श्रीलंका की बदहाली की वजह ऑर्गेनिक नीति की नाकामी? -दुनिया जहान

गोटाबाया राजपक्षे का पोस्टर थामे एक महिला

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ये साल 2019 के अगस्त का महीना था. श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव का प्रचार ज़ोरों पर था. श्रीलंका की राजनीति में ताक़तवर माने जाने वाले परिवार से जुड़े एक पूर्व सैन्य अधिकारी गोटाबाया राजपक्षे भी मैदान में थे.

तीन महीने बाद उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली. गोटाबाया राजपक्षे ने चुनाव के दौरान श्रीलंका के लिए जिस 'नए नज़रिए' का खाका पेश किया, उसमें खेती के लिए एक 'साहसिक नीति' शामिल थी.

इसके तहत 10 साल में खेती को पूरी तरह ऑर्गेनिक (रासायनिक खादों से मुक्त और जैविक खाद पर आधारित) बनाने की योजना थी. इस बेहद महत्वाकांक्षी योजना में कई खामियां भी थीं और इस नीति की नाकामी श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक संकट की एक बड़ी वजह मानी जा रही है.

लोगों की नाराज़गी और विरोध प्रदर्शनों के अटूट सिलसिले के बाद सरकार को इस पर 'यू टर्न' लेना पड़ा. ये नीति फेल क्यों हुई, इसे समझने के लिए बीबीसी ने चार विशेषज्ञों से बात की.

श्रीलंका का किसान

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हरित क्रांति

श्रीलंका की पेराडेनिया यूनिवर्सिटी में कृषि अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर जीविका वीराहेवा कहती हैं, " खेती बहुत अहम है. ख़ासकर तब जब श्रीलंका में रोज़गार की बात आती है."

गोटाबाया राजपक्षे जब राष्ट्रपति चुने गए तब कृषि से जुड़े उद्योग श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम थे.

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जीविका वीराहेवा बताती हैं, " हमारी कुल श्रम शक्ति के 25 प्रतिशत लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं. करीब 20 लाख लोग इस क्षेत्र में काम करते हैं. अगर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी देखें तो पाएंगे कि इसमें अकेले कृषि क्षेत्र का योगदान सात फ़ीसदी है. खाद्य पर आधारित उद्योग धंधों का योगदान छह प्रतिशत है. कुल मिलाकर ये एक बड़ा हिस्सा है."

श्रीलंका की घरेलू खाद्य ज़रूरत का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा देश के छोटे किसान उगाते हैं.

जीविका बताती हैं कि यहां धान की उपज प्रमुख है. श्रीलंका में चावल के अलावा सब्जियों, फलों, नारियल, मांस और अंडों का भी अच्छा उत्पादन होता रहा है.

वो बताती हैं कि 1960 के दशक में विकासशील देशों के लिए चलाए गए 'हरित क्रांति' अभियान के तहत श्रीलंका में उपज बढ़ाने के प्रयास शुरू हुए. इसमें उन्नत किस्मों को आजमाया गया. आधुनिक तकनीक इस्तेमाल की गई. पैदावार बढ़ाने के लिए बहुतायत में पोषक तत्व इस्तेमाल किए गए.

उस दौर को याद करते हुए जीविका कहती हैं, "हमें किसानों को ज़्यादा से ज़्यादा रासायनिक खाद प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना पड़ा. क्योंकि अगर हम पर्याप्त मात्रा में रासायनिक खादों का इस्तेमाल करते तभी हमें अच्छी फसल मिल सकती थी. ऐसे में हमने साल 1962 से किसानों को सब्सिडी देना शुरू किया."

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श्रीलंका में रासायनिक खाद का उत्पादन नहीं होता. 1960 के दशक से ही खाद बाहर से आयात की जाती है. छोटे किसानों पर बोझ न पड़े इसके लिए उन्हें 90 प्रतिशत तक सब्सिडी दी गई.

श्रीलंका चीनी, गेहूं और दूध का भी आयात करता है. ये देश चाय, नारियल और मसाले निर्यात कर अपने आयात बिल का भुगतान करता रहा है. श्रीलंका से होने वाले कुल निर्यात में खेती की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत थी. पर्यटन भी विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत था. साल 2020 की शुरुआत में कोरोना महामारी की वजह सैलानियों का आना अचानक रुक गया और श्रीलंका को बड़ा झटका लगा.

लगभग उसी वक़्त सप्लाई चेन बाधित होने से दुनिया भर में खाद की भी कमी हो गई.

श्रीलंका का किसान

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बीमारी का डर

रासायनिक खाद से जुड़ी एक और दिक्कत थी. हरित क्रांति के बाद पैदावार तो बढ़ी लेकिन बीमारियों के मामले भी सामने आने लगे.

'सीकेडीयू' यानी किडनी की गंभीर बीमारी के शुरूआती मामले 1990 के दशक में सामने आए. साल 2021 तक श्रीलंका 'सीकेडीयू' का हॉट स्पॉट बन गया.

जीविका बताती हैं, "कुछ लोगों ने आशंका जाहिर की कि किसान जो रासायनिक खाद इस्तेमाल करते हैं, वही इस बीमारी की वजह है. किसान जब खाद और कीटनाशक छिड़कते हैं तो सुरक्षा से जुड़े दिशा निर्देशों का पालन नहीं करते और सावधानी नहीं रखते. हालांकि ये सिर्फ़ अनुमान थे. इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सीकेडीयू की वजह रासायनिक खाद में मौजूद कैडमियम और आर्सेनिक है. हालांकि ऐसे दावे किए जाते रहे. ऐसे में खेती से जुड़े लोग बिना रासायनिक खाद के खेती करके देखना चाहते थे."

तब सरकार ने तय किया कि ये खेती में क्रांतिकारी बदलाव का समय है.

राजपक्षे भाई

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बड़ा सपना

श्रीलंका की पेराडेनिया यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिक बुद्धि मराम्बे बताते हैं, " ये करीब साल भर पहले की बात है. जब हमने टीवी पर राष्ट्रपति का एलान सुना कि वो कृत्रिम खाद और कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने जा रहे हैं."

मराम्बे कहते हैं कि जब लोगों से ये कहा जाता है कि खाने के सामान में ज़हरीले पदार्थ हैं जो उन्हें और उनके बच्चों को बीमार बना सकते हैं तो वो चिंतित हो जाते हैं.

राष्ट्रपति राजपक्षे ने बीते साल अप्रैल में घोषणा की कि नई नीति के जरिए वो स्वास्थ्य से जुड़ी इन चिंताओं का समाधान करेंगे.

सरकार ने रासायनिक खादों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी. देश के तमाम खेत सौ प्रतिशत ऑर्गेनिक यानी पूरी तरह जैविक खाद पर निर्भर होने जा रहे थे.

मराम्बे बताते हैं कि उस वक़्त इस नीति पर सवाल भी उठे लेकिन कुछ लोगों ने राष्ट्रपति के मन में बिठा दिया कि आगे बढ़ने का 'यही एक रास्ता है.'

बुद्धि मराम्बे कहते हैं, " इनमें मेडिकल एक्सपर्ट थे. कुछ कृषि वैज्ञानिक थे. निजी क्षेत्र के कई ऐसे लोग भी थे जो श्रीलंका में एक खास स्तर पर ऑर्गेनिक खेती कर रहे थे."

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ऑर्गेनिक उत्पादों की दुनिया में अच्छी मांग है. मराम्बे कहते हैं कि तब ये भी बताया गया कि श्रीलंका को काफी विदेशी मुद्रा हासिल हो सकती है लेकिन असल मुद्दा स्वास्थ्य था. श्रीलंका में चाय और सब्जी उगाने वाले किसान छोटे पैमाने पर कई साल से इस तरह की खेती कर रहे हैं.

मराम्बे कहते हैं कि इस बार बदलाव ये था कि पूरे देश को ही ऑर्गेनिक यानी जैविक खाद पर आश्रित कर दिया गया.

तब, श्रीलंका सरकार क्या रासायनिक खाद के आयात बिल को कम करना चाहती थी, इस सवाल पर बुद्धि मराम्बे कहते हैं, "जिस वक़्त ये फ़ैसला किया गया तब ये कारण सामने नहीं रखा गया. इस पर चर्चा तक नहीं हुई. एक वैज्ञानिक के तौर पर सोचें तो ये कारण हो भी सकता है. वो विदेशी मुद्रा के जिस संकट से जूझ रहे थे, उसे देखते हुए ये एक छुपी वजह हो सकती थी."

भूटान की महिला किसान

भूटान का प्रयोग

श्रीलंका ऐसा पहला देश नहीं है जिसने पूरी तरह ऑर्गेनिक होने की कोशिश की हो. साल 2014 में भूटान ने भी ऐसा एलान किया था.

मराम्बे बताते हैं कि भूटान ने लक्ष्य हासिल करने के लिए छह साल का वक़्त तय किया था. वो इसके लिए साल 2003 से तैयारी कर रहे थे लेकिन भूटान मुश्किल में घिर गया और उन्हें अपनी कुल ज़रूरत का 50 फ़ीसदी से ज़्यादा अनाज आयात करना पड़ा.

श्रीलंका में भी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे थे लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

बुद्धि मराम्बे बताते हैं, "जब फ़ैसला लिया गया, हम तभी से बताते रहे कि सरकार ने ग़लती कर दी है. मैंने और अलग-अलग विश्वविद्यालयों के दूसरे कृषि वैज्ञानिकों ने महामहिम को पत्र लिखे. उनसे सिर्फ़ आधे घंटे का समय मांगा ताकि हम इस पर चर्चा कर सकें लेकिन दुर्भाग्य से हमारी बात नहीं सुनी गई."

तब पूरी दुनिया कोविड महामारी से जूझ रही थी. पर्यटकों के नहीं आने से श्रीलंका की आर्थिक स्थिति चरमरा रही थी. इस बीच ऑर्गेनिक क्रांति ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया.

श्रीलंका

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मुसीबत का पहाड़

रासायनिक खाद पर पाबंदी के फ़ैसले को लेकर कैलिफ़ोर्निया स्थित ब्रेकथ्रू इंस्टीट्यूट की खाद्य और कृषि विश्लेषक सलोनी शाह कहती हैं, "इस एलान ने किसानों को हैरान कर दिया. देश के बाकी लोगों को भी हैरत में डाल दिया."

वो बताती हैं कि ऑर्गेनिक खेती से जुड़ा प्लान बीते साल अप्रैल में लागू हुआ और दिक्कतें तभी से सामने आने लगीं.

सलोनी बताती हैं कि देश के पास ज़रूरत के मुताबिक जैविक खाद पैदा करने की क्षमता नहीं थी.

दुनिया में ऑर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती मांग के जरिए पैसे बनाने की उम्मीद भी बढ़ाचढ़ा कर लगा ली गईं . तय मानक बनाए रखने के लिए ऑर्गेनिक उत्पाद की समय समय पर जांच ज़रूरी है लेकिन वहां ऐसी व्यवस्था नहीं थी.

सलोनी शाह बताती हैं, "वहां कोई ऐसा नियामक ढांचा नहीं था, जहां किसानों को सलाह मिल सके कि उन्हें किस तरह की ऑर्गेनिक खाद इस्तेमाल करनी चाहिए. कौन सी खाद सुरक्षित हैं. क्या और कैसे किया जाना चाहिए इसे लेकर किसानों को समुचित सहायता और सलाह भी नहीं दी गई."

सब्जियां

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बढ़ने लगी दिक्कतें

जल्दी ही साफ़ हो गया कि किसानों की उपज घट रही है. उनके रोज़गार और आमदनी पर भी संकट छा गया.

सलोनी बताती हैं, "श्रीलंका में चावल की दो फसल होती हैं. पहला येलो सीजन मई से सितंबर तक होता है. चावल की फसल के लिहाज से जो प्रमुख सीजन है उसकी शुरुआत सितंबर में होती है और ये मार्च में खत्म होता है. चावल की मुख्य फसल के दौरान पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं थी. पूरी दुनिया में खाद की कीमतें भी बढ़ रही थीं. श्रीलंका के किसानों पर इसका असर हुआ. उन्हें अब खाद पर सब्सिडी भी नहीं मिल रही थी. ऐसे में फसल को 40 प्रतिशत नुक़सान का अनुमान लगाया गया. इसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर भी हुआ."

लागू होने के कुछ ही महीनों में ही ऑर्गेनिक प्लान फेल होने लगा और लोग गुस्से में उबलने लगे.

श्रीलंका के नागरिक

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सलोनी शाह बताती हैं कि खाने के सामने की कमी होने लगी. दाम बढ़ने लगे और इस नीति के ख़िलाफ़ देश भर में प्रदर्शन होने लगे. देश में खाद्य संकट खड़ा हो गया.

स्थिति संभालने के लिए श्रीलंका सरकार को भारत और म्यांमार से 40 लाख मीट्रिक टन चावल मंगाना पड़ा.

ऑर्गेनिक नीति की नाकामी उजागर हो चुकी थी लेकिन फिर भी बीते साल नवंबर में राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने ग्लासगो के COP 26 सम्मेलन में ऑर्गेनिक खेती को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.

लेकिन कुछ ही हफ़्ते बाद उनकी सरकार 'यू टर्न' यानी अपना फ़ैसला पलटने पर मजबूर हो गई.

सलोनी बताती हैं, "वो ये करने पर मजबूर हो गए. उन्होंने इसका कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया. नवंबर के आखिर में सरकार ने प्रतिबंध पर आंशिक छूट दे दी और रासायनिक खाद आयात करने की अनुमति दी. ये छूट चाय, रबर और नारियल जैसी निर्यात होने वाली अहम फसलों के लिए थी. ये फसल विदेशी मुद्रा के लिए अहम हैं. इसके जरिए देश को करीब 1.3 अरब डॉलर की रकम मिलती है."

लेकिन ये फ़ैसला होने तक श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को बड़ी चोट लग चुकी थी.

श्रीलंका के सुरक्षा बल

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संकट में श्रीलंका

श्रीलंका की जाफ़ना यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर अहिलान कादिरगमार कहते हैं, " ये इंसान की पैदा की गई त्रासदी है. इससे बाहर आने में बरसों का वक़्त लग सकता है. रासायनिक खाद इस्तेमाल करने वाले किसान अब खेती तक छोड़ने की बात सोच रहे हैं."

ऑर्गेनिक खेती का फ़ैसला फेल होने से श्रीलंका का वित्तीय संकट बढ़ गया.

डॉक्टर अहिलान कहते हैं कि ये झटका महामारी के दौरान लगा. तब दूसरे सेक्टर भी प्रभावित थे और खाद्य सुरक्षा हासिल करने का वैकल्पिक उपाय भी जाता रहा.

इसी दौरान श्रीलंका का केंद्रीय बैंक 51 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज को चुकाने में नाकाम रहा. श्रीलंका में ज़रूरी सामान की भी भारी कमी होने लगी.

डॉक्टर अहिलान बताते हैं, "यूक्रेन युद्ध की वजह से जरूरत के सामान की कीमतें तेज़ी से ऊपर चली गईं. खाने का सामान भी लोगों तक नहीं पहुंच सका. सप्लाई के पूरे ढांचे पर दबाव बढ़ गया. खाद पर लगाए प्रतिबंध ने कृषि सामान की सप्लाई चेन को चरमरा दिया."

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ईंधन आयात की क्षमता प्रभावित होने से श्रीलंका में घंटों बिजली कटौती होने लगी.

डॉक्टर अहिलान बताते हैं कि 1930 के दशक के अकाल और मंदी के बाद से श्रीलंका ने संकट का ऐसा दौर कभी नहीं देखा था.

वो बताते हैं, "श्रीलंका ने भारत और चीन से मदद मांगी. भारत ने तेल, ख़ासकर डीजल और पेट्रोल खरीदने के लिए 50 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन दी. सब्जी, चावल और दवाओं जैसे ज़रूरी सामान खरीदने के लिए एक अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन दी. इसके ज़रिए श्रीलंका का एक या दो महीने का काम निकल सकता है. लेकिन लंबे वक़्त के लिए समस्या का समाधान नहीं हो पाएगा. ये कर्ज हमारे बोझ को ही बढ़ाएंगे."

हिंसा के बाद की तस्वीरे

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चिंता और चुनौती

श्रीलंका में रासायनिक खाद पर लगी पाबंदी भले ही हटा ली गई लेकिन स्थिति गंभीर बनी हुई है. डॉक्टर अहिलान कहते हैं कि लोगों का भरोसा खो गया है. ऑर्गेनिक खेती बदनाम हो गई है.

भारी आर्थिक संकट के बीच लोगों के बढ़ते गुस्से का असर लगातार दिखा. पहले मंत्रियों और फिर प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को इस्तीफ़ा देना पड़ा और उनकी जगह रनिल विक्रमसिंघे छठी बार प्रधानमंत्री बने.

सरकार ने पाबंदी से प्रभावित हुए दस लाख ज़्यादा किसानों के लिए 20 करोड़ डॉलर के पैकेज का एलान किया है.

डॉक्टर अहिलान के मुताबिक किसान बताते हैं कि उनके नुक़सान की भरपाई मुश्किल है.

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ऑर्गेनिक नीति के प्रयोग को लेकर भी डॉक्टर अहिलान कहते हैं, "खेती के कई विशेषज्ञों को लगता था कि शायद हम रासायनिक खादों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. हमें इसकी मात्रा घटानी चाहिए. मै कॉपरेटिव के साथ काम करता हूं और करीब चार साल पहले हमने ऑर्गेनिक खाद के तीन प्लांट बनाए. उस समय विचार ये था कि हम बहुत धीरे धीरे रासायनिक खाद की मात्रा घटाएंगे. किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि अचानक पाबंदी लगा दी जाएगी. ये धीरे धीरे कई दशकों के दौरान किया जाना चाहिए था. इसे रातों रात बंद करना बड़े संकट की वजह था."

विशेषज्ञों की राय है कि कुछ आर्थिक दिक्कतें श्रीलंका के काबू के बाहर हैं. मसलन जिन चीजों को बाहर से आयात किया जाता है, उनकी कीमतें नए रिकॉर्ड बना रही हैं. लेकिन रासायनिक खादों पर पाबंदी देश के लिए आत्मघाती गोल जैसी थी.

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ये नीति लागू करते वक्त मूलभूत बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

प्राकृतिक खादों की कमी थी. किसानों को भी तैयारी के लिए कम समय दिया गया.

उपज कम होने पर भरपाई कैसे होगी, इसकी कोई योजना तैयार नहीं की गई. ये दूरदर्शी नीति नहीं थी और श्रीलंका में इसके नतीजे लंबे वक़्त तक दिखते रहेंगे.

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