एससीओ बैठकः पीएम मोदी और शी जिनपिंग गलवान संघर्ष के बाद आज पहली बार होंगे आमने-सामने

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उज़्बेकिस्तान के ऐतिहासिक शहर समरक़ंद में 15-16 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मलेन में लोगों की निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर टिकी होंगी.

मोदी और जिनपिंग साल 2020 में गलवान सीमा पर दोनों देशों के बीच झड़पों के बाद पहली बार आमने-सामने होंगे.

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में शामिल होने वाले दूसरे नेताओं के साथ ये दोनों नेता एक ही मंच पर बैठे नज़र आएंगे.

लोगों की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि अगर शिखर सम्मेलन से हटकर अगर दोनों नेताओं के बीच दोतरफ़ा बैठक हुई तो किन मुद्दों पर बातचीत हो सकती है?

ये सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब भारतीय और चीनी सैनिकों को पूर्वी लद्दाख में हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से हटाने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है, जिससे इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि दोनों देशों के नेता आपस में बातचीत करेंगे. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि मई 2020 में शुरू हुआ सैन्य गतिरोध लद्दाख में कई जगहों पर सुलझा लिया गया है.

दोनों नेताओं की संभावित मुलाक़ात से ठीक पहले, व्यवस्थित तरीक़े से टकराव टालने के लिए उठाए गए क़दम इस ओर इशाारा करते हैं कि संभवतः बातचीत के लायक माहौल तैयार किया जा रहा है.

इस साल मार्च में चीनी विदेश मंत्री वांग यी भारत के न्योते पर दिल्ली आए थे जो इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य करने की कोशिश की जा रही है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों नेताओं के बीच भारत-चीन के आपसी रिश्तों में सुधार के उपायों पर बातचीत हो सकती है.

इसके अलावा भारत इस बात को लेकर भी चीन से नाखुश है कि उसने दो मौकों पर पाकिस्तान से चरमपंथी गतिविधियां चलाने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव को वीटो कर दिया था. ये भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत का एक मुद्दा हो सकता है.

दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद को उम्मीद है कि दोनों नेताओं के बीच बैठक होगी.

दोनों नेताओं के बीच किन मुद्दों पर विचार होगा, इस पर वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि दो-तीन चीज़ें अहम होंगी इस द्विपक्षीय बैठक में. पहला ये कि सीमा विवाद के समाधान पर बातचीत हो सकती है. दोनों देश चाहेंगे कि इसके समाधान के लिए बातचीत तेज़ी से हो. दूसरा, व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग पर ज़रूर बातचीत हो सकती है. बातचीत का तीसरा अहम मुद्दा हो सकता है सुरक्षा के दृष्टिकोण से, और वो ये कि भारत और चीन दोनों चाहेंगे कि नेटो के मुक़ाबले में एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचा तो होना ही चाहिए."

डॉक्टर फ़ैसल अहमद आगे कहते हैं, "मैं लगभग आश्वस्त हूं कि दोनों नेताओं की अलग से मुलाक़ात होगी क्योंकि बहुत समय के बाद दोनों इस तरह के मंच पर आमने-सामने आएंगे. अगर मुलाक़ात न हो तो इससे बहुत ग़लत संदेश जाएगा. फिर वहां जाने की ज़रुरत ही क्या थी. अगर द्विपक्षीय बैठकें नहीं होती हैं तो इसे बहुत कामयाब सम्मेलन नहीं माना जाएगा."

भारत और चीन दोनों ने, अब तक इस सम्मेलन पर टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सिंगापुर स्थित चीनी मूल के राजनीतिक विश्लेषक सुन शी कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि दोनों लंबे समय तक कोविड के कारण आमने-सामने नहीं मिलने के बाद, एक-दूसरे से मिलने के लिए उत्सुक होंगे."

सुन शी के अनुसार यह मुलाक़ात का एक अनोखा मौक़ा है और अगर बैठक के दौरान कोविड संक्रमण का जोखिम नहीं है, तो वे मिलने की कोशिश करेंगे.

मोदी-पुतिन मुलाक़ात शुक्रवार को

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शिखर सम्मलेन में भाग ले रहे हैं. लेकिन ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि उनकी प्रधानमंत्री मोदी से अलग से मुलाक़ात होगी.

ईरान को पिछले सम्मेलन में एससीओ की सदस्यता मिलने पर रज़ामंदी हुई थी और इस बार इसके राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी भी सम्मेलन में शामिल हैं.

रूसी विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को एक प्रेस रिलीज़ में इस बात की पुष्टि की है कि राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच शुक्रवार को एक बैठक होगी जिसमें दोनों देशों के बीच व्यापार पर चर्चा होगी.

रूस के मुताबिक इस साल की पहली छमाही में "द्विपक्षीय व्यापार 11.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो साल-दर-साल लगभग 120 फीसदी की वृद्धि है".

भारत, जो शायद ही कभी रूसी तेल ख़रीदता था, अब वो चीन के बाद मॉस्को का दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक बन गया है. दोनों देश रूसी तेल और गैस के प्रमुख ख़रीदार हैं, जिसकी वजह से यूक्रेन में युद्ध के कारण मॉस्को को पश्चिमी प्रतिबंधों के असर से बचने में मदद मिलती है और दो एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को सस्ते दाम में तेल-गैस मिलने से फ़ायदा होता है. पश्चिम में आक्रोश के बावजूद, भारत और चीन, दोनों ने यूक्रेन में रूसी हमलों की सार्वजनिक रूप से आलोचना नहीं की है.

यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध अहम मुद्दा हो सकता है

पिछले साल ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में एससीओ शिखर सम्मेलन हुआ था जिसमें मुख्य रूप से अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से उभरती स्थिति और सदस्य राज्यों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए इसके परिणाम पर अधिक चर्चा हुई थी. यूक्रेन और रूस के बीच जारी भीषण युद्ध सबसे अहम मुद्दा बन सकता है. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध और ताइवान को लेकर चीन के रवैये से क्षेत्र में तनाव का माहौल है.

डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं "अगर आप यूक्रेन की बात करेंगे तो नेटो को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते".

उनके अनुसार एससीओ क्षेत्रीय सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए स्थापित किया गया था लेकिन अब तक नेटो की तरह कोई क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना की स्थापना नहीं हो सकी है. वो कहते हैं, "एससीओ के दो अहम सदस्य रूस और चीन नेटो से असुरक्षित महसूस करते हैं. पूरे इलाक़े में यानी पूरे एशिया में (नेटो के मुक़ाबले का) सुरक्षा संरचना स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए. आपको नेटो का जवाब तैयार करना होगा."

लेकिन सुन शी का तर्क ये है कि नेटो की तरह इस क्षेत्र में सुरक्षा संगठन मुमकिन नहीं, वो कहते हैं, "कड़वी सच्चाई यह है कि हमारा क्षेत्र नेटो के समान सुरक्षा ढांचा नहीं बना पाएगा क्योंकि हम मूल्यों और संस्कृतियों के मामले में बहुत विविध हैं और क्षेत्रीय सदस्यों के बीच अभी भी टकराव की स्थिति बनी हुई है."

अलेक्ज़ेंडर वोरोत्सोव, मॉस्को में रूसी विज्ञान अकादमी के ओरिएंटल स्टडीज संस्थान में पढ़ाते हैं. वो कहते हैं कि एससीओ शिखर सम्मेलन इस साल विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध और ताइवान और चीन के बयानों की वजह से अधिक ध्यान खींच रहा है.

अलेक्ज़ेंडर वोरोत्सोव कहते हैं, "दुनिया में एससीओ की शक्ति और महत्व इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि इसमें अधिक से अधिक देश शामिल होना चाहते हैं, इस साल वैश्विक स्थिति काफ़ी खराब हुई है, पूरी तरह से नई वैश्विक चुनौतियां सामने आई हैं जिनकी एससीओ के नेता अनदेखी नहीं कर सकते."

भारत को मिलेगी एससीओ की अध्यक्षता?

समरकंद सम्मेलन के बाद एससीओ की अध्यक्षता अगले एक साल के लिए भारत को मिलेगी इसलिए अगले साल का शिखर सम्मेलन भारत में होगा.

सुन शी के मुताबिक़, उन्हें उम्मीद है कि भारत की अध्यक्षता में चीन के साथ संबंधों में सुधार होंगे.

इस बीच जानकारों के अनुसार, समरकंद शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले देश बहुपक्षीय सहयोग की स्थिति का जायज़ा लेने वाले हैं, और वर्तमान चरण में एससीओ गतिविधियों को तेज करने के लिए प्राथमिकताओं और व्यावहारिक उपायों का निर्धारण करेंगे. वे एससीओ की भूमिका को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेंगे.

अलेक्जेंडर वोरोत्सोव कहते हैं कि एससीओ के निरंतर विस्तार पर काफ़ी ध्यान दिया जाएगा, इसके अभी आठ सदस्य हैं, अब ईरान को भी सदस्यता मिल गई है.

वे मिस्र, क़तर और सऊदी अरब की सदस्यता के आवेदन पर भी विचार करेंगे, इसके अलावा औपचारिक रूप से बेलारूस की सदस्यता पर काम शुरू करेंगे.

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