यासिर अराफात का जीवन सफ़र

1968:पीएलओ की ज़िम्मेदारी
यासिर अराफ़ात 1968 में फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के मुखिया बने. पीएलओ कई संगठनों को मिलाकर एक बड़ा संगठन 1964 में बनाया गया और इसका लक्ष्य रखा गया था अपने भविष्य के बारे में फ़लस्तीनियों के अधिकार हासिल करना.
अराफ़ात के नेतृत्व में पीएलओ ने सशस्त्र संघर्ष पर ज़्यादा ज़ोर दिया जिसमें विमानों का अपहरण, लोगों को बंधक बनाना और दुनिया भर में इसराइली ठिकानों का निशाना बनाना शामिल था.
1974:संयुक्त राष्ट्र में भाषण
अराफ़ात ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी पहली हाज़िरी बहुत नाटकीय अंदाज़ में शांति की हिमायत करते हुए की.
लेकिन उन्होंने आगाह भी किया, "आज में अपने एक हाथ में शांति की प्रतीक ज़ैतून की डाल और एक हाथ में स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लाया हूँ. मेरे हाथों से ज़ैतून की डाल गिरने मत देना."
1975:संयुक्त राष्ट्र की मान्यता
संयुक्त राष्ट्र में दिए गए उनके भाषण ने एक गुरिल्ला चरमपंथी की उनकी छवि को बदल दिया.
एक साल बाद अमरीका ने स्वीकार किया कि अरब-इसराइली शांति प्रक्रिया की तलाश में फ़लस्तीनी हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती.
1982:बेरूत से लड़ाई
लेबनान पर इसराइल के हमले के बाद यासिर अराफ़ात सहित फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन के कुछ अन्य कमांडर अपने अड्डों से भाग निकले.
अराफ़ात ने फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन का मुख्यालय ट्यूनिस में फिर से क़ायम किया.
1994:ग़ज़ा को वापसी
यासिर अराफ़ात ने वाशिंगटन में फ़लस्तीनी सिद्धांतों की तरफ़ सबका ध्यान खींचा. समझौता हुआ और उसमें इसराइल को उन फ़लस्तीनी इलाक़ों से हटने को कहा गया जिन पर उसने क़ब्ज़ा कर रखा था.
अराफ़ात ग़ज़ा वापस लौटे तो उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ.
1999:शांति प्रक्रिया आगे बढ़ी
यासिर अराफ़ात ने ज़मीन और सुरक्षा से जुड़े एक समझौते पर इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री इयूद बराक के साथ समझौते पर दस्तख़त किए.
लेकिन हिंसा जारी रहने की वजह से यह समझौता लागू नहीं किया जा सका.
2001:अमरीका पर हमला
11 सितंबर 2001 को अमरीका पर हुए चरमपंथी हमलों के बाद यासिर अराफ़ात ने अमरीका के साथ बतौर सहानुभूति रक्तदान किया.
फ़लस्तीनी नेता पर बहुत दबाव पड़ा कि वह उन चरमपंथियों पर बल प्रयोग करें जो इसराइली शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष में शामिल थे.
2001:कड़वाहट बढ़ी
इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन ने घोषणा की कि यासिर अराफ़ात "अप्रासंगिक" हो चुके हैं और रमल्ला में उनके मुख्यालय की घेराबंदी कर दी.
इसराइल ने रमल्ला में बहुत सी इमारतो को ध्वस्त कर दिया और यासिर अराफ़ात को भी उनके ही मुख्यालय में नज़रबंद कर दिया था.
2003:सत्ता का बँटवारा
अमरीका ने यह शर्त रखी कि अगर यासिर अराफ़ात सत्ता पर अपनी पकड़ ढीली करें तो शांति प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.
उसके बाद फ़लस्तीनी प्रशासन ने पहली बार एक प्रधानमंत्री का चुनाव किया. फ़तेह संगठन के एक वरिष्ठ नेता महमूद अब्बास उर्फ़ अबू माज़ेन को अप्रैल 2003 में इस पद पर चुना गया लेकिन उन्होंने सितंबर में इस्तीफ़ा दे दिया.

उनके बाद अहमद कुरैई को प्रधानमंत्री बनाया गया. लेकिन अराफ़ात अब भी सबसे ताक़तवर नेता बने रहे और कोई भी फ़ैसला लेने का अंतिम अधिकार उनके ही पास रहा. वह एक तरह से फ़लस्तीनियों की उम्मीदों के प्रतीक बन चुके थे.
रमल्ला से आख़िरी रवानगी
अराफ़ात कई साल से रमल्ला में अपने ही मुख्यालय में नज़रबंद थे और अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में अचानक उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई. उन्हें इलाज के लिए फ्रांस ले जाने की बात चली तो जॉर्डन ने रमल्ला से उन्हें अम्मान पहुँचाया.
अम्मान से फ्रांस का एक जहाज़ अराफ़ात को पेरिस लेकर पहुँचा और वहाँ उन्हें एक सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उनकी हालत गंभीर हो गई और कुछ दिन बाद वह अचेतावस्था में चले गए. मौत से कुछ दिन पहले उनके दिमाग़ की नसें फट गई थीं.
ज़िंदगी और मौत के बीच
अराफ़ात अचेतावस्था में जाने के बाद कई दिन तक ज़िंदगी और मौत के बीच की स्थिति में रहे और एक दिन तो इसराइली मीडिया ने उनकी मौत होने की ख़बर दे दी.
लक्ज़मबर्ग के प्रधानमंत्री ने भी अराफ़ात की मौत की पुष्टि कर दी थी लेकिन पेरिस में अस्पताल के एक अधिकारी ने पत्रकार सम्मेलन करके बताया कि अराफ़ात ज़िंदा हैं.
उनकी ज़िंदगी और मौत के बारे में विवाद भी उठा और उनकी पत्नी सुहा अराफ़ात ने कुछ विवादास्पद बयान दिए. उन्हें मशीनों के सहारे ज़िंदा रखा गया और आख़िरकार 11 नवंबर 2004 को तड़के उनकी मौत हो गई.












