पाकिस्तान में अफ़रा-तफ़री: चार संकेत

पाकिस्तान और भारत के बीच नियंत्रण रेखा पर सेनाओं के बीच चल रहा तनाव अकेला तनाव नहीं है जो पाकिस्तान झेल रहा है.
मंगलवार को एकाएक लगा कि सीमाओं के अलावा भी पाकिस्तान के भीतर ऐसा कुछ हो रहा है जिससे महसूस होता है कि वहाँ अफ़रा-तफ़री का माहौल है.
कम से कम राजनीतिक तौर पर तो ऐसा ही दिखता है.
यह संयोग नहीं था कि जब भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान से रिश्तों पर कड़ा बयान दे रहे थे, भारत हॉकी खिलाड़ियों को वापस भेज रहा था और पाकिस्तानी बुज़ुर्गों को वीज़ा देने का अपना फ़ैसला वापस ले रहा था, उसी समय इस्लामाबाद में पुलिस भ्रष्टाचार विरोधी एक रैली पर लाठियाँ और आंसूगैस बरसा रही थी.
इस्लामाबाद में ये प्रदर्शनकारी रात भर भीषण ठंड में प्रदर्शन करते रहे और मांग करते रहे कि सरकार तुरंत इस्तीफ़ा दे. इन प्रदर्शनकारियों में बच्चे और बूढ़े सभी शामिल थे और ये लोग तहीरुल कादरी के नेतृत्व में वहां इकट्ठे हुए हैं.
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसला दिया था जिसमें भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री अशरफ़ परवेज़ को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया गया.
और आख़िर में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ नाम की राजनीतिक पार्टी बना चुके पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान ने राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी का इस्तीफ़ा मांग लिया.
पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार का कार्यकाल इसी साल मार्च में ख़त्म हो रहा है और उसके बाद वहां आम चुनाव होने हैं. ऐसे में इन घटनाक्रमों को देखकर अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पाकिस्तान में सेना एक बार फिर राजनीति और लोकतंत्र पर हावी होने का षडयंत्र कर रही है?
संकट के समीकरण

राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में ताजा घटनाक्रम की पटकथा लिखी है वहां की सुप्रीम कोर्ट ने, जिसने मंगलवार को अचानक ये फ़रमान सुनाया कि भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में प्रधानमंत्री को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करके अदालत में पेश किया जाए.
वहीं कनाडा से अचानक अवतरित हुए तहरीके मिनाजुल कुरआन के अध्यक्ष मौलाना तहीरुल क़ादरी अपने हजारों समर्थकों के साथ इस्लामाबाद में धरने पर बैठे हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग की आवाज़ बुलंद करते हुए अपने समर्थकों के साथ वो लाहौर से इस्लामाबाद पहुंचे हैं.
सरकार की बर्खास्तगी की मांग करते हुए उन्होंने इसके लिए बुधवार सुबह 11 बजे तक का अल्टीमेटम दिया है और कहा है कि इसके बाद मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जनता सड़कों पर उतर जाएगी.
उधर, तहरीक़े इंसाफ़ पार्टी को भी जैसे मौक़ा हाथ लग गया है और वो भी सुप्रीम कोर्ट के समर्थन और सरकार के विरोध में आवाज़ फिर से बुलंद करने लगी है.
पार्टी के नेता और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान ने अपने समर्थकों से कहा है कि वे किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहें और उनके निर्देशों का इंतज़ार करें.
रणनीति का हिस्सा?
पिछले एक-दो हफ्तों में जो राजनीतिक उथल-पुथल मची है, राजनीतिक विश्लेषक उसके केंद्र में आने वाले आम चुनाव के होने की बात नकार नहीं रहे हैं. विश्लेषकों का कहना है कि इनमें कोई भी घटना ऐसी नहीं है जिसके इस वक्त होने की जरूरत थी.
विश्लेषकों का कहना है कि इनमें से सभी घटनाएं एक-दूसरे से संबंधित हैं और एक सोची-समझी रणनीति के तहत हैं. वो कहते हैं कि पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से सेना और सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत और इन दोनों के सरकार विरोधी रवैए की खबरें सुनने में आ रही थीं.
सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ के बेहद करीबी फ़वाद चौधरी ने कहा भी है कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि देश की सेना और सुप्रीम कोर्ट सरकार को गिराने के लिए मिल कर काम कर रहे हैं.
उनका कहना है कि सेना इस समय हस्तक्षेप कर सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दरवाज़ा खोल दिया है.
फवाद चौधरी की बातों से पाकिस्तान के कई राजनीतिक विश्लेषक भी इत्तेफाक रखते हैं. वरिष्ठ पत्रकार अयाज़ अमीर कहते हैं कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट पब्लिसिटी के बग़ैर नहीं रह सकती.
वो कहते हैं, “कुछ दिनों से सारा ध्यान क्वेटा में लगा हुआ था, उसके बाद कादिरी की ओर शिफ्ट हो गया. पिछले काफी दिनों से सुप्रीम कोर्ट सुर्खियों में नहीं था, सो इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट को चर्चा में आने का अच्छा मौका मिल गया, वरना इसकी अभी कोई जरूरत नहीं थी.”
इसके अलावा इमरान ख़ान और सेना के बीच भी कथित गठजोड़ की बातें भी आती रहती हैं. साथ ही तहीरुल कादिरी ने भी अपने भाषणों में कहा कि पाकिस्तान में सिर्फ सेना और सुप्रीम कोर्ट ही ठीक से काम कर रही हैं.
उनके निशाने पर भी सरकार ही है, जबकि सेना और सुप्रीम कोर्ट के प्रति उनकी पर्याप्त सहानुभूति है.
विकल्प

हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री को हटाने की किसी मुहिम का यह मतलब नहीं कि सरकार गिर जाएगी क्योंकि सांसद अगर चाहें तो दूसरा प्रधानमंत्री चुन सकते हैं.
ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान की संसद में पीपीपी का बहुमत है.
ख़ुद राजा परवेज़ अशरफ को भी कुछ महीनों पहले प्रधानमंत्री की कुर्सी एक ऐसे ही घटनाक्रम के बाद मिली थी जब सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को पद से हटाने के आदेश दिए थे.
लेकिन सेना और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता और कादिरी और इमरान खान के सरकार विरोधी अभियान की वजह से सरकार परेशानी में जरूर दिख रही है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ऐसी खबरें भी आईं कि प्रधानमंत्री देश से बाहर चले गए हैं. हालांकि इसकी किसी भी स्तर पर पुष्टि नहीं हो सकी.
उधर, देश के भीतर और सीमा पर मची इस उथल-पुथल का असर पाकिस्तान के स्टॉक एक्सचेंज में भी देखने को मिला जब मंगलवार को वहां 500 से ज़्यादा अंकों की भारी गिरावट दर्ज हुई.












