गुड फ़्राइडे: सूली पर चढ़ाने की सज़ा कहां और कैसे शुरू हुई

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- Author, मार्गरीटा रोड्रिग्ज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
सूली पर चढ़ा कर मारे जाने वालों में ईसा मसीह यानी यीशु सबसे चर्चित लोगों में रहे हैं. लेकिन मौत की सज़ा देने का यह भयानक तरीक़ा उनके जन्म के भी कई सदी पहले से प्रचलित था.
दक्षिण अफ़्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़्री स्टेट के रिसर्च फ़ेलो और लेखक लुइस सिलियर्स के अनुसार, ''प्राचीन काल में किसी को मौत की सज़ा देने के तीन सबसे बर्बर तरीक़ों में सूली पर चढ़ाना सबसे ख़राब माना जाता था.''
उनके अनुसार, जलाकर मारना और सिर काटना मौत की सज़ा के दो अन्य तरीक़े थे.
स्पेन की नवारा यूनिवर्सिटी में धर्मशास्त्र के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डिएगो पेरेज़ गोंडार कहते हैं, "लोगों में यथासंभव आतंक पैदा करने के लिए पूर्ण क्रूरता और तमाशे का यह मिला-जुला तरीक़ा था.''
कई मामलों में तो पीड़ित की मौत किसी चौराहे पर सूली पर चढ़ाने के कई दिनों बाद होती थी. सूली पर लटकाए जाने वालों का शरीर दम घुटने, ख़ून और पानी की कमी होने और अंगों के बारी-बारी से काम करना बंद करने से होती थी.
आइए जानते हैं कि सूली पर लटकाने की सज़ा सबसे पहले कहां और कैसे शुरू हुई?
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ईसा के 500 साल पहले शुरू हुई यह सज़ा
डॉक्टर सिलियर्स का मानना है कि सूली पर चढ़ाने की शुरुआत शायद असीरिया और बेबीलोन में हुई थी. दुनिया की ये दो महान सभ्यताएँ आज के पश्चिम एशिया में फली-फूली थीं.
वो ये भी मानती हैं कि मौत की सज़ा देने की यह विधि ईसा पूर्व छठी सदी में फ़ारसी लोगों के यहां काफ़ी प्रचलित थी.
वहीं प्रोफ़ेसर पेरेज़ बताते हैं कि इस बारे में अभी तक उपलब्ध सबसे पुरानी जानकारी असीरियाई लोगों के महलों पर बनाए गए चित्रों से मिलती है.
2003 में डॉक्टर सिलियर्स ने साउथ अफ़्रीकन मेडिकल जर्नल में एक लेख प्रकाशित किया. किसी के साथ मिल कर लिखा गया यह लेख सूली पर चढ़ाने के इतिहास के बारे में था.
उन्होंने इस लेख में बताया कि फ़ारस के लोग क्रॉस के बजाय पेड़ों या खंभों पर लोगों को सूली पर चढ़ाते थे.
प्रोफ़ेसर पेरेज़ के अनुसार, ''दोषी व्यक्ति का उपहास उड़ाने के साथ मौत की क्रूर सज़ा देने के लिए इस तरीक़े का प्रयोग होता था. इसके लिए उन्हें पेड़ से लटका दिया जाता था ताकि दम घुटने और थकान से वे मर जाएं.''
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सूली पर लटकाने की सज़ा का विस्तार
ईसा पूर्व चौथी सदी में सिकंदर महान ने पूर्वी भूमध्यसागर के किनारे बसे देशों के लिए इस सज़ा का चुनाव किया था.
डॉक्टर सिलियर्स कहती हैं, ''सिकंदर और उनके सैनिकों ने सोर शहर (आज के लेबनान में) को घेर लिया, जो कमोबेश अभेद्य था. वे जब शहर के भीतर आए तो उन्होंने वहां लगभग 2,000 नागरिकों को सूली पर लटका दिया.''
सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने मिस्र और सीरिया के साथ-साथ फ़ोनीशिया द्वारा स्थापित उत्तरी अफ्रीका के महान शहर कार्थेज के लोगों को सूली पर लटकाने की सज़ा दी.
उनके अनुसार, पूनिक की लड़ाई (264-146 ईसा पूर्व) के दौरान, रोम के लोगों ने इस तरीक़े को सीखा और 500 सालों तक इसे प्रचलित रखा.
वो कहती हैं, ''रोम के दिग्गज जहां भी गए, सूली पर चढ़ाने की सज़ा देते रहे.''
इसके अलावा, दंड का यह तरीक़ा उन जगहों पर भी प्रचलित हो गया जहां उन्होंने लोगों को यह सज़ा दी थी.
नौवीं ईस्वी में जर्मनी के जनरल आर्मिनियस ने ट्युटोबर्ग फ़ॉरेस्ट की लड़ाई में अपनी जीत के बाद रोम के सैनिकों को सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया.
60 ईस्वी में इकेनी नामक ब्रितानी जनजाति की रानी बौदिकाका ने हमला करने वाले रोम के लोगों के ख़िलाफ़ बहुत बड़े विद्रोह का नेतृत्व किया. उन्होंने रोम के कई सेनापतियों को सूली पर चढ़ा दिया.
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पवित्र भूमि
प्राचीन इसराइल में रोम के लोगों के आने के पहले से ही यह सज़ा दी जा रही थी.
प्रोफ़ेसर पेरेज़ कहते हैं, ''हमारे पास ऐसे स्रोत हैं जो पवित्र भूमि पर रोम के लोगों की जीत से पहले सूली पर चढ़ाने की बात करते हैं.''
ऐसे लोगों में से एक रोमन-यहूदी इतिहासकार, नेता और सैनिक फ़्लेवियस जोसेफ़स हैं. उनका जन्म पहली सदी में येरूसलम में हुआ था.
एलेक्ज़ेंडर जैनियस (125 ई पू-76 ई पू) के शासनकाल के ब्योरे में उन्होंने 88 ईसा पूर्व में लगभग 800 लोगों को सूली पर चढ़ाए जाने का ज़िक्र किया है.
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डॉक्टर सिलियर्स बताती हैं कि सूली की सज़ा देने के लिए कई तरह के क्रॉस का इस्तेमाल रोम के लोगों ने ही शुरू किया था. ऐसे क्रॉस में से एक 'एक्स' आकार का भी था.
वो कहती हैं, ''हालांकि ज़्यादातर मामलों में वे जाने-माने लैटिन क्रॉस या टी-आकार के क्रॉस यानी ताउ का इस्तेमाल करते थे. ये क्रॉस ऊँचे हो सकते थे, लेकिन कम ऊँचे क्रॉस ज़्यादा प्रचलित थे.''
मौत की सज़ा दिए जाने वाले व्यक्ति को क्रॉस के क्षैतिज हिस्से तक चढ़ाया जाता था.
''यदि व्यक्ति नंगा नहीं होता था तो उनके कपड़े उतार दिए जाते थे और उन्हें पेटीबुलम के साथ हाथों को फैलाकर पीठ के बल लिटा दिया जाता था.''
उसके बाद उनके हाथों को बीम से बांध दिया जाता था या उसकी कलाई में कीलें ठोक दी जाती थीं.
पीड़ितों के हाथों की हथेलियों में आम तौर पर कीलें नहीं ठोकी जाती थीं क्योंकि शरीर के वजन के कारण कीलें मांस को फाड़ सकती थीं. वहीं कलाई और हाथों के अगले भाग की हड्डियाँ कीलों को पकड़े रखती थीं.
ये कीलें 18 सेंटीमीटर तक लंबी और एक सेंटीमीटर मोटी होती थीं.
सज़ा पाने वाले व्यक्ति को क्रॉस के क्षैतिज भाग से लगाने के लिए ऊपर उठाया जाता था और वर्टिकल भाग पर टिका दिया जाता था. यह भाग पहले से ज़मीन में गड़ा होता था.
पैरों को क्रॉस के वर्टिकल हिस्से से बांधा जाता था या उसमें कील ठोक दी जाती थी.
वो दर्द कल्पना के परे होता था.
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भयानक पीड़ा के वो क्षण
प्रोफ़ेसर पेरेज़ कहते हैं कि इससे कई नसें प्रभावित होती थीं.
''लोगों को बैठने और सांस लेने के लिए अपने पैरों पर ज़ोर लगाना पड़ता था. ऐसा करने में बहुत ख़ून बह जाता था, ज़बर्दस्त दर्द होता था, लेकिन यदि व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया तो दम घुटने से उसकी मौत हो जाती.''
कई मामलों में यह धीमी मौत होती थी जो शरीर के कई अंगों के विफल होने के कारण होती थी.
डॉक्टर सिलियर्स बताती हैं कि पीड़ितों की मौत कई मिली-जुली वजहों से होती थी. दम घुटने या भारी मात्रा में ख़ून और पानी के बहने, कई अंगों के काम करना बंद कर देने से मौतें होती थीं.
इस सज़ा की क्रूरता इस बात से बढ़ जाती थी कि सूली पर लटकाए गए कई लोगों की मौत कई दिन बाद होती थी.
हालांकि कुछ लोग कुछ ही घंटे में मर जाते थे. बाइबिल में यीशु के बारे में कहा जाता है कि वो छह घंटे तक जीवित रहे.
प्रोफ़ेसर पेरेज़ कहते हैं, ''कुछ मामलों में जल्दी मारने के लिए लोगों के घुटनों पर वार करके उनके पैर तोड़ दिए गए. ऐसे में सूली पर लटका इंसान अपने पैरों की मांसपेशियों का उपयोग करके सांस लेने के लिए ख़ुद को ऊपर न उठा सकता. ऐसे में वो जल्दी मर जाता.''
बाइबिल के अनुसार, रोम के सैनिकों ने यीशु के बगल में सूली पर चढ़ाए गए दो अपराधियों के साथ ऐसा ही किया था. हालांकि उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया था क्योंकि वो पहले ही मर गए थे.

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उन्मूलन
रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाइन ने चौथी सदी ईस्वी में सूली की सज़ा को ख़त्म कर दिया और ईसाई धर्म अपना लिया. ऐसा करने वाले वह रोम के पहले सम्राट बन गए.
उन्होंने धर्म को क़ानून सम्मत बनाया. उनके अनुयायियों को वो विशेष अधिकार दिए गए जो पारंपरिक धर्मों से छीन गए थे और जिसके कारण रोमन साम्राज्य का ईसाइकरण हो गया.
हालाँकि, अभी भी दुनिया में कई जगहों पर यह सज़ा दी जाती है.
1597 में जापान में 26 ईसाई मिशनरियों को सूली पर चढ़ा दिया गया था.
अपने क्रूर अतीत के बावजूद 'सूली' ईसाइयों के लिए 'प्यार की ख़ातिर बलिदान का प्रतीक' बना हुआ है.
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