नेपाल में टूटा सत्ताधारी गठबंधन, प्रचंड की सरकार का अब क्या होगा?

नेपाल में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने पुष्प कमल दाहाल 'प्रचंड' की सरकार से समर्थन वापस ले लिया है.

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने कहा है कि राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं, इसलिए वो समर्थन वापस ले रही है.

अब नेपाल में चर्चा इस बात की हो रही है कि इसका दाहाल सरकार पर क्या असर होगा और सरकार कितनी मुश्किलों में है.

यूएमएल के नेताओं ने सोमवार को पार्टी की बैठक के बाद औपचारिक रूप से कहा है कि उन्होंने सरकार से अलग होने का फ़ैसला लिया है.

यूएमएल के नेताओं का कहना है कि प्रचंड की पार्टी 'सीपीएन (माओवादी सेंटर)' राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए यूएमएल के उम्मीदवार का समर्थन करने के वादे से पीछे हट गई है. दस जनवरी को हुए समझौते के तहत ये वादा किया गया था.

यूएमएल के नेताओं का कहना है कि समीकरण बदलने के बाद अब सरकार से समर्थन वापस लेना ही सही होगा.

नेपाल में नौ मार्च को राष्ट्रपति पद का चुनाव होना है. मौजूदा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी का कार्यकाल 13 मार्च को समाप्त हो रहा है.

राष्ट्रपति पद की रेस में नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पौडेल और सीपीएन (यूएमएल) के सुभाषचंद्र नेमवांग हैं.

क्या कहना है यूएमएल का?

पार्टी के प्रवक्ता विष्णु पौडेल ने बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, "राष्ट्रपति को लेकर जो समझौता हुआ था प्रधानमंत्री उससे मुकर गए हैं. अंततः उन्होंने दूसरे दलों के साथ अलग से किए गए समझौते के तहत कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया है."

उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी सरकार को समर्थन देते रहना चाहती थी, लेकिन प्रधानमंत्री की वजह से उसे मजबूर होकर समर्थन वापस लेना पड़ रहा है.

प्रवक्ता ने कहा, "प्रधानमंत्री के यूएमएल मंत्रियों के हाल के दिनों में रवैये की वजह से भी सरकार में बने रहना उचित नहीं है."

प्रधानमंत्री प्रचंड ने यूएमएल की नेता और विदेश मंत्री विमला राय को रविवार शाम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में शामिल होने के लिए जाने से रोक दिया था.

शुक्रवार माओवादी दल समेत आठ दलों ने राष्ट्रपति के पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन करने का फ़ैसला लिया था. इसके बाद से ही सरकार बनाने के लिए बने गठबंधन को ख़तरे में माना जा रहा था.

सत्ताधारी गठबंधन का समर्थन कर रही राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने पहले ही अपना समर्थन वापस ले लिया था.

वहीं यूएमएल ने सरकार से समर्थन वापस लेने से पहले ही राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार उतारने का फ़ैसला ले लिया था.

वहीं दूसरी तरफ़, सदन में चौथी सबसे बड़ी पार्टी नेशनल इंडिपेंडेंट पार्टी ने भी सोमवार को बैठक की. हालांकि पार्टी ने अभी ये नहीं बताया है कि वो सरकार से समर्थन वापस ले रही है या नहीं.

प्रचंड की अगली चुनौती क्या होगी?

विश्लेषकों के मुताबिक प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती सदन में अपना बहुमत साबित करने और विश्वास मत हासिल करने की होगी.

नेपाल की संसद में सर्वाधिक सीटें नेपाली कांग्रेस के पास 89 हैं. इसके बाद माओवादी सेंटर के पास 32 और सीपीएन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी के पास 10 सीटें हैं.

वहीं राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करने वाले दलों में से जनता समाजवादी पार्टी के पास 12, जनमत पार्टी के पास 6, प्रजातांत्रिक समाजवादी पार्टी के पास 4, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी के सास 3 और राष्ट्रीय जनमोर्चा के पास 1 सीट है.

लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ये पार्टियां सरकार का समर्थन करेंगी या नहीं.

संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सीपीएन-यूएमएल के पास 79 सीटें हैं. वहीं सरकार से पहले ही समर्थन वापस ले चुकी आरपीपी के पास 14 सीटें हैं.

नेपाल की संसद में नेपाली कामगार किसान पार्टी का एक और चार स्वतंत्र सदस्य भी हैं.

वहीं संसद में चौथी सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के पास 19 सीटें हैं.

अगर राष्ट्रपति चुनाव में एक साथ आने वाली पार्टियां सरकार का समर्थन कर देती हैं तो प्रचंड के पास 157 सांसदों का समर्थन होगा.

नेपाल में सरकार बनाने के लिए कम से कम 138 सांसदों का समर्थन प्राप्त करना अनिवार्य होता है.

कई विश्लेषकों का ये भी कहना है कि प्रधानमंत्री प्रचंड के पास पार्टियों के समर्थन के साथ ही पर्याप्त संख्या है और उन्हें विश्वासमत नहीं लेना चाहिए.

लेकिन कुछ का तर्क है कि सरकार के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी के सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री को सदन में विश्वासमत हासिल करना चाहिए.

नेपाल के संविधान के प्रावधानों के मुताबिक़, यदि कोई दल सरकार से समर्थन वापस ले लेता है या पार्टी टूट जाती है तो प्रधानमंत्री को विश्वासमत फिर से हासिल करना चाहिए.

इसके तहत तीस दिनों के भीतर प्रधानमंत्री को सदन में विश्वास प्रस्ताव पेश करना चाहिए और इस पर मतदान होना चाहिए.

क्या कहते हैं विश्लेषक?

विश्लेषक मानते हैं कि लोकतंत्र सांसदों की संख्या ही सरकार का और विपक्ष की भूमिका निर्धारित करती है. यानी जिसके पास सबसे ज़्यादा मत हैं वो सरकार बनाता है और कम संख्या वाला दल विपक्ष में बैठता है.

राजनीतिक टिप्पणीकार हरि शर्मा कहते हैं कि यूएमएल और आरपीपी जैसे दल अगर एक साथ बैठ रहे हैं और माओवादी सेंटर, कांग्रेस और सीपीएन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी मिलकर पर्याप्त संख्या प्राप्त कर लेते हैं तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि सदन में सरकार किसकी होगी और विपक्ष में कौन होगा.

लेकिन वो मानते हैं कि इसकी वजह से राजनीतिक दलों में भी मुश्किल हालात पैदा हो सकते हैं.

वो कहते हैं, "अगर बात संसदीय गरिमा से आगे बढ़ती है तो कुछ भी हो सकता है. सदन मामूली मुद्दों पर ठप्प हो सकता है, सरकार चलाने में दिक़्क़तें हो सकती हैं और संवैधानिक परिषद के गठन पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है."

हरि शर्मा मानते हैं कि संवैधानिक परिषद के ज़रिए होने वाली नियुक्ति में भी दिक़्क़त आ सकती है.

संसद में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी नेपाली कांग्रेस को राजनीतिक समीकरणों की वजह से अग्रणी भूमिका नहीं मिल रही है.

नेपाल की संसदीय व्यवस्था भी अलग है. नेपाल की संसद में आनुपातिक सदस्य भी होते हैं.

हरि शर्मा कहते हैं, "अगर यहां सदस्य सिर्फ़ सीधे चुनावों से चुने जाते और आनुपातिक व्यवस्था नहीं होती तो फ़ैसला संख्या से ही होता. लेकिन राजनीतिक दलों ने देश की विविधता को महत्व देने के लिए मौजूदा व्यवस्था को स्वीकार किया है.

ऐसे में पार्टियों के पास मौजूदा जनादेश के दायरे में ही समझदारी से काम करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है."

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