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रामचन्द्र पौडेल: कैसा रहा है नेपाल के राष्ट्रपति का सियासी सफ़र?
- Author, अशोक दाहाल
- पदनाम, बीबीसी नेपाली सेवा
क़रीब आठ दशक पहले तनहून के बहुनपोखरा ग्रामीण इलाक़े में एक साधारण परिवार में जन्मे रामचंद्र पौडेल नेपाल के तीसरे राष्ट्रपति बने हैं.
अपने पांच दशक लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने कई बार स्पीकर और मंत्री के रूप में काम किया है.
86 साल के फणींद्रराज मिश्र उनके बचपन के मित्र हैं. वे कहते हैं कि रामचंद्र पौडेल के पिता दुर्गा प्रसाद में भी राजनीतिक चेतना थी.
"उनके पिता भी विद्वान हैं. शास्त्री ने उन्हें पढ़ाया भी था. लेकिन जब वे पढ़ रहे थे, तब रामचंद्र राजनीति में आ गए. जेल में भी रहे."
फणींद्रराज मिश्र कहते हैं, ''भले ही खाने को लेकर कोई समस्या नहीं है, लेकिन राजनीति शुरू करने के बाद उन्हें आर्थिक स्थिति से भी जूझना पड़ा.''
उतार-चढ़ाव भरी राजनीति
78 साल के रामचंद्र पौडेल के बारे में उनके क़रीबी बताते हैं कि उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में कई बार उतार-चढ़ाव आए.
पंद्रह साल की उम्र में वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुए.
शिक्षित परिवार में पले-बढ़े पौडेल पहले पोखरा और बाद में काठमांडू में पढ़ने के लिए आए.
उनके करीबी लोगों के मुताबिक़ पोखरा में पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव कम्युनिस्ट राजनीति की ओर था, लेकिन वे साम्यवादी राजनीति में शामिल नहीं थे.
पूर्व सांसद अमरराज कैनी कहते हैं, "उस समय पोखरा में कम्युनिस्टों का प्रभाव था. हालांकि इसका उन पर प्रभाव पड़ा, लेकिन वे कम्युनिस्ट नहीं थे."
मास्टर डिग्री लेने और संस्कृत का अध्ययन करने वाले रामचंद्र पौडेल ने कई किताबें भी लिखी हैं.
देउबा पर अविश्वास
उनके आधे राजनीतिक जीवन के बाद नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने गठबंधन से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के लिए समर्थन दिया था.
लेकिन पौडेल और देउबा के बीच सहयोग और अविश्वास का सिलसिला बहुत लंबा है.
लंबे समय तक नेपाली कांग्रेस के संस्थापक नेता कृष्ण प्रसाद भट्टाराई के करीबी रहे रामचंद्र पौडेल ने सरकार में शामिल होने पर मतभेद के बाद भट्टाराई का साथ छोड़ दिया.
चूंकि वे गिरिजा प्रसाद कोइराला गुट के करीबी नहीं थे. इसलिए पार्टी में एक अलग गुट का नेतृत्व कर रहे शेर बहादुर देउबा के करीबी बन थे.
तत्कालीन कांग्रेस डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अमरराज कैनी कहते हैं कि साल 2002 में नेपाली कांग्रेस शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में विभाजित हो गई थी.
वे आगे बताते हैं, पार्टी को विभाजित करने की अंतिम तैयारी तक पौडेल देउबा के साथ थे. लेकिन देउबा के द्वारा पार्टी की घोषणा करने के कुछ घंटे पहले रामचंद्र पौडेल ने देउबा का समर्थन नहीं करने का फैसला किया.
अमरराज कैनी याद करते हुए कहते हैं, "उन्होंने हमें आश्वस्त किया था कि हमें भी लोकतांत्रिक होना चाहिए. लेकिन आख़िरी समय में उन्होंने सूचित किया कि वह पार्टी की घोषणा में नहीं आएंगे,"
नेपाली कांग्रेस में दोबारा जाने के बाद रामचंद्र पौडेल कोइराला गुट के करीबी हो गए और राजनीति में रामचंद्र पौडेल और शेर बहादुर देउबा आमने सामने हो गए.
देउबा से मुक़ाबला
उन्होंने पार्टी के 13वें अधिवेशन में शेर बहादुर देउबा के ख़िलाफ़ पार्टी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था.
देउबा और पौडेल के बीच हुए दिलचस्प मुक़ाबले में देउबा दूसरे दौर के मतदान में निर्वाचित हुए थे.
इसके तुरंत बाद पौडेल ने कांग्रेस संसदीय दल के चुनाव में देउबा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा लेकिन हार गए.
देउबा और पौडेल के नेतृत्व वाला गुट कांग्रेस की 14वें सम्मेलन तक बना रहा.
लेकिन पिछले साल हुई पार्टी की 14वीं कांग्रेस में देउबा निर्वाचित हुए जबकि पौडेल तटस्थ बने रहे.
जब पौडेल ने अपने पुराने गुट के दोनों उम्मीदवारों शेखर कोइराला और प्रकाशमान सिंह का समर्थन नहीं किया तो गुट के भीतर भी उनकी आलोचना हुई.
गोविंदराज जोशी से टकराव
1991 में पहली बार सांसद बने पौडेल लगातार चार चुनावों में तानहुन से चुने गए थे.पार्टी नेता गोविंदराज जोशी के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे.
नेताओं का कहना है कि 2017 के संसदीय चुनाव में रामचंद्र पौडेल की हार का कारण गोविंदराज जोशी ही थे. क्योंकि गोविंदराज जोशी पर अंकुश लगाने की क्षमता पौडेल के पास नहीं थी.
रामचंद्र पौडेल 1991 में तनहुन 1 से चुने गए थे. पहला संसदीय चुनाव जीतने के बाद वह स्थानीय विकास मंत्री बने.
कहा जाता है कि जब वह मंत्री थे तब संसद में मौजूद नेता गोल्चे सरकी ने नेशनल असेंबली में उनके साथ मारपीट की थी.
फिर उन्होंने ज़िला नेता गोविंदराज जोशी के साथ निर्वाचन क्षेत्रों की अदला-बदली की. उसके बाद दोनों नेताओं के बीच संबंध बिगड़ गए.
अमरराज कैनी कहते हैं, ''आंतरिक प्रतिस्पर्धा के कारण ही उनके रिश्ते बिगड़े.''
कांग्रेस की राजनीति में अधिकांश समय रामचंद्र पौडेल कृष्णप्रसाद भट्टाराई और देउबा गुट के करीब रहे. जबकि गोविंदराज जोशी कोईराला गुट के नज़दीक रहे.
पौडेल की ताकत और कमजोरियां
पौडेल के आलोचकों ने टिप्पणी की है कि वह लालची है.
लेकिन पौडेल के साथ करीब पांच दशक से जुड़े अमरराज कैनी कहते हैं कि वह इतने लालची नहीं हैं जितना उन्हें बताया जाता है.
अमरराज कैनी उनकी कमज़ोरी की ओर इशारा करते हैं कि वे राजनीति में अपने सहयोगियों का समर्थन नहीं करते हैं.
कैनी कहते हैं, ''दोस्तों की मदद करना और राजनीतिक प्रतिष्ठान में योगदान नहीं देना उनकी कमजोरी लगती है.''
ऐसे लोग भी हैं रामचंद्र पौडेल को राजनीति में नैतिकतावादी मानते हैं.
लंबे समय तक संसदीय राजनीति में उनके साथ काम करने वाले नेता हृदयेश त्रिपाठी उन्हें को एक ऐसे नेता के तौर पर याद करते हैं जो लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता नहीं करते हैं.
जब रामचंद्र पौडेल नेपाल की प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष थे तब हृदयेश त्रिपाठी लोक लेखा समिति के अध्यक्ष थे.
वो कहते हैं, "वह लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति हैं. लेकिन उनकी राजनीतिक समझ में थोड़ी जटिलता है,"
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