सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बाइडन की अगवानी में क्यों नहीं गए एयरपोर्ट

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन शुक्रवार शाम सऊदी अरब के दौरे पर पहुँचे. बतौर राष्ट्रपति ये उनका सऊदी अरब का पहला दौरा है.
जो बाइडन के सत्ता में आने के बाद से सऊदी अरब और अमेरिका के रिश्ते में काफ़ी तनाव की बात कही जा रही थी.
बाइडन के इस दौरे को सऊदी अरब के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इसके अलावा बाइडन चाहते हैं कि सऊदी अरब तेल का उत्पादन बढ़ाए और इस इलाक़े में इसराइल की स्वीकार्यता बढ़े.
बाइडन जब शुक्रवार की शाम जेद्दाह एयरपोर्ट पर पहुँचे तो उनके स्वागत में शाही परिवार से न तो किंग सलमान थे और न ही उनके बेटे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान.
क्राउन प्रिंस को अब सऊदी अरब का असली शासक माना जाता है. बाइडन के स्वागत में सऊदी अरब के मक्का प्रांत के गवर्नर ख़ालिद बिन फ़ैसल अल साऊद खड़े थे. इसके अलावा अमेरिका में सऊदी अरब की राजदूत राजकुमारी रीमा बिंत बांदर भी थीं.
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यूरोपियन काउंसिल के फॉरन रिलेशन रिसर्च की फेलो सिंज़िया बिअंको ने ट्वीट कर कहा है कि बाइडन की अगवानी में 'मक्का के गवर्नर का आना एक ख़राब संकेत' है. उन्होंने लिखा है कि बाइडन के स्वागत में सऊदी का यह अनमनापन ओबामा के दौरे की याद दिलाता है. ओबामा की भी अगवानी रियाद के तत्कालीन गवर्नर ने की थी.
लेकिन रियाद में किंग फ़ैसल सेंटर फॉर रिसर्च एंड इस्लामिक स्टडीज़ के सीनियर फेलो डॉ मार्क थम्पसन ने द इंडिपेंडेंट से कहा है, ''किस रैंक का अधिकारी राष्ट्रपति बाइडन का स्वागत कर रहा है, उससे इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है कि क्या बात होगी. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की अगवानी रियाद के डेप्युटी गवर्नर ने की थी और बाद में उनकी मुलाक़ात रॉयल पैलेस में सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से हुई थी.''

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मुलाक़ात से निकले संकेत...
हालाँकि अल-सलाम पैलेस के प्रवेश द्वार पर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान राष्ट्रपति बाइडन की अगवानी में खड़े थे. दोनों ने आपस में हल्की मुट्ठियां टकराईं लेकिन वो गर्मजोशी नहीं दिख रही थी. दोनों के चेहरे वैसी मुस्कान नहीं थी.
बाइडन के सऊदी अरब आने पर फीका स्वागत को दोनों देशों में तनाव की पुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है. इसके अलावा बाइडन के दौरे की तुलना मई 2017 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे से भी की जा रही है. ट्रंप के स्वागत में सऊदी अरब के किंग सलमान ख़ुद एयरपोर्ट पर खड़े थे.
राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी अरब को चुना था जबकि अमेरिका में बाक़ी राष्ट्रपति पारंपरिक रूप से पहले विदेशी दौरे में पड़ोसी देश कनाडा या मेक्सिको जाते थे. ट्रंप के स्वागत में वहाँ का पारंपरिक तलवार डांस भी हुआ और इसमें सऊदी अरब के किंग सलमान भी शामिल हुए थे.
ट्रंप को सऊदी अरब ने ऑर्डर ऑफ अब्दुल अज़ीज़ अल-साऊद मेडल भी दिया था.
जब सऊदी अरब ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर क़तर के ख़िलाफ़ नाकाबंदी लगाई थी तब शुरुआत में ट्रंप ने भी समर्थन किया था लेकिन बाद में उन्होंने क़तर के साथ तनाव ख़त्म करने के लिए भी काम किया था. ट्रंप ने सऊदी अरब में अरबों डॉलर के हथियार बेचने की मंज़ूरी दी थी जबकि अमेरिकी सांसद इस फ़ैसले का विरोध कर रहे थे.

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ट्रंप ने सऊदी अरब को हथियार देने पर लगे प्रतिबंधों को भी ख़त्म किया था जबकि यमन में सऊदी अरब के हमले के कारण आम लोग मारे जा रहे थे. पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के मामले में भी ट्रंप ने क्राउन प्रिंस का बचाव किया था.
ट्रंप का कहना था कि सऊदी अरब को हथियार बेचने से अमेरिका के लोगों को रोज़गार मिलता है और मानवाधिकारों के मुद्दे पर वह इसे ख़तरे में नहीं डाल सकते हैं. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जैरेड कशनर से भी नजदीकी रिश्ते थे.
दूसरी तरफ़ नवंबर 2019 में जब जो बाइडन डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से चुनाव अभियान में जुटे थे तब उन्होंने कहा था कि वह राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी अरब को हथियार नहीं बेचेंगे. बाइडन ने यह भी कहा था कि वॉशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के मामले में सऊदी अरब को क़ीमत चुकानी होगी.
बाइ़डन ने कहा था, ''मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हम सऊदी अरब को अब और हथियार नहीं देंगे. उन्हें जमाल ख़ाशोज्जी मामले में क़ीमत चुकानी होगी.'' बाइडन अमेरिका के आठवें राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने सऊदी अरब का दौरा किया है.

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बराक ओबामा राष्ट्रपति रहते चार बार सऊदी अरब गए थे. ओबामा पहली बार रियाद 2009 में गए थे. तब उन्हें राष्ट्रपति बने पाँच महीने से भी कम हुए थे. 2016 में जब ओबामा का कार्यकाल ख़त्म हुआ तब फिर ओबामा सऊदी अरब गए थे.
तब किंग अब्दुल्लाह के निधन के बाद किंग सलमान ने कमान संभाली थी. लेकिन ओबामा की अगवानी किंग सलमान ने नहीं की थी. उनकी अगवानी में रियाद के गवर्नर खड़े थे. ओबामा के इस दौरे को वहाँ के सरकारी टीवी पर भी नहीं दिखाया गया था.
चार-चार साल के दो कार्यकाल तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भी अपने आख़िरी सालों में 2008 में सऊदी अरब का दौरा किया था. उन्होंने तेल की बढ़ती क़ीमत और 2008 की आर्थिक मंदी के बाद सऊदी अरब का दौरा किया था. बुश के स्वागत में किंग अब्दुल्लाह एयरपोर्ट पर खड़े थे. किंग अब्दुल्लाह ने राष्ट्रपति बुश को किस करके स्वागत किया था. किस की यह तस्वीर काफ़ी चर्चित हुई थी.
जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बाइडन के दौरे को एक हालात में देखा जा रहा है. बुश भी तब चाहते थे कि सऊदी अरब तेल का उत्पादन बढ़ाए ताकि क़ीमतें कम हों और बाइडन भी सऊदी अरब से उत्पादन बढ़ाने के लिए कह रहे हैं.

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सऊदी अमेरिका संबंध
सऊदी में अमेरिका के राजदूत रहे चैसा फ़्रीमैन ने न्यूज़वीक से कहा है, ''मानवाधिकार और मूल्यों की अमेरिका-सऊदी संबंधों में कोई भूमिका नहीं रही है. शुरू से ही दोनों देशों के संबंध पारस्परिक हितों से संचालित होते रहे हैं.''
अमेरिका और सऊदी के रिश्तों की बुनियाद 1945 में वेलेंटाइन डे को रखी गई. इसी दिन अमरीकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलीन डी रूज़वेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक किंग अब्दुलअज़ीज़ इब्न साऊद की मुलाक़ात स्वेज़ नहर में अमेरिकी नेवी के जहाज में हुई थी.
इसी मुलाक़ात में किंग अब्दुलअज़ीज़ अमेरिका को सऊदी का तेल सस्ते में देने पर सहमत हुए थे. इसके बदले में रूज़वेल्ट ने किंग को सऊदी को बाहरी दुश्मनों से बचाने का संकल्प लिया था.
वेलेंटाइन डे को दोनों देशों के बीच पनपा यह 'इश्क़' छह इसराइली-अरब युद्ध झेल चुका है जबकि दोनों अलग-अलग खेमे में खड़े थे. 1973 के अरब तेल संकट में भी दोनों देशों के 'इश्क़' पर आंच नहीं आई.

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तेल के बदले सुरक्षा का समीकरण दोनों के बीच इस क़दर मज़बूत है कि उस पर 9/11 के हमलों का भी असर नहीं पड़ा जबकि विमान हाइजैक करने वाले ज़्यादातर लोग सऊदी अरब के नागरिक थे.
अमेरिका ने 2003 में इराक़ पर हमला किया तो सऊदी को पता था कि सद्दाम हुसैन की सत्ता ख़त्म होने से ईरान मज़बूत होगा, लेकिन उस दौर की आंच से भी दोनों के संबंधों में बिखराव नहीं आया.
1991 में फ़ारस की खाड़ी में युद्ध छिड़ा तो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने रूज़वेल्ट के समझौते का सम्मान करते हुए सऊदी अरब की इराक़ी सेना से रक्षा की थी.
1945 में रिश्तों की जो बुनियाद पड़ी वो बेशक़ मज़बूती से आगे बढ़ी, लेकिन सऊदी में संपूर्ण राजशाही और उसके सामाजिक-धार्मिक नियम, जैसे- अपराधियों के सिर कलम, पश्चिम के लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं. अमरीका कई बार इन चीज़ों के लेकर असहज हुआ है.
73 साल के संबंधों में ऐसे केवल दो मौक़े आए हैं जब अमेरिका और सऊदी अरब में तनाव की स्थिति बनी.

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जब रिश्तों में दिखा तनाव
ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन और 'किंग्स एंड प्रेसिडेंट्स: सऊदी अरबिया एंड द यूनाइटेड स्टेट्स सिंस एफ़डीआर' के लेखक राइडेल ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा था, ''1962 में राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी को तब के क्राउन प्रिंस फ़ैसल को दास प्रथा को ख़त्म करने के लिए मनाना पड़ा था. दूसरा मौक़ा तब आया जब 2015 में राष्ट्रपति बराक ओबामा को किंग सलमान को जेल में बंद राइफ़ बदावी को सार्वजनिक रूप से शारीरिक सज़ा देने से रोकने के लिए मनाना पड़ा था."
"बदावी को दस सालों की क़ैद और इस्लाम को अपमानित करने के मामले में एक हज़ार कोड़े मारने की सज़ा मिली थी. उन्हें ये सज़ा एक ब्लॉग लिखने के कारण मिली थी. 50 कोड़े बदावी को पहले ही लगाए जा चुके हैं.''
जिमी कार्टर को अमरीका का इस मामले में पहला राष्ट्रपति माना जाता है, जिन्होंने विदेश नीति में मानवाधिकार को शीर्ष पर रखा. 1977 से अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने दुनिया के देशों की मानवाधिकारों पर वार्षिक रिपोर्ट बनानी शुरू की थी. राइडेल का कहना है कि न तो कार्टर ने और न ही बाक़ी राष्ट्रपतियों ने कभी सऊदी पर इस तरह की रिपोर्ट बनाई.
क्राउन प्रिंस सलमान के आने के बाद से सऊदी में बड़ी संख्या में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महिलाओं और वक़ीलों को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया और राष्ट्रपति ट्रंप ने भी अपने पूर्ववर्तियों का ही रुख़ अख़्तियार किया. लेकिन बाइडन ने स्थिति बदलने की कोशिश पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है. बाइडन ने सत्ता में आने के बाद कहा था कि वह केवल अपने समकक्षों से ही बात करेंगे. लेकिन हालात बदले और ख़ुद बाइडन को ही क्राउन प्रिंस से मिलने सऊदी अरब जाना पड़ा.
कॉपी- रजनीश कुमार
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