बीजेपी के नेता बार-बार काठमांडू क्यों जाते हैं?

    • Author, फणींद्र दाहाल
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी नेपाली

भारतीय जनता पार्टी के विदेश मामलों के प्रमुख विजय चौथाईवाले हाल ही में नेपाल के सुदूर पश्चिमी हिस्से में एक सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे और काठमांडू में उच्च स्तरीय बैठकें करने के बाद दिल्ली लौट गए.

वो काठमांडू में मानसखंड सम्मेलन में विशेष अतिथि के रूप में हिस्सा लेने पहुंचे थे.

उन्होंने कहा कि नेपाल के प्रधानमंत्री समेत सत्तारूढ़ और प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं के साथ उनकी मुलाक़ात हुई.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि सभी नेपाली नेताओं ने मजबूत नेपाल-भारत संबंधों और पार्टी स्तर पर और अधिक संपर्क पर जोर दिया.

किससे मिले

विजय ने ट्वीट किया कि उन्होंने चुनाव के बाद सत्ता संभालने पर प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रचंड को बधाई दी.

मुख्य विपक्षी नेता केपी ओली से मुलाकात के बारे में उन्होंने लिखा, 'उन्होंने मुझे नेपाल की राजनीति और कई अन्य संबंधित मुद्दों के बारे में दिलचस्प बातें बताईं.'

विजय के साथ चर्चा के दौरान ओली एक गेरुआ रंग की शर्ट पहने नज़र आ रहे हैं. उनके साथ में यूएमएल नेता बिष्णु रिमाल भी थे. बीबीसी ने जब इस मीटिंग के बारे में पूछा तो रिमाल ने जानकारी देने से इनकार कर दिया.

बीजेपी नेता ने पूर्व प्रधानमंत्रियों, शेर बहादुर देउबा और माधव कुमार नेपाल के साथ-साथ उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से भी मुलाकात की.

हालाँकि वो राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल से मिलना चाहते थे लेकिन पौडेल के अचानक बीमार पड़ने से ये कार्यक्रम स्थगित हो गया.

प्रधानमंत्री प्रचंड अगले महीने के अंत तक भारत आने की तैयारी कर रहे हैं. भारतीय सत्ताधारी दल के विदेश विभाग के प्रमुख जब नेपाल पहुंचे तो ऐसी तैयारी चल रही थी.

इससे पहले नेपाल भारत की संयुक्त बैठक में भाग लेने आए भारतीय विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने चुनाव के बाद गठबंधन टूटने के विषय में दिलचस्पी दिखाई.

चुनाव के बाद सबसे बड़ा दल नेपाली कांग्रेस विपक्ष में पहुंच गया था. दूसरा बड़ा दल यूएमएल के समर्थन से प्रचंड प्रधानमंत्री बन गए.

क्वात्रा के लौटने के बाद नेपाल में नए समीकरण भी भंग हो गए. अब कांग्रेस-माओवादी समीकरण सत्ता में हैं और कई विश्लेषक मानते हैं कि दिल्ली के लिए यह समीकरण अच्छा है.

नेपाली नेताओं से कैसे बातचीत हो

हाल के दिनों में अक्सर काठमांडू आने वाले बीजेपी नेताओं में विजय चौथाईवाले एक हैं.

नेपाल और भारत की राजनीतिक पार्टी के नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर संबंध और मुलाकात कोई नई बात नहीं है.

नेपाली नेताओं ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया, और 1951 से नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम में दिल्ली की गहरी रुचि किसी न किसी रूप में दिखी है.

उस समय माओवादी विद्रोहियों और सात पार्टियों के बीच 12 सूत्री समझौता कराने में दिल्ली की खुली भूमिका रही है, जिसने देश में लोकतंत्र स्थापित करने का रास्ता साफ़ किया.

नेपाल भारत रिश्ते पर बारीक नज़र रखने वाले 'देशसंचार डॉट कॉम' के संपादक युवराज घिमिरे कहते हैं कि वैसे तो नेपाल और भारत के नेताओं के बीच बातचीत सामान्य है लेकिन विदेशी मामलों की चर्चा निजी नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "विदेशी राजनयिकों या मेहमानों से विदेशी मामलों में साफ़ तौर पर बात की जानी चाहिए. यह सरकारी नीति और देश के सम्मान को दिखाता है. उनके साथ उठाए जाने वाले एजेंडे की जानकारी सरकार को भी होनी चाहिए.

घिमिरे कहते हैं कि बीजेपी और नेपाल के राजनीतिक दलों के बीच संबंधों के विस्तार में कई सैद्धांतिक सवाल के जवाब नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जब उनसे बातचीत करती है तो नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों को लगता है कि ये उनके अनुकूल है. भाजपा भारत की सत्ताधारी पार्टी है तो नेपाली कांग्रेस नेपाल की सत्ताधारी पार्टी है. लेकिन यह टिकाऊ नहीं है क्योंकि वे यह नहीं देखते कि सिद्धांत क्या है और उनमें कितनी समानता है."

घिमिरे याद दिलाते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और प्रचंड ने अपनी पिछली भारत यात्राओं के दौरान प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात नहीं की थी.

वो कहते हैं, "दूसरों द्वारा निर्देशित बैठकें और राजनयिक संबंध नेपाल के लिए असहज करने वाला है."

नेपाल भारत संबंध कौन तय करता है?

घिमिरे के मुताबिक, भाजपा के विदेश मामलों के प्रभारी के रूप में विजय चौथाईवाले के प्रधानमंत्री मोदी के साथ अच्छे संबंध हैं.

वह मोदी के गृह राज्य गुजरात से हैं. उन्हें प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का विश्वासपात्र माना जाता है.

विजय को 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम का श्रेय भी दिया जाता है, जो मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान बहुत चर्चित हुआ था.

विदेश मंत्रालय ही विदेश नीति तय करता है, लेकिन देश की राजनीतिक और सुरक्षा एजेंसियां भी कुछ महत्वपूर्ण नीतियों के निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाती हैं.

घिमिरे कहते हैं, "विदेश मंत्री की भूमिका अब प्रतीकात्मक हो गई है. असल फैसले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के कार्यालय द्वारा किए जाते हैं."

नक्शा विवाद को लेकर नेपाल-भारत के संबंधों में कड़वाहट आने पर भारत ने अपनी खुफिया एजेंसी के प्रमुख को काठमांडू भेजा था.

इसके बाद नेपाल और भारत के बीच बातचीत धीरे-धीरे सामान्य हुई.

भारत की खुफिया एजेंसी के प्रमुख की वापसी के बाद, विजय का नेपाल दौरा हुआ. उस समय जब ओली सरकार थी और ये दौरा विवादों में घिर गया.

दो साल पहले ये दौरा सीपीएन के तत्कालीन महासचिव बिष्णु पौडेल के निमंत्रण पर हुआ था.

उस समय वे अन्य पार्टियों के नेताओं से मिले थे और प्रचंड और माधव कुमार नेपाल से नहीं मिले.

उस समय पार्टी के नेताओं ने कहा था कि तत्कालीन सीपीएन का विदेश विभाग भी इस दौरे से अनजान था.

घिमिरे कहते हैं कि चूंकि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के लिए सीधे नेपाल आकर राजनीतिक बैठकें करना आसान नहीं है, इसलिए राजनीतिक चेहरों को भेजा जाएगा, लेकिन ऐसी बैठकों के गहरे मायने हैं.

हाल के महीनों में, भाजपा ने विभिन्न देशों के साथ पार्टी स्तर की बातचीत बढ़ा दी है.

'द हिंदू' अखबार में छपी एक ख़बर के मुताबिक, वह 'बीजेपी को जानो' नाम से एक कार्यक्रम चला रहे हैं, जिसके तहत विभिन्न देशों के नेताओं और राजनयिक मिशनों के प्रमुखों को आमंत्रित किया गया है और मुलाक़ात की गई.

पिछले साल माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचंड ने इसी तरह के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था.

भारतीय मीडिया के अनुसार, नेताओं और राजनयिक मिशनों के प्रमुखों के साथ बातचीत में स्थापना के बाद से भाजपा के इतिहास और मोदी सरकार की उपलब्धियों पर चर्चा होगी.

इसके अलावा कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर संबंधों को और पार्टी स्तर पर संबंध मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा.

नेपाल की सत्ता से घनिष्ठ संबंध

विजय उन नेताओं में से एक हैं जिन्होंने हाल के दिनों में नेपाल के राजनीतिक दलों के साथ करीबी संबंध बनाए हैं.

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि नेपाल की पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी व कांग्रेस नेता आरजू देउबा थीं, जो विशिष्ट अतिथि के रूप में धनगढ़ी आई थीं.

जब देउबा प्रधानमंत्री थे तो विजय को राखी बांधते आरजू की तस्वीर सार्वजनिक हुई थी.

विश्व हिंदू महासंघ की उपाध्यक्ष ज्योत्सना सऊद उन लोगों में थीं जिन्होंने प्रदेश सरकार के सहयोग से सुदूर पश्चिम विश्वविद्यालय में सम्मेलन आयोजित करने में मदद की.

ज्योत्सना कांग्रेस नेता एनपी सऊद की पत्नी हैं, जिन्हें हाल ही में विदेश मंत्री नियुक्त किया गया था.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि सम्मेलन नेपाल-भारत संबंधों को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत करेगा और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा.

कार्यक्रम प्रबंधन के संयोजक संदीप राणा ने कहा कि विजय की बैठक अलग थी और धनगढ़ी के कार्यक्रम का उद्देश्य सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन के आदान-प्रदान को बढ़ाना है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "सुदूर पश्चिम से कुमाऊं तक के हिस्से को पौराणिक काल से मानसखंड के नाम से जाना जाता रहा है. उस सम्मेलन में सुदूर पश्चिम और उत्तराखण्ड की साझी संस्कृति और देवी-देवताओं के बारे में और सगोत्री से मिलते-जुलते नामों की चर्चा हुई थी."

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार ने कुमाऊं को मानसखंड कॉरिडोर के रूप में विकसित किया है और कहा कि इसे नेपाल से जोड़कर पर्यटन के विस्तार की व्यापक संभावना है.

कुछ विश्लेषकों ने ऐसे प्रयासों को 'सॉफ्ट डिप्लोमेसी' कहा है.

हालाँकि, नेपाल और भारत के बीच नेपाल के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र और महाकाली नदी के आसपास के सीमा विवाद अभी तक हल नहीं हुए हैं.

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