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इमरान ख़ान और विपक्ष के बीच छिड़ी जंग में पाकिस्तानी सेना किसके साथ
- Author, हारून रशीद
- पदनाम, मैनेजिंग एडिटर, इंडिपेंडेंट उर्दू (इस्लामाबाद)
पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के तीन हफ़्ते बाद भी हर किसी के मन में यही सवाल चल रहा है कि आख़िर इस अहम राजनीतिक मुक़ाबले में सबसे ज़्यादा ताक़तवर सेना कहां खड़ा है?
देश के इतिहास में पहली बार ऐसा लग रहा है कि सेना तटस्थ है. उनकी तरफ़ से बहुत ही सावधानी से काम लिया जा रहा है. पिछले तीन हफ़्ते से चल रहे इस सियासी घमासान पर उनकी तरफ़ से न कोई संकेत मिला और न ही कोई बयान आया है.
10 मार्च को पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार की तरफ़ से एकमात्र और बहुत ही संतुलित बयान आया, जिसमें उन्होंने बस इतना कहा कि उनकी संस्था तटस्थ है और उसे राजनीति में नहीं घसीटा जाना चाहिए.
लेकिन यह बात शायद इतनी सरल और सादा नहीं है. इस साल की शुरुआत में, इमरान ख़ान की सरकार ने विपक्षी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की डील के बारे में दावा किया था, जिसने पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में अटकलों का एक नया दौर शुरू कर दिया था.
राजनीतिक मामलों के लिए प्रधानमंत्री के विशेष सहायक शाहबाज़ गिल ने दावा किया कि विपक्ष के नेता शाहबाज़ शरीफ़ चार लोगों के बारे में डील कर रहे हैं. और जिन चार लोगों की डील की गई थी, उनमें शाहबाज़ शरीफ़, उनके बेटे हमज़ा शाहबाज़, नवाज़ शरीफ़ और उनकी बेटी मरियम नवाज़ शामिल हैं.
5 जनवरी 2022 को इन अटकलों के बारे में सवाल किये जाने पर, पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जवाब दिया, ''किसी के साथ कोई डील नहीं की जा रही है. जो ये दावा कर रहा है उससे स्पष्टीकरण माँगा जाना चाहिए कि कौन किसके साथ डील कर रहा है और इसके पीछे क्या मक़सद हैं.''
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने भी इन अफ़वाहों का खंडन किया, लेकिन ज़ाहिर तौर पर इसके बाद से ही इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ सियासी हवा चलने लगी.
इमरान के ख़िलाफ़ विपक्ष हुआ एकजुट
विपक्ष, जो पिछले कई वर्षों से अविश्वास प्रस्ताव के लिए एकजुट नहीं हो पा रहा था, अचानक एकजुट हो गया. अपने पिता की तरह एंटी स्टेब्लिशमेंट समझी जाने वाली मरियम नवाज़ ने इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ आंदोलन में दूसरा स्थान ले लिया और ज़्यादा संतुलित समझे जाने वाले शाहबाज़ शरीफ़ फ़्रंट पर आ गए.
अन्य विपक्षी दल, जैसे पकिस्तान पीपुल्स पार्टी, जो अलग ही लाइन लेकर चल रही थी, एक प्लेटफॉर्म पर आ गई. मौलाना फ़ज़लुर रहमान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम तो शुरू से ही इमरान ख़ान को जाते हुए देखना चाह रही थी.
लेकिन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिए उनके अपने तीन मुख्य और सबसे बड़े सहयोगी चौधरी शुजात हुसैन की पीएमएल-क्यू, कराची की मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) और बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) का सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी ज़ाहिर करना सबसे ख़तरनाक पहलू साबित हुआ. इन तीनों सहयोगियों ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वे संसद में इमरान ख़ान का समर्थन करेंगे या नहीं.
थोड़ा और पीछे जाएं, तो सेना के साथ पहला प्रत्यक्ष और सार्वजनिक मतभेद पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में आईएसआई के प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सामने आया था. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान तत्कालीन चीफ़ लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद को कुछ और अधिक समय के लिए रखना चाहते थे, लेकिन सेना के इरादे कुछ और थे. इस विवाद पर दोनों पक्ष अपनी-अपनी पोज़िशन पर अड़ गए.
सार्वजनिक स्तर पर यह दिखाने की कोशिश की गई कि सब कुछ ठीक है, लेकिन ज़ाहिरी तौर पर ऐसा नहीं था. उस समय तो जो हुआ सो हुआ, अब अगले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री को नए सेनाध्यक्ष को नियुक्त करने का इससे भी ज़्यादा संवेदनशील और अहम फ़ैसला लेना है.
जल्द होनी है नए सेना प्रमुख की नियुक्ति
कहा जाता है कि सेना में जनरल फ़ैज़ के लिए फ़ैसलाबाद धरने में पैसे बाँटने और काबुल में कॉफ़ी पीते हुए तस्वीरों से बेहतर कुछ नहीं है. अगर वह नए सेना प्रमुख की नियुक्ति की दौड़ में हैं, तो इमरान ख़ान का उनके प्रति झुकाव उनके लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है.
फिर लाहौर की एक यूनिवर्सिटी में सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा और छात्रों के बीच हुई बातचीत से भी सरकार और सेना के संबंधों पर कुछ प्रकाश पड़ा. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जनरल बाजवा ने वहां के छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए कहा, ''जो लोग यह सोचते हैं कि फ़ैसले मेरी मर्जी से होते हैं, वे इमरान ख़ान को नहीं जानते.''
इमरान ख़ान ने आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति के वक़्त कहा था कि इस पद पर नियुक्ति करने का अधिकार उनका है. यह तो एक मतभेद था, जो सामने आया. इसके अलावा बहुत ही अहम मामले जैसे कि यूक्रेन युद्ध के मामले में तटस्थ रहने के निर्णय पर सेना की राय क्या है, यह स्पष्ट नहीं है.
इमरान ख़ान की सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई बयान सामने नहीं आया है, लेकिन समर्थन में भी कुछ नहीं कहा गया है.
लेकिन ये सब संकेत हैं, ठोस सबूत नहीं. पाकिस्तान में ऐसी स्थिति में पुष्टि की कोई परंपरा नहीं है.
सेना की तटस्थता बढ़ा रही बेचैनी
सेना का तटस्थ रहना सरकार को किसी भी तरह सूट नहीं करता है. इसलिए इमरान ख़ान कह चुके हैं कि न्यूट्रल सिर्फ़ जानवर हो सकते हैं, जबकि उनके प्रवक्ता फ़वाद चौधरी का कहना है कि संविधान के मुताबिक़ सेना सरकार के साथ होती है. प्रधानमंत्री ने बाद में स्पष्ट किया कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था.
इसके बाद, इमरान ख़ान ने एक जनसभा में अपने समर्थकों से खुले तौर पर कहा था, कि उन्हें जनरल बाजवा ने मौलाना फ़ज़लुर रहमान के लिए 'डीज़ल' शब्द का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है. लेकिन वो अभी भी लगातार मौलाना के लिए डीज़ल शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं.
सेना के साथ इमरान ख़ान के संबंध जैसे भी हों, कई जगहों पर उनकी सरकार का ख़राब प्रदर्शन निश्चित रूप से उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है. न तो हर समय चोर और डाकुओं के रूप में प्रचारित किए गए राजनेताओं में से किसी को सज़ा हुई और अर्थव्यवस्था भी कुछ तो अनाड़ीपन और कुछ दुनिया में बढ़ती महंगाई की वजह से बेहतर होने का नाम नहीं ले रही है.
हालांकि कई पर्यवेक्षक इमरान ख़ान के राजनीतिक सहयोगियों की नाराज़गी को किसी और से नाख़ुश होना बता रहे हैं. एमक्यूएम तो शायद इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ वोटिंग में हिस्सा न ले. ये पार्टी इस फ़ैसले पर गंभीरता से विचार कर रही है.
नंबर गेम में इसका फ़ायदा प्रधानमंत्री को मिल सकता है. पीएमएल-क्यू और बीएपी पर आरोप है कि उन्हें स्टेब्लिशमेंट का समर्थन प्राप्त है. इसलिए उनका फ़ैसला इमरान ख़ान को बचा या डुबा सकता है.
नेशनल असेंबली सोमवार को शाम 4 बजे के सत्र में अविश्वास प्रस्ताव पर विचार-विमर्श शुरू करेगी. इस पर बहस और मतदान में तीन से सात दिन का समय लग सकता है.
गृह मंत्री शेख़ रशीद का मानना है कि 4 अप्रैल तक मामला निपट जाएगा. उस वक्त पीएमएल-क्यू और बीएपी की वोटिंग के फ़ैसले से साफ हो जाएगा, कि क्या स्टेब्लिशमेंट सरकार से सिर्फ़ नाराज़ है या इमरान ख़ान से जान छुड़ाने की कोशिश कर रहा है.
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