चीन के वो प्रदर्शनकारी जो सड़कों पर उतरे और फिर लापता हो गए

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- Author, टेसा वोंग और ग्रेसी सोई
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिंगापुर से
चीन ने कोविड महामारी के ख़िलाफ़ अपनी जीत का एलान कर दिया है और इसके साथ 'ज़ीरो कोविड' की उसकी नीति के विरोध में बीते साल नवंबर के महीने में हुए विरोध प्रदर्शनों की याद भी मिटती जा रही है.
महामारी के ख़त्म होने के बाद देश में कामकाज सामान्य हो रहा है, लोगों का घरों से बाहर निकलना आम हो रहा है, लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले कई लोग लापता हैं. विरोध के दमन में लगे अधिकारियों ने सरकार से नाराज़ इन प्रदर्शनकारियों को शांत करा दिया है.
बीते साल बड़ी संख्या में लोग कोविड की सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर आए थे. रात के अंधेरे में विरोध स्वरूप उन्होंने सफ़ेद कागज़ दिखाए थे. इसे इंटरनेट पर ए4 रिवोल्यूशन कहा जा रहा था.
उस वक्त कहा गया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार और सत्ताधारी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन में लोगों को इस तरह से विरोध प्रदर्शन करते विरले ही देखा गया है.
उस वक्त पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया था. चीनी एक्टिविस्टों का कहना है कि इसके कुछ महीनों बाद अब भी कई प्रदर्शनकारी पुलिस कस्टडी में हैं. एक कार्यकर्ता समूह का आकलन है कि अधिकारियों ने सौ से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया था.
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह और विदेश की कई यूनिवर्सिटीज़ ने इन प्रदर्शनकारियों की जल्द रिहाई की मांग की थी. कुछ एक्टिविस्ट समूहों ने उन लोगों के नाम भी पब्लिश किए थे जिन्हें कथित तौर पर हिरासत में लिया गया था. इसमें राजधानी बीजिंग समेत शंघाई, ग्वांगज़ो और नानजियांग में विरोध के लिए उतरे लोगों के नाम शामिल थे.
प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के आरोप पर चीनी अधिकारियों ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. लेकिन ऐसे कुछ लोगों के दोस्तों और वकीलों से बातचीत करके बीबीसी इनमें से 12 लोगों के नामों की पुष्टि कर सकी है जिन्हें बीजिंग में गिरफ़्तार किया गया था.
इनमें से पांच लोगों को ज़मानत पर रिहा किया गया है. जो लोग अभी भी कस्टडी में हैं उनमें शाओ ज़िशिन, ली शेची, ली युआनजिंग और ज़ाई डेनग्रुई नाम की चार महिलाएं शामिल हैं.
उन्हें औपचारिक तौर पर "झगड़ा शुरू करने और उकसाने के लिए" गिरफ़्तार किया गया है. ये एक कुख्यात और बेतुका आरोप है जिसके लिए अधिकतम पांच साल की सज़ा दी जा सकती है, इसके बारे में आलोचक कहते हैं कि विद्रोह पर शिकंजा कसने के लिए इसका इस्तेमाल होता है.

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'ये लोग एक्टिविस्ट नहीं हैं'
अधिकतर लोग जिन्हें गिरफ़्तार किया गया वो पढ़े-लिखे हैं, कुछ ने तो अमेरिका और ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज़ से पढ़ाई की है. इनमें से कुछ लेखक हैं, कुछ पत्रकार हैं, एक व्यक्ति संगीतकार है, एक टीचर है और एक फ़ाइनेंस इंडस्ट्री में काम करता है.
बीजिंग में जिन लोगों को हिरासत में लिया गया उनमें ऐसे लोग शामिल हैं जो एक लूज़ नेटवर्क था. ये लोग कला के प्रति अपने प्यार के बारे में बात करते थे और बुक क्लब, फ़िल्मों की स्क्रीनिंग और अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा के लिए मिला करते थे.
रिपोर्टों के अनुसार, इसमें अधिकतर महिलाएं थीं. पुलिस ने उनसे सवाल किए कि क्यों वो ख़ुद फ़ेमिनिस्ट हैं या किसी तरह की "फ़ेमिनिस्ट गतिविधि" से जुड़ी हैं. हाल के सालों में चीनी अधिकारियों ने महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई बढ़ाई है.
इनके दोस्तों का कहना है कि ये समूह सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक है और इनमें से कुछ सदस्यों ने मी-टू आंदोलन का चेहरा बनी शियान्ज़ी का समर्थन भी किया था. लेकिन ये लोग एक्टिविस्ट नहीं हैं.
हिरासत में रखे गए एक व्यक्ति के दोस्त ने कहा, "ये ऐसे युवा हैं जो समाज के प्रति जागरूक हैं... मेरे दोस्त केवल महिला अधिकारों में दिलचस्पी नहीं रखते बल्कि वो मानवाधिकारों और कमज़ोर वर्गों के हक़ों में भी दिलचस्पी दिखाते हैं. इनका फ़ेमिनिस्ट से जुड़ी बातों से कोई नाता नहीं है."
बीते साल नवंबर 27 को बीजिंग के लियांगमा नदी के पास उरुमकी में हुई घटना का विरोध करने के लिए महिलाओं का एक समूह इकट्ठा हुआ था.
चीन के उरुमकी में इमारत के एक ब्लॉक में आग लगी थी जिससे कई लोगों की मौत हो गई थी. कई लोगों का कहना था कि हादसे में मारे गए लोग कोविड की कड़ी पाबंदियों के कारण भागकर अपनी जान नहीं बचा सके.
इस घटना ने लोगों में ज़ीरो-कोविड नीति के ख़िलाफ़ जमकर गुस्सा भर दिया और इसके विरोध में कई जगहों पर लोगों ने प्रदर्शन किए और शांतिपूर्ण जुलूस निकले.
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उस वक्त लोगों ने हाथों में सफ़ेद काग़ज़ लिए शांतिपूर्ण जुलूस निकाले. ये सरकार की नीतियों के कारण लोगों के मन में भरे गुस्से का प्रतीक बन गया.
गिरफ़्तार किए गए एक व्यक्ति के दोस्त ने बताया, "यहां लंबे वक्त से दमनकारी माहौल है. जब ये लोग घरों से बाहर निकले तो उन्हें नहीं लगा कि वो किसी आंदोलन में जा रहे हैं. उन्हें ये लग रहा था कि वो अपनी भावनाओं का इज़हार करने के लिए जा रहे हैं."
"न तो उन्होंने पुलिस से झड़प की और न ही कहीं कोई कट्टर बयान दिए. उन्हें नहीं लगा कि ये इतना गंभीर होगा."
बीजिंग में जो प्रदर्शन शुरू हुए वो उरुमकी हादसे में मारे गए लोगों की याद में शांतिपूर्ण जुलूस के तौर पर हुए. इसमें शामिल हुए लोगों के दोस्तों का कहना है कि यही कारण था कि ये जानते हुए कि चीन में विरोध करने की बेहद कम जगह है, इसमें हिस्सा लेते वक्त लोगों ने अपनी पहचान नहीं छिपाई.
अब तक ये नहीं पता चल पाया है कि पुलिस लियांगमा नदी के पास इकट्ठा हुए इस समूह के लोगों तक कैसे पहुंची. कहा जा रहा है कि पुलिस ने इसके लिए सर्विलांस कैमरों और फ़ेशियल रिकग्निशन सॉफ़्टवेयर का सहरा लिया और जिन लोगों को गिरफ़्तार किया उनके फ़ोन की भी जांच की.
एक व्यक्ति जिन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार किया था उन्होंने एक टेलीग्राम ग्रुप बनाया था जिसमें धीरे-धीरे कर 60 से अधिक लोग बतौर सदस्य जुड़ गए थे. इनमें से अधिकतर लोग अपने असली नामों से रजिस्टर्ड फ़ोन नंबर से इसमें जुड़े थे. दो दिन बाद उनसे भी पुलिस ने सवाल-जवाब किए.
हिरासत में ली गई एक महिला के बॉयफ़्रेंड ने बताया, "जब उसे पकड़ा गया वो फ़ोन पर मुझसे बात कर रही थीं. उन्होंने मुझे बताया कि उनके कुछ दोस्तों को पकड़ा गया है और उनसे वो संपर्क नहीं कर पा रही हैं. वो अपने फ़ोन से कुछ चीज़ें डिलीट करना चाहती थीं, लेकिन उससे पहले उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया."

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एक्टिविस्टों के मुताबिक़, दिसंबर और जनवरी में एक के बाद एक गिरफ़्तारियां बढ़ी हैं, और अधिक दोस्त हिरासत में लिए गए हैं.
गिरफ़्तारी की आशंका को देखते हुए साओ झिशिंग ने अपने दोस्तों को एक वीडियो मैसेज भेजा और कहा कि अगर वो ग़ायब हो जाती हैं तो इसे ऑनलाइन पोस्ट कर दिया जाए.
वायरल हुई इस क्लिप में साओ ने कहा है, "हमने अपनी भावनाओं को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शित किया है. हम ग़ायब नहीं होना चाहते...अगर किसी जनाज़े में शामिल होना अपराध है तो हमें अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने के लिए कितनी जगह बची है."
चिंता और निंदा
कई मानवाधिकार संगठन और शैक्षणिक संस्थाओं ने स्टूडेंट्स की रिहाई के लिए चिंता ज़हिर की है.
ब्रिटिश यूनिवर्सिटी गोल्डस्मिथ्स ने बीबीसी से पुष्टि की कि ली सीकी उसकी पूर्व स्टूडेंट हैं और वो उन्हें लेकर बहुत चिंता में हैं.
गोल्डस्मिथ्स के प्रवक्ता ने कहा, "बोलने की आज़ादी को दबाने की कार्रवाई की हम कड़ी निंदा करते हैं और चीनी प्रशासन से अपील करते हैं कि जिन्हें गिरफ़्तार किया गया है उन्हें तुरंत रिहा किया जाए."
यूनिवर्सिटी ने ब्रिटेन में चीन के राजदूत झेंग ज़ेगुआंग को चिट्ठी लिखी है. बीबीसी के सवाल पर चीन के दूतावास से अभी कोई जवाब नहीं मिला है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो और यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू साउथ वेल्स ने भी अपने पूर्व छात्रों के गिरफ़्तार होने की पुष्टि की है.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि ली सीकी समेत जिन चार लोगों को हिरासत में लिया गया है उनमें पत्रकार भी हैं और "इन गिरफ़्तारियों को तथ्य को सामने लाने की कोशिशों का गला घोंटने वाला" बताया है.
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि ये घटना दिखाती है कि चीन के नौजवान आज़ादी और मानवाधिकार के लिए आवाज़ उठाने की भारी क़ीमत चुका रहे हैं. गिरफ़्तार लोगों को सपोर्ट करने वाले वकीलों और दोस्तों को चीनी प्रशासन धमका रहा है.
विश्लेषकों का कहना है कि ये गिरफ़्तारियां कड़ा संदेश देने के लिए की जा रही हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता टेंग बियाओ का कहना है, "ये चिकन को मार कर बंदरों को डराने जैसी कार्रवाई है."

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कड़ा संदेश देने की कोशिश
वे चाहते हैं कि लोगों में ये संदेश जाए कि जो अगुवाई कर रहे हैं और आयोजक हैं उन्हें कड़ी सज़ा दी जाएगी. उनका कहना है कि प्रशासन इन प्रदर्शनों के पीछे पश्चिमी ताक़तों की साज़िश तलाश रहा है.
तथ्य ये है कि अधिकांश गिरफ़्तार लोगों में महिलाएं हैं और उनसे महिला अधिकारों का समर्थन करने को लेकर पूछताछ की जा रही है.
हाल के सालों में चीन में महिला हिंसा और यौन उत्पीड़न के कई हाई प्रोफ़ाइल मामले प्रकाश में आए. इसने प्रशासन की तीखी आलोचना को जन्म दिया और महिला अधिकारों के प्रति व्यापक समर्थन पैदा किया है.
लेकिन आंदोलन जैसे जैसे जोर पकड़ता गया सरकार का शिकंजा भी कसता गया. साल 2015 में प्रशासन ने फ़ेमिनिस्ट फ़ाइव नामक की महिलाओं के एक समूह पर कार्रवाई की, उनकी बातों को सेंसर किया जाने लगा और उन्हें ऑनलाइन निशाना बनाए जाने लगा.
हाल ही में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक शाखा ने "अति नारीवाद" को "कैंसर" बताया था.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉरविक में चाइनीज़ जेंडर पावर रिलेशन पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एल्टमैन पेंग के अनुसार, "सामाजिक शांति बनाए रखना सरकार की शीर्ष वरीयता है और फ़ेमिनिस्ट मूवमेंट को पूरे राजनीतिक सिस्टम की स्थिरता के लिए ख़तरा माना जाता है."
अभी ये नहीं पता कि इन प्रदर्शनों में आगे क्या होगा. जो ज़मानत पर रिहा हैं, उन पर अभी भी आरोप लगाए जा सकते हैं. जो हिरासत में हैं, उन्हें कई हफ़्तों तक अंदर रहना पड़ सकता है. टेंग के अनुसार, राजनीतिक मुक़दमों में अगर ये हिरासत सालों की नहीं होगी तब भी महीनों लग ही सकते हैं.

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डर से परिवार ख़ामोश
उनके परिवार अभी तक ख़ामोश हैं और कुछ ने हिरासत में लिए गए लोगों के दोस्तों से अपने संपर्क काट लिए हैं. बीबीसी को पता चला है कि एक परिवार ने अपनी बेटी के लिए वकील हायर किया था, लेकिन बाद में उसने हटा दिया, ये साफ़ नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया.
मानवाधिकार कार्यकर्ता यांग झांकिंग के अनुसार, गिरफ़्तार लोगों के परिवारों पर अत्यधिक दबाव है इसलिए वे ख़ामोश हैं.
"पुलिस ने साम दाम दंड भेद का तरीक़ा अख़्तियार कर रखा है. प्रशासन परिवारों से कहता है कि अगर वे ख़ामोश रहेंगे तो जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें नौकरी और पेंशन से हाथ धोना पड़ेगा."
यांग के अनुसार, "इन गिरफ़्तारियों पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण सलाखों के अंदर बंद लोगों को मदद मिल सकती है. इस तरह से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में बंद लोगों को जल्द छोड़ा जा सकता है या जेल में उनके साथ अच्छा बर्ताव हो सकता है."
इस बीच जेल में बंद लोगों के दोस्त खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और लगातार हालात पर नज़र बनाए रखे हुए हैं और सूचनाएं साझा कर रहे हैं.
इनमें से कई विदेश में रह रहे हैं और नवंबर प्रोटेस्ट में शामिल नहीं रहे, लेकिन उन्हें डर है कि उन्हें भी निशाना बनाया जा सकता है क्योंकि बंदियों के साथ उनके संबंध हैं और वे अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को उठा रहे हैं.
हाल ही में उन्होंने एक बंदी के संदेश को फैलाया. ये संदेश जेल से सीधे आया था. इसमें ये बताने की कोशिश थी कि बंदियों के हौसले पस्त नहीं हैं.
इसमें कहा गया था, "हमसे पूछताछ करने वाले हमें ये अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम ग़द्दार या धोखा देने वाले दोस्तों से घिरे हैं, लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि हम एकजुट हैं."
(कुछ लोगों के नाम ज़ाहिर नहीं किए गए हैं जिन्हें अधिकारियों की ओर से कार्रवाई का अंदेशा है.)
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