रोहिंग्या मुसलमानों को मदद चाहिए: यूएन

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि बर्मा के हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत में विस्थापित हजारों रोहिंग्या मुसलमानों को मदद की फौरन ज़रूरत है.
बर्मा सरकार का भी अनुमान है कि यहां कम से कम 22,000 लोग अपने घरों को छोड़कर भाग गए हैं.
कुछ गैर सरकारी संगठनों का ये भी कहना है कि समंदर के रास्ते भागे अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के लोग मारे गए हैं या लापता हैं.
बीबीसी के दक्षिण एशिया संवाददाता जोनाथन हेड का कहना है कि शनिवार को संयुक्त राष्ट्र के एक दल को सरकारी अधिकारियों के साथ रखाइन के प्रभावित इलाकों के दौरे पर जाने की अनुमति दी गई.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसके दल ने रखाइन में जो दृश्य देखे, उनसे पता चलता है कि वहां जबर्दस्त तबाही हुई है.
शिविरों में डेरा

रखाइन में स्थानीय बौद्ध और अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बीच इस साल जून में शुरू हुई झड़पों के बाद से अब तक एक लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं.
इनमें से ज्यादातर लोग फिलहाल अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, लेकिन जो लोग बीते हफ्तों में समंदर के रास्ते भाग गए थे, उनके बारे में संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि उन्हें मदद की सख्त जरूरत है.
रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की पैरवी कर रहे समूहों का कहना है कि इनमें से लोग समंदर में ही मारे गए हैं.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हिंसा से रोहिंग्या मुसलमान और गैर मुस्लिम समुदाय दोनों ही प्रभावित हुए हैं, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हिंसा का शिकार हुए ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक हैं.
बर्मा की सरकार कई वर्षों से रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश से आए अवैध-प्रवासी बताती रही है. हालांकि रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान कई पीढ़ियों से मौजूद हैं.
रखाइन प्रांत का मुख्य राजनीतिक दल रोहिंग्या मुसलमानों को वहां से भगाने की बात खुलेआम कहता रहा है और बर्मा के अधिकतर लोग इससे सहमत हैं.












