सीरिया झेल रहा त्रासदी पर त्रासदी, भूकंप के बाद मदद पहुंचाना हो रहा मुश्किल

सीरिया भूकंप मानवीय मदद

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इमेज कैप्शन, सीरिया में विद्रोहियों के कब्ज़े वाले शहर जानदारिस में मृतकों के लिए कब्र खोदते वोलेंटियर्स
    • Author, लीस डुसेट
    • पदनाम, मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता, तुर्की से

भूकंप के बाद सीरिया एक और नए संकट का सामना कर रहा है. एक दशक से ज़्यादा समय तक सीरिया युद्ध की त्रासदी झेल चुका है और अब भूकंप ने उसके सामने चुनौती खड़ी कर दी है.

भूकंप के ताकतवर झटकों के कारण यहां बड़े पैमाने पर इमारतें ज़मीन्दोज़ हो गई हैं. और पहले से युद्ध से तबाह इस देश में मानवीय राहत पहुंचाना बेहद मुश्किल रहा है.

हालांकि ये कहना ग़लत नहीं होगा कि भूकंप के बाद सीरिया में हालात थोड़े बदलते दिख रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यहां तक मानवीय राहत पहुंचाने के लिए रास्ता बनाने की कोशिश में जुट गई हैं.

हाल में सीरिया की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया था कि सीरियाई सरकार यहां पूरे देश में मानवीय मदद पहुंचाने के लिए रास्ता खोलने को तैयार हो गई है.

सना न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़ इसमें सरकार के नियंत्रण वाले इलाक़ों के साथ वो क्षेत्र भी शामिल है जिन पर विद्रोही समूहों का कब्जा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के साथ सीरियन अरब रेड क्रेसेंट और रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति की देख-रेख में लोगों तक मदद पहुंचाई जाएगी.

संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता प्रमुख मार्टिन ग्रिफ़िथ ने कहा है कि "ये बहुत अच्छी पहल है, लेकिन इसमें अभी और सुधार की ज़रूरत है."

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मार्टिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार के ऐलान में सिर्फ़ सीरिया के 'इंटरनल फ्रंटलाइन' के भीतर के इलाकों का ज़िक्र है, पड़ोसी देशों के साथ सरहदी इलाकों का इसमें ज़िक्र नहीं है.

मार्टिन ग्रिफ़िथ ने कहा कि, "हम सरकार से इस बात की मांग कर रहे हैं कि वो पीड़ित लोगों तक ज़रूरी चीजें पहुंचाने के लिए कुछ और भी रास्ते खोलने की मंजूरी दे."

बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये वो वक्त है जब राजनीति को परे रख कर मानवीय मदद को पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि हमें उम्मीद छोड़नी चाहिए. हम तुर्की से रास्ते उत्तर-पश्चिम सीरिया तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं और दो और चेक प्वांइट खुलवाने की बात कर रहे हैं. हम इसके लिए सुरक्षा परिषद तक जाएंगे, किसी को वीटो करना हो तो वो ऐसा कर सकते हैं. लेकिन इस मामले में राजनीति नहीं आनी चाहिए, ये ऐसे मुद्दा नहीं जिसे राजनीति के चश्मे से देखा जाए."

फिलहाल विद्रोहियों के कब्ज़े वाले उत्तरी पश्चिमी सीरिया के इदलिब प्रांत तक पहुंचने के लिए सिर्फ़ एक ही रास्ते को खोला गया है, वो है तुर्की के बॉर्डर की तरफ से बाब-अल-हवा क्रॉसिंग.

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मानवीय मदद पहुंचाने के लिए ज़रूरी रास्ते बंद क्यों?

सीरिया में इस तरह की ज़रूरी लाइफ़लाइन शुरू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी चाहिए होती है. चीन और रूस जैसे सदस्य देश हमेशा सीरियाई सरकार के कठोर नियमों का समर्थन करने लिए बार-बार अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया है. इसके तहत वो कहते हैं कि इस तरह का तंत्र सीरिया की संप्रभुता का उल्लंघन है.

संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम संगठन सीरिया और उसके क़रीबी देशों से गुहार लगाते रहे है कि वो उत्तरी इलाक़े में मदद पहुंचाने के लिए तुर्की से होकर जाने वाला बाब-अल-सालमेह का दूसरा रास्ता भी खोले. इसी तरह इराक़ की तरफ से कुर्द बहुल उत्तरी पूर्वी इलाक़ों तक पहुंचने के लिए भी रास्ते खोले जाए.

इसी हफ्ते सीरिया के विपक्षी दलों ने ये ऐलान किया था कि उन्होंने बाब-अल-सालमेह और अल-राय की तरफ से कॉरिडोर खोलने की मंजूरी ले ली है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र के विपरीत दूसरी ग़ैर-सरकारी सहायता एजेंसियों को यहां मदद पहुंचाने के लिए सुरक्षा परिषद की मंजूरी की ज़रूरत नहीं होती.

इसी गुरुवार को जब संयुक्त राष्ट्र का पहला राहत दल कंबल और दूसरी ज़रूरी चीज़ों के साथ बाब-अल-हवा तक पहुंचा तो वहां की प्रतिक्रिया कड़वाहट भरी रही.

हालात पर खेद जताते हुए सीरिया के एक पत्रकार इब्राहिम ज़ेदान ने बीबीसी से कहा कि, "ये वो राहत समाग्री थी जो भूकंप से पहले यहां पहुंचाई जानी थीं."

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मानवीय मदद का अभाव

ये रास्ता 40 लाख से ज़्यादा सीरियाई लोगों तक मदद पहुंचाने का ज़रिया था, ज़्यादातर लोग गुज़र-बसर के लिए इन्हीं चीजों पर निर्भर हैं. सोमवार को आए भूकंप में ये रास्ता बुरी तरह तबाह हुआ है.

इन लोगों में से ज़्यादातर सीरिया में संघर्ष के शुरुआती वक्त से ही विस्थापित हुए है. अब ये ऐसी स्थिति में है कि इनके पास खोने के लिए भी कुछ नहीं बचा.

नॉवे की रिफ्यूजी काउंसिल के महासचिव जेन इगेलैंड बताते हैं, "सीरिया में भूकंप से सबसे ज़्यादा तबाही उत्तरी-पश्चिमी इलाक़े में ही हुई है. यहां सभी लोगों तक राहत सामग्री और मदद पहुंचाने के लिए हमें फ्रंटलाइन्स की तरफ से जाने की पूरी छूट चाहिए."

सहायता एजेंसियों से जुड़े कुछ सूत्रों ने बताया कि पहले सरकार के नियंत्रण वाले इलाक़ों से जब विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में मदद पहुंचाई गई, तो उसे नकार दिया गया. इसलिए इस बात का डर हमेशा रहता है कि मदद पहुंचाने के बाद उसे लौटा दिया जाएगा.

सारिया

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बीबीसी से बातचीत में जेन इगेलैंड ने इस बात पर ज़ोर दिया कि, "इस वक्त मानवीय मदद के लिए युद्धविराम की ज़रूरत है. हम उम्मीद करते हैं सरकार और हथियारबंद विद्रोही गुट राजनीति को इसमें आड़े नहीं आने देंगे."

इगेलैंड ने सरकार के उस ऐलान को लेकर भी अंदेशा जताया, जिसमें मानवीय मदद पहुंचाने के लिए एजेंसियों को छूट देने की बात की गई है. सीरिया की सरकार ने पहले भी ऐसा ऐलान किया है, लेकिन उसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ.

इधर सीरिया में ज़मीनी हालात ऐसे हैं कि लाखों लोग बर्फीली ठंड में बाहर टेंट लगाकर रहने को मजबूर हैं. जानकार मानते हैं कि इस वजह से पूरे इलाक़े में मानवीय त्रासदी और गहरा सकती है. हालात को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र पर यहां तक किसी भी तरह से मदद पहुंचाने का दबाव बढ़ रहा है.

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इमेज कैप्शन, सीरिया में भूकंप के बाद मौसम की मार, लोग खुले में टेंट में रहने को मजबूर

संयुक्त राष्ट्र की मदद पर सियासत

इस सप्ताहांत मार्टिन ग्रिफ़िथ सीरिया और तुर्की दोनों देशों के दौरे पर जाने वाले हैं ताकि यहां के लोगों के साथ संकट में साथ होने का भरोसा दे सकें.

लेकिन उनके दौरे में सीरिया की संप्रभुता भी एजेंडे का मुख्य हिस्सा होगा, खासतौर पर सरकार के नियंत्रण वाले उत्तरी शहर अलेप्पो को लेकर. अलेप्पो भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हुआ है और संघर्ष में एक तरह से निरपेक्ष माना जाता है.

बीते दशक भर से युद्ध झेल रहे सीरियाई लोग बरसों की ग़रीबी से जूझते रहे हैं और अनेक अभावों की वजह से उनका जीवनस्तर भी काफी नीचे आ चुका है.

बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़आवर में सीरियाई राष्ट्रपति बशर-अल-असद के विशेष सलाहकार डॉ. बौथायना शाबान ने कहा, "पश्चिमी देश सभी देशों से एक जैसा सुलूक क्यों नहीं करते? ये मानवता नहीं है, बल्कि राजनीति है."

शाबान ने पश्चिमी देशों से ये भी अपील की कि वो सीरिया पर लगे प्रतिबंध हटाएं, क्योंकि इनकी वजह से विदेशों में बसे सीरियाई देश में रह रहे अपनों की मदद नहीं कर पा रहे हैं.

अमेरिका ने भूकंप से प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए प्रतिबंधों में ढील का लाइसेंस जारी किया है. लेकिन सीरिया की तरफ से आने वाले बयानों के जवाब में अमेरिका की तरफ से भी उतनी ही कड़वाहट है.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि, "ये ऐसी सरकार (सीरिया) है, जिसने कभी अपने लोगों के कल्याण और जीवन स्तर में बेहतरी को प्राथमिकता नहीं दी."

उन्होंने कहा कि "सीरिया में मदद और राहत कार्यों को हमेशा हथियार बनाकर इस्तेमाल किया गया. ये हमने जंग के सबसे ख़राब दौर में सीरिया से रिपोर्टिंग के दौरान अपनी आंखों से देखा है. किस तरह से सीरिया की सरकार ने अपने फ़ोर्सेज के ज़रिए अपने विरोधियों का समर्थन करने वाले इलाक़ों को अलगथलग कर आत्मसमर्पण या भूखा रहने को मजबूर किया."

सीरियाई एजेंसिया इस बात पर ज़ोर देती हैं, कि जो भी मदद है उनके ज़रिए पहुंचाई जाए, पश्चिमी एजेंसियों के ज़रिए कतई नहीं.

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प्रभावित इलाकों में रेस्क्यू ऑपरेशन की मुश्किलें

उधर इदलिब शहर में रेस्क्यू ऑपरेशन का नज़ारा अलग है. इसमें वो वोलंटियर शामिल हैं, जिन्हें सीरिया और रूस के हवाई हमलों के बाद मलबे से लोगों को निकालने की ट्रेनिंग दी गई थी. अब वो भूकंप के मलबे से लोगों को निकाल रहे हैं.

सीरिया के उत्तरी पश्चिमी इलाके का ज्यादातर हिस्सा 'हयात तहरीर-अल-शाम' के प्रभाव क्षेत्र में आता है. अमेरिका इसे आतंकी संगठन घोषित कर चुका है. हालांकि ये संगठन खुद को अल-क़ायदा का सहयोगी होने की छवि से दूर होने की कोशिश करता है.

सीरिया का पूरा राजनीतिक नक्शा ही मानवीय मदद के लिए कब्रगाह बन चुका है. इसके उत्तरी-पश्चमी इलाक़े के बड़े हिस्से को कुर्दों की सेना नियंत्रित करती है. ये कभी सीरियाई सरकार के विरोध में होती है, तो कभी अपनी सुविधा से गठबंधन भी कर लेती है.

इसके अलावा जो इलाक़े इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण में हैं, वो रिलिफ़ ऑपरेशन के सामने जोख़िम और भी बढ़ा देते हैं.

भूकंप के लिए राहत कार्यों को लेकर ये जटलिताएं क्षेत्रीय स्तर पर भी झलक रही हैं. पिछले कुछ बरसों में कुछ अरब देश जो सीरिया के विरोध में पश्चिमी देशों का समर्थन कर रहे थे, उनके रुख़ में भी बदलाव आया है.

जैसे कि संयुक्त अरब अमीरात. ये खाड़ी देशों में पहला ऐसा देश है, जिसने सीरिया को अरब देशों के समूह में शामिल करने की कोशिश की. हालांकि इसके पीछे वजह ईरान से बढ़ती सीरिया की नजदीकियां थी.

यूएई ने सबसे पहले सीरिया और तुर्की में मानवीय मदद पहुंचाने के लिए वायु मार्ग के ज़रिए रास्ते स्थापित किए. तुर्की और सीरिया की मदद करने वाले दूसरे अरब देशों के साथ सऊदी अरब ने भी यही किया.

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इमेज कैप्शन, सीरिया को यूएई की तरफ से भेजी गई राहत सामग्री

सीरिया के साथ बदलते राजनीतिक समीकरण

भूकंप के संकट से पहले के महीनों में सीरिया और तुर्की के बीच भी दोस्ती बढ़ने के संकेत मिले थे. सीरिया के युद्ध के दौरान ये दोनों ही एकदूसरे के ख़िलाफ़ तलवारें ताने खड़े थे.

पिछले दिसंबर में रूस ने एक तरह से तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन को उकसाने वाली बात की. रूस तुर्की से इसलिए झल्लाया हुआ है, क्योंकि उसकी सेना उत्तरी सीरिया में तैनात है.

राष्ट्रपति अर्दोआन के लिए उनकी सेना उत्तरी-पूर्वी इलाक़े में सीरिया की सेना को आगे बढ़ने रोकने के लिए गढ़ बन चुकी है. वहीं उत्तरी पश्चमी इलाके में सीरियाई कुर्द बलों को उनके कट्टर दुश्मन पीकेके से जुड़ा हुआ माना जाता है.

इस तरह सीरिया अपने आप में कई स्तर पर जंग का मैदान बन चुका है. तुर्की, अमेरिका, रूस और ईरान की सेना कहीं न कहीं एकदूसरे के सामने हैं. वहीं इसरायल के लड़ाकू जहाज हमेशा ईरानी और लेबनान के हिज़बुल्ला के ठिकानों की तलाश में आसमान में मंडराते रहते हैं.

इगेलैंड कहते हैं, "सीरिया में मानवीय मदद किसी राजनीति धड़े के जरिए नहीं पहुंचनी चाहिए, ना तो सरकार के नियंत्रण वाले इलाक़ों में और ना ही विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़े में. पहली प्राथमिकता इंसानी ज़िंदगी को दी जानी चाहिए."

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