गई.
शोधकर्ताओं का मानना है कि कंप्यूटर के इस्तेमाल से भाषाविदों का काम नहीं छिनेगा बल्कि सिर्फ़ काम की गति तेज होगी.
इस सॉफ्टवेयर के इश्तेमाल से बड़े पैमाने पर आंकड़ों को तुरंत तब्दील किया जा सकता है. हालांकि अभी भी इसमें अशुद्धि की आशंका बनी रहती है.
डॉ. कैलिन के मुताबिक इस तकनीक में अभी भी कमी है. कई शब्दों में ये काम नहीं कर पाता और इसके जरिए ये पता नहीं चलता कि भाषा में बदलाव क्यों हुए.
हालांकि इस तकनीक की खोज ने एक बार फिर उन उम्मीदों को जीवित कर दिया जिसमें मानव इतिहास की पहली भाषा तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है.












