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इमरान ख़ान बनाम फ़ौज की लड़ाई में जीत किसकी होगी?
- Author, हारून रशीद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, इस्लामाबाद
इमरान ख़ान अपने राजनीतिक जीवन के एक और लॉन्ग मार्ग पर लाहौर से रवाना हो चुके हैं.
वह इसे 'हक़ीक़ी (वास्तविक) आज़ादी मार्च' का नाम दे रहे हैं लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य देश में जल्द से जल्द आम चुनाव करवाना है.
लेकिन दुर्भाग्य से फ़ौज और इमरान ख़ान के बीच सीधी टक्कर वाली स्थिति बन गई है.
गंभीर आर्थिक संकट और महंगाई के शिकार देश में उनका यह मार्च लंबे समय से जारी राजनीतिक संघर्ष को प्रत्यक्ष रूप से और बढ़ाने का कारण ही बनेगा.
मार्च के पहले आम सभा में उन्होंने सरकारी संस्थाओं विशेषकर ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल नदीम को आड़े हाथों लिया और साफ़ तौर पर उनकी एक दिन पहले की प्रेस कॉन्फ़्रेंस का मज़ाक़ उड़ाया.
उन्होंने कहा, "आप (फ़ौज) ने कहा था कि हम राजनीति नहीं करते लेकिन जो प्रेस कॉन्फ्रेंस आपने की, ऐसी राजनीतिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस तो कभी शेख़ रशीद ने भी नहीं की."
उन्होंने फ़ौज के बारे में कहा, "इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस से साबित हुआ कि आप निष्पक्ष नहीं रहे. प्रेस कॉन्फ़्रेंस का सारा निशाना मेरा व्यक्तित्व था, 'उन चोरों' के संबंध में आपने कुछ नहीं कहा."
इमरान ख़ान ने कहा, "डीजी आईएसआई कान खोल कर सुन लो, मैं बहुत कुछ जानता हूँ लेकिन मैं अपने देश और उसकी संस्थाओं के लिए चुप हूँ क्योंकि मैं अपने देश को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहता."
इमरान ख़ान और सेना के बीच रोमांचक मैच
फ़ौज पर इस असामान्य और तीखी आलोचना के बाद सैन्य प्रशासन और इमरान ख़ान के बीच मैच अत्यंत रोमांचक और नाटकीय हालत में पहुँच गया है.
यह राजनीतिक कशमकश 11 दलों वाले सत्तारूढ़ गठबंधन और इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) से हटकर तहरीक-ए-इंसाफ़ बनाम सैन्य संस्था बन गया है.
मुस्लिम लीग नवाज़ के नेतृत्व में 11 दलों का सत्तारूढ़ गठबंधन बस दर्शक बनकर रह गया है.
उनके मंत्री प्रेस कॉन्फ़्रेंस और बयानों से फ़ौज का बचाव कर रहे हैं लेकिन उनका कोई राजनैतिक महत्त्व अब रहा नहीं.
मुस्लिम लीग नून वह पार्टी है जो अतीत में नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में फ़ौज को तीखी आलोचना का निशाना बनाती रही है.
वह और तहरीक-ए-इंसाफ़ ज़ाहिर तौर पर इस हद तक एक हैं कि दोनों ने एक समय में फ़ौज से राजनैतिक टक्कर ली है.
लेकिन राजनैतिक तौर पर काफ़ी नुक़सान उठाने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इस वक़्त किनारे खड़ी चुप है.
इमरान ख़ान की मार्च की घोषणा से स्पष्ट है कि वह जल्द से जल्द चुनाव चाहते हैं.
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह जो भी झूठा सच्चा नैरेटिव बनाते हैं, वह उसे सही मानते हुए उसके रास्ते में किसी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं करते, चाहे वह देश की सबसे शक्तिशाली संस्था फ़ौज ही क्यों न हो.
आईएसआई का अप्रत्याशित क़दम
पाकिस्तानी फ़ौज ने उनकी इस राय को बार-बार ग़लत साबित कर दिया है कि उनकी सरकार समाप्त करने में अमेरिका शामिल था.
उन्होंने पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़) की उस राय को भी ग़लत साबित कर दिया कि वर्तमान सेना प्रमुख जनरल क़मर बाजवा 'ग़द्दार' या लालची हैं और अपने कार्यकाल में विस्तार चाहते हैं.
आईएसआई प्रमुख ने मीडिया को बताया कि अगर जनरल बाजवा 'ग़द्दार' थे तो उन्हें इमरान ख़ान ने सेवा विस्तार की पेशकश क्यों की थी.
पाकिस्तान के इतिहास में सेना के प्रवक्ता और आईएसआई प्रमुख की संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस अत्यंत असाधारण बात थी.
सेना को सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना का सामना करने के बाद यह क़दम उठाना पड़ा.
लेकिन इसका साफ़ तौर पर कोई असर नहीं पड़ा है. इमरान ख़ान उसी तरह सेना पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. इसके बाद सेना के पास काफ़ी कम लेकिन बेहद ख़तरनाक विकल्प ही रह जाते हैं.
छह माह के इंतज़ार के बाद इमरान ख़ान द्वारा अचानक मार्च की घोषणा के दो बड़े कारण समझे जा रहे हैं.
एक उनको चुनाव आयोग की ओर से सरकारी तोहफ़े ज़ाहिर न करने पर अयोग्य घोषित किया जाना और दूसरा उनके कट्टर समर्थक पत्रकारों में से एक अरशद शरीफ़ की कीनिया में हत्या शामिल हैं.
वह अपने आप को दीवार के साथ खड़ा पाते हैं इसलिए एक बार फिर सड़कों पर निकल आए हैं.
लेकिन इमरान ख़ान की बेचैनी की शायद सबसे बड़ी वजह नए सैन्य प्रमुख की नवंबर में तैनाती है.
वह कह चुके हैं कि वर्तमान 'चोर' इस महत्वपूर्ण पद का फ़ैसला करने का अधिकार नहीं रखते और इस फ़ैसले को चुनाव के बाद नई सरकार तक छोड़ देना चाहिए.
वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा होता दिखाई नहीं देता. शहबाज़ शरीफ़ सरकार यह अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहेगी.
सोशल मीडिया पर इमरान की टीम हावी
मार्च की घोषणा से इमरान ख़ान अपने वोटरों और समर्थकों से लगातार संपर्क रखने के सिलसिले को पुख़्ता बनाना चाहते हैं.
सरकार गिरने के बाद से उन्होंने लगभग हर दिन बल्कि दिन में दो-दो, तीन-तीन बार जनसभाएं की हैं और भाषण दिए हैं.
मार्च से वह इसे और ठोस रूप दे पाएंगे. हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर निगरानी रखने वाली संस्था 'पेमरा' ने समाचार चैनलों पर पाकिस्तान में उनके भाषणों के सीधे प्रसारण पर रोक लगा रखी है लेकिन सोशल मीडिया का इस्तेमाल तहरीक-ए-इंसाफ़ ने अब तक सबसे प्रभावी ढंग से किया है.
उन्हें इस पाबंदी से शायद कोई अंतर न पड़े.
जीटी रोड पर वह हर दिन भाषण देंगे और अगर घोषणा के अनुसार मार्च चलता है तो उन्हें चार नवंबर को इस्लामाबाद पहुंचना चाहिए.
केंद्र सरकार ने पहले ही इस्लामाबाद को पूरी तरह सील करने की व्यवस्था कर रखी है. वह तहरीक-ए-इंसाफ़ को किसी एक स्थान पर शायद धरने की इजाज़त भी दे देगी.
बढ़ा पीड़ितों की ख़ैरियत लेने वाला कोई नहीं
इमरान ख़ान के साथ कितने लोग सड़कों पर आते हैं और धरने में कितने बैठते हैं, यह इस्लामाबाद पहुंचकर मालूम होगा लेकिन अगर वे शांतिपूर्ण रहते हैं सरकार को बहुत समस्या नहीं होनी चाहिए.
हां, उनके भाषण सरकार और विशेषकर संस्थाओं पर दबाव बढ़ाए रखेंगे. वे इसे शायद अधिक बर्दाश्त न करें.
ये सारी अनिश्चितताएं पाकिस्तानी जनता को मुश्किल में डाल रही हैं.
राजनैतिक अस्थिरता से स्टॉक मार्केट से नकारात्मक प्रतिक्रिया का ख़तरा है.
शुक्रवार को शेयरों में मंदी आई है. नागरिक पहले ही मुद्रास्फीति और बढ़ते हुए चरमपंथी हमलों से परेशान हैं.
ऐसे में उन लाखों बाढ़ पीड़ितों का राजनैतिक परिदृश्य में कोई उल्लेख ही नहीं कर रहा जो मदद के लिए इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन यह संकट निकट भविष्य में समाप्त होता नज़र नहीं आता.
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