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श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे सैन्य जेट से मालदीव भागे, आज देना था इस्तीफ़ा
- Author, एंड्रयू फ़िडेल फ़र्नांडो
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलंबो
श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे आर्थिक संकट को लेकर भारी विरोध-प्रदर्शन के बीच एक सैन्य जेट से देश छोड़कर भाग गए हैं.
बीबीसी का मानना है कि 73 साल के गोटाबाया राजपक्षे मालदीव की राजधानी माले में बुधवार को स्थानीय समय 03:00 बजे पहुँचे हैं.
राजपक्षे के भागने के साथ ही श्रीलंका में दशकों से चला आ रहा एक परिवार के शासन का अंत हो गया है. शनिवार को श्रीलंका के आम लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर धावा बोल दिया था और गोटाबाया राजपक्षे को छुपना पड़ा था.
गोटाबाया ने आज यानी 13 जुलाई को इस्तीफ़ा देने की घोषणा की थी.
बीबीसी को सूत्रों ने बताया है कि गोटाबाया राजपक्षे के भाई और पूर्व वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने भी देश छोड़ दिया है. बासिल के अमेरिका जाने की बात कही जा रही है.
राष्ट्रपति के देश से भागने की ख़बर आने के बाद गॉल फ़ेस ग्रीन में लोगों ने जश्न मनाया. गॉल श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में विरोध-प्रदर्शन का मुख्य ठिकाना है.
मंगलवार की शाम हज़ारों लोग गॉले पार्क में जमा हो गए थे और राष्ट्रपति के इस्तीफ़े का इंतज़ार कर रहे थे.
श्रीलंका के लोग राजपक्षे शासन को देश में आर्थिक तबाही का ज़िम्मेदार मानते हैं. श्रीलंका दशकों बाद सबसे भयावह आर्थिक संकट से जूझ रहा है. महीनों से श्रीलंका के लोग रोज़ाना बिजली कट, बुनियादी चीज़ों में तेल, खाने-पीने के सामान और दवाइयों की कमी से जूझ रहे हैं.
कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति गोटाबाया इस्तीफ़े से पहले देश छोड़ना चाहते थे ताकि नया प्रशासन उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सके. राष्ट्रपति रहते उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता था.
श्रीलंका से जुड़ी बुनियादी बातें
- दक्षिण भारत की तरफ़ श्रीलंका एक द्विपीय देश है: 1948 में श्रीलंका ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुआ था. यहाँ तीन नस्ली समूह हैं- सिंहला, तमिल और मुस्लिम. 2.2 करोड़ की आबादी वाले देश में ये तीनों समुदाय 99 फ़ीसदी हैं.
- सालों से एक एक ही परिवार के भाइयों का प्रभुत्व: तमिल अलगाववादी विद्रोहियों और सरकार के बीच सालों के ख़ूनी गृहयुद्ध का अंत 2009 में हुआ था. महिंदा राजपक्षे तब बहुसंख्यक सिंहला लोगों के बीच इस गृह युद्ध को ख़त्म कराने के मामले में नायक की तरह उभरे थे. उस दौरान महिंदा राजपक्षे के भाई गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका के रक्षामंत्री थी. अब राष्ट्रपति के तौर पर गोटाबाया को देश छोड़कर भागना पड़ा है.
- राष्ट्रपति की शक्तियां: श्रीलंका में राष्ट्रपति मुल्क, सरकार और सेना का मुखिया होता है लेकिन कई तरह की शक्तियां प्रधानमंत्री के साथ साझी होती हैं. प्रधानमंत्री संसद में सत्ताधारी पार्टी का मुखिया होता है.
- आर्थिक संकट के कारण सड़क पर लोग: खाने-पीने के सामान, दवाइयां और ईंधन की आपूर्ति न के बराबर है और महंगाई सातवें आसमान पर. आम आदमी ग़ुस्से में सरकार के ख़िलाफ़ सड़क पर है. श्रीलंका के लोग आर्थिक संकट के लिए राजपक्षे परिवार को ज़िम्मेदार मान रहे हैं.
राष्ट्रपति के भागने से श्रीलंका के शासन में किसी के ना होने का ख़तरा भी महसूस किया जा रहा है. श्रीलंका में एक ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो आर्थिक संकट का समाधान खोजे.
दूसरी पार्टियों के नेता एक मिलीजुली सरकार बनाने के लिए बात कर रहे हैं लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है. अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि नई सरकार को जनता स्वीकार करेगी या नहीं.
पीएम रनिल विक्रमसिंघे के हाथ में राष्ट्रपति के अधिकार
संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति के नहीं होने की भूमिका में उसकी शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे. प्रधानमंत्री को ही संसद में राष्ट्रपति के डेप्युटी के तौर पर देखा जाएगा.
हालाँकि श्रीलंका में विक्रमसिंघे भी काफ़ी अलोकप्रिय हैं. शनिवार को प्रदर्शनकारियों ने विक्रमसिंघे के निजी आवास में आग लगा दी थी. विक्रमसिंघे का परिवार घर में नहीं था.
विक्रमसिंघे ने कहा है कि वह एक मिलीजुली सरकार के लिए इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं. हालाँकि उन्होंने कोई तारीख़ नहीं बताई है.
श्रीलंका संकटः विशेष लेख
श्रीलंका में संविधान के विशेषज्ञों का कहना है कि संसद के अध्यक्ष अगला कार्यवाहक राष्ट्रपति हो सकते हैं. हालाँकि महिंदा यापा अबेयवार्देना राजपक्षे के एक सहयोगी हैं. अभी स्पष्ट नहीं है कि जनता इन्हें स्वीकार करेगी या नहीं.
कोई भी कार्यवाहक राष्ट्रपति बनता है तो 30 दिन के भीतर संसद के सदस्यों में से एक राष्ट्रपति का चुनाव करना होगा. इसमें जिसे भी चुना जाएगा वह राजपक्षे के 2024 के कार्यकाल तक राष्ट्रपति रहेगा.
सोमवार को मुख्य विपक्षी नेता साजिथ प्रेमदासा ने बीबीसी से कहा था वह राष्ट्रपति के लिए मैदान में आ सकते हैं. लेकिन उनके साथ भी जनता का समर्थन रहेगा या नहीं इस पर संदेह है.
श्रीलंका में नेताओं को लेकर आम लोगों में विश्वास की भारी कमी है. आम लोगों के आंदोलन ने श्रीलंका को बदलाव के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है लेकिन देश में नेतृत्व का कोई स्पष्ट दावेदार नहीं है.
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