यूक्रेन पर रूसी हमले में क्या है चीन के ख़ुश होने की वजह?

    • Author, फ़र्नांडा पॉल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

यूक्रेन पर रूस का हमला हर रोज़ और उग्र होता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर हमले की निंदा के बावजूद युद्ध थमता नहीं दिख रहा है.

बीते एक महीने से अधिक समय हो चुका है और रूस का हमला जारी है. रूसी सैनिकों ने यूक्रेन के कई शहरों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है. लाखों की संख्या में लोग यूक्रेन से पलायन कर चुके हैं और कई लोग अभी भी यूक्रेन में फंसे हुए हैं.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अभी तक का यह सबसे भयावह युद्ध है. जिसके समाप्त होने तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई व्यापक बदलाव हो जाएंगे.

इस युद्ध की परिणिति क्या होगी और इसका अंत कैसे होगा...ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब फिलहाल अभी किसी के भी पास नहीं है.

सवाल ये भी है कि इस युद्ध के शुरू होने से पहले क्या किसी को भी यह उम्मीद थी कि रूस इस तरह, इस तैयारी के साथ युद्ध छेड़ देगा?

सवाल ये भी हैं कि क्या जिस तरह अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने रूस और पुतिन पर प्रतिबंध लगाए हैं, वे उनसे पार पा लेंगे?

और अंत में सबसे अहम सवाल यह कि क्या दुनिया को अभी भी शांति वार्ता के सफल होने की उम्मीद करनी चाहिए? या ये उम्मीद करनी चाहिए कि शांति वार्ता से हल निकल सकेगा?

बीबीसी मुंडो को दिए एक इंटरव्यू में ब्रिटिश अकादमिक और यूक्रेन की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा मामलों के जानकार तरास कुज़ियो ने इस युद्ध और इसके परिणामों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दिये हैं.

यूक्रेन पर रूस के हमले के महज़ कुछ सप्ताह पहले ही उन्होंने एक किताब प्रकाशित की थी- 'रशियन नेशनलिज़्म एंड द रूसो-यूक्रेनियन वॉर' इस किताब में उन्होंने इन दोनों देशों के बीच के तनाव को बेहद गहराई से बयां किया है और साथ ही कीएव को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के जुनून का भी वर्णन किया है.

यूक्रेन पर रूस का हमला आपके लिए कितने आश्चर्य की बात थी?

यूक्रेन को लेकर पुतिन का एक अलग ही किस्म का जुनून रहा है. साल 2012 में वो इस भरोसे के साथ राष्ट्रपति बने कि इतिहास उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर याद करेगा जिसने यूक्रेन और बेलारूस तक रूस के भूभाग दायरा बढ़ाया.

पुतिन लंबे वक़्त से ये तर्क देते रहे हैं कि लेनिन ने दक्षिणी और पूर्वी यूक्रेन को सोवियत यूक्रेन में ग़लत तरीके से शुमार किया था. वो इसके लिए एक हद तक लेनिन की आलोचना भी करते हैं.

तो क्या यही वजह है कि रूस के राष्ट्रपति ने यूक्रेन पर हमला कर दिया?

यूक्रेन पर रूस का हमला रूसी राष्ट्रवादी और यूक्रेन को नकारने की सोच रखने वाली मानसिकता का परिणाम है.

पुतिन जब यूक्रेन के बारे में बात करते हैं तो वो उस पहचान के बारे में बात करते हैं जो पिछले 30 सालों में उभरी है, जो पश्चिमी समर्थक है. वह इस पहचान को बेलारूस की ही तर्ज़ पर बदलना चाहते हैं. एक ऐसे देश के रूप में जो रूस के प्रभाव में हो.

आपको क्या लगता है, क्या यूक्रेन पर हमला करके पुतिन ने ग़लती की है?

मुझे लगता है कि पुतिन के क़दम से रूस की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है. रूस पर जिस तरह से अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए हैं वे अपने आप में बेहद सख़्त हैं. रूस खुद भी शायद ही ऐसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा कर रहा हो. जैसे कि मुझे लगता है कि उसने जर्मनी को लेकर प्रतिबंधों के लिहाज़ से ऐसी उम्मीद कभी नहीं की होगी.

हालांकि जिस तरह के और जितने प्रतिबंध रूस पर लगाए गए हैं, उनका मौजूदा समय में असर देखेंगे तो शायद वे उतने परिलक्षित ना हों लेकिन आने वाले समय में उनका असर निश्चित तौर पर दिखाई देगा.

अब आगे क्या हो सकता है?

सबसे व्यापक और कठोर असर तो यही है कि रूस अलग-थलग पड़ गया है. दुनिया के ज़्यादातर देशों ने उसके ख़िलाफ़ खुलकर आलोचना की है. इसका एक नतीजा यह भी हो सकता है कि बतौर विश्व की एक बड़ी ताक़त माने जाने वाले रूस के प्रभाव में तेज़ी से गिरावट आए. और इसका एक दूसरा असर यह हो कि पश्चिमी देशों के विरूद्ध विकल्प के तौर पर चीन उभरकर सामने आए.

रूस के इस हमले के कारण उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को काफी नुकसान हुआ है. अब बहुत से देश रूस के किसी भी तरह का कोई सरोकार नहीं रखना चाहते हैं. ज़्यादातर देश ना तो रूस के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं और ना ही व्यापार. क़रीब 400 कंपनियां रूस छोड़कर जा चुकी हैं.

इसका सीधा फ़ायदा चीन को मिलेगा और वह पश्चिमी देशों के विरूद्ध एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभरकर सामने आएगा.

लेकिन इस युद्ध के लिहाज़ से चीन की भूमिका पर आपका क्या कहना है?

अगर आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा कि चीन इससे बहुत खुश है. रूस के पतन का मतलब, चीन का उत्थान. ये दोनों ही देश अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ एक स्थिति में हैं लेकिन अंतर यह है कि चीन एक उभरती हुई शक्ति के तौर पर सामने है और रूस एक ऐसी ताक़त के रूप में जिसका पतन हो रहा है.

इसके अलावा इस बात से इनक़ार नहीं करना चाहिए और ना ही इस बात को अनदेखा किया जाना चाहिए कि चीन के पास वाकई में एक बहुत ताक़तवर सेना है. रूस के पास नहीं.

रूस को एक महान सैन्य ताक़त के रूप में माना जाता था लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बीते एक महीने से अधिक समय से जारी युद्ध में अभी तक रूस की सेना यूक्रेन को हरा नहीं पायी है.

ऐसे में मुझे लगता है कि अंत में इस युद्ध के परिणामस्वरूप चीन एक प्रमुख पश्चिम विरोधी ताक़त के रूप में भरकर सामने आएगा और आने वाले समय रूस का पतन होते देखा जा सकेगा.

लेकिन फिर चीन रूस पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रहा है?

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ चीन ही एकमात्र वो देश है जिसने प्रतिबंध नहीं लगाए हैं. इसराइल और तुर्की ने भी रूस पर प्रतिबंध नहीं लगाए हैं. चीन इसके लिए हमेशा अमेरिका और नेटो को ज़िम्मेदार ठहराता रहेगा क्योंकि चीन हमेशा अमेरिका और नेटो विरोधी रहा है.

तीन साल पहले, पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ रूस और चीन का संयुक्त गठबंधन था. और अब इस युद्ध से यह साफ़ हो गया है कि रूस चीन का जूनियर पार्टनर है.

हालांकि इस दौरान पुतिन ने जो कुछ भी सोचकर क़दम उठाया, वो सब ग़लत साबित हुए. उन्हें उम्मीद रही होगी कि चीन उनकी मदद करेगा लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा होगा.

आपको क्या लगता है कि जिस तरह चीज़ें आगे बढ़ रही हैं या अब तक जो कुछ हुआ है, से पुतिन हताश होंगे?

बिल्कुल.

पुतिन ने जैसा सोचा कि यह बेहद आसान होगा, वैसा नहीं हुआ. उन्हें उम्मीद थी कि महज़ दो दिनों में वो यूक्रेन पर कब्ज़ा कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

पुतिन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को कभी भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि राष्ट्रपति बनने से पहले वह कॉमेडियन थे. वह असल तौर पर राजनीतिज्ञ नहीं थे. उन्हें शायद यह भरोसा था कि हमला शुरू होने के साथ ही ज़ेलेंस्की कीएव छोड़कर भाग जाएंगे और वे एक 'यूक्रेनी लुकाशेंको' को सत्ता पर काबिज़ कर देंगे. लेकिन उनकी योजना बुरी तरह से विफ़ल हो गयी.

शांति वार्ता को लेकर कितनी उम्मीद रखनी चाहिए?

हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वे झूठे हैं. हम उनकी किसी भी बात पर आंख मूंदकर यक़ीन नहीं कर सकते हैं. यूक्रेन में रूसी सेना को लेकर बीते आठ सालों से वे सिर्फ़ झूठ ही बोल रहे हैं.

दूसरा यह कि पश्चिमी देश प्रतिबंध हटाने के लिए केवल तभी सहमत हो सकते हैं जब यूक्रेन शांति समझौते के लिए सहमत हो.

और एक बड़ी मांग यह भी है कि रूस अपने सैनिकों को आक्रमण से पहले की स्थिति में वापस बुलाए और मुझे लगता है कि पुतिन के लिए यह मानना एक बहुत बड़ा मसला होगा. मुझे लगता है कि हर रोज़ मारे जा रहे निर्दोष यूक्रेनी नागरिकों को देखते हुए ज़ेलेंस्की शांति समझौते को लेकर गंभीर हैं लेकिन रूस की नीयत अब सामने आ चुकी है और कोई भी उसे लेकर अब अनाड़ी नहीं रहा. यह एक बड़ी बात है.

आपको क्या लगता है, युद्ध कैसे समाप्त होगा?

ज़ेलेंस्की कोई सिरफ़िरे राष्ट्रवादी नहीं हैं. वह एक ऐसे शख़्स हैं जो हमेशा समझौते के लिए तैयार रहे हैं. लेकिन रूस ने हमेशा यूक्रेन से घुटने टेकने की मांग रखी है ना की समझौते की बात कही है. लेकिन युद्ध की मौजूदा स्थिति के संदर्भ में ऐसा हो सकता है कि रूस कुछ समझौतों के लिए तैयार हो जाए.

लेकिन जैसी परिस्थतियां अभी हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि रूस के पास अब ज़्यादा समय नहीं है. जैसे-जैसे समय बीतेगा रूस की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होना शुरू हो जाएगी. सैन्य उपकरणों की उपलब्धता में कमी और सैनिकों की हर रोज़ होती मौत भी रूस के पतन को दिखाएगी.

बीतते समय के साथ पुतिन की स्थिति भी कमज़ोर होती जाएगी. इस आक्रमण से पहले तक मुझे भरोसा था कि पुतिन जीवन भर राष्ट्रपति रहेंगे लेकिन अब मैं ऐसा नहीं सोचता.

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