पुतिन का भारत दौरा: पीएम नरेंद्र मोदी से किन अहम मुद्दों पर हो सकती है चर्चा :विश्लेषण

    • Author, उपासना भट्ट
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

भारत और रूस पारंपरिक रूप से सहयोगी रहे हैं और अब माना जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों के रिश्ते और मज़बूत हो सकते हैं.

हालिया दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के हालात को लेकर भारत और रूस के रिश्तों में दरार पड़ती दिखी थी.

रूस अमेरिका के साथ भारत के नज़दीकी संबंधों को लेकर भी असहज है. इसके साथ ही रूस भारत-चीन सीमा पर तनाव से भी चिंतित है क्योंकि चीन रूस का रणनीतिक साझेदार है.

वहीं, लंबे वक्त से भारत अपनी सैन्य ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर रहा है.

पुतिन 6 दिसंबर को भारत दौरे पर पहुंच रहे हैं.

कोविड महामारी की शुरुआत के बाद से राष्ट्रपति पुतिन की ये दूसरी विदेशी यात्रा है. उम्मीद जताई जा रही है कि इससे दोनों देशों के बीच रिश्तों में मजबूती आएगी.

इस दौरे में दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौते भी होने वाले हैं. इससे ना सिर्फ़ भारत की सुरक्षा क्षमताएं बढ़ेंगी बल्कि दोनों देशों के रिश्तों में भी गर्मजोशी आएगी.

द्विपक्षीय रिश्ते

बीते साल भारत और रूस के बीच होने वाली सालाना वार्ता को कोविड-19 महामारी की वजह से टाल दिया गया था.

ऐसे में पुतिन के भारत आने के फ़ैसले को दोनों देशों के बीच रिश्ते मज़बूत होने के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन बात इससे कहीं ज़्यादा है.

विश्लेषक नंदन उन्नीकृष्णनन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित एक लेख में कहा, "ये इस साल रूस के बाहर पुतिन की दूसरी यात्रा है. अपनी पहली यात्रा पर जून में वो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिलने जेनेवा गए थे. महामारी की वजह से पुतिन जी-20 सम्मेलन में नहीं गए और न ही ग्लासगो में हुए जलवायु सम्मेलन में ही शामिल हुए. उन्होंने चीन का अपना दौरा भी इस कारण टाल दिया.

इससे ज़ाहिर है कि पुतिन ये दिखा रहे हैं कि उनकी यात्रा सिर्फ़ भारत के साथ ख़ास रणनीतिक रिश्ते को मज़बूत करने के लिए नहीं है बल्कि दोनों देशों के बीच रिश्ते और भी गहरे हो रहे हैं. अमेरिका के साथ भारत की नज़दीकियां बढ़ रही है, और रूस इससे खुश नहीं है, ऐसे में पुतिन का भारत आना महत्वपूर्ण माना जा रहा है."

रूसी सरकार द्वारा 1 दिसंबर को दिए एक बयान में पुतिन के हवाले से लिखा गया था, "बहुध्रुवीय दुनिया में भारत एक सशक्त केंद्र हैं जिसकी विदेश नीति, दर्शन और सिद्धांत रूस के साथ मेल खाते हैं."

भारत और रूस के बीच एक नई पहल के तहत 2+2 वार्ता भी हो रही है जिसमें राष्ट्रपति पुतिन के अलावा रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ और रक्षा मंत्री सर्गेई शोउगू भी भारत आ रहे हैं.

वह भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात करेंगे.

भारत ने अभी तक इस फ़ार्मेट में अमेरिका समेत कुछ चुनिंदा देशों के साथ ही वार्ता की है.

सैन्य और ऊर्जा सहयोग

भारतीय मीडिया में आ रही रिपोर्टों के मुताबिक़ दोनों देश उत्तर प्रदेश के अमेठी में साझा उपक्रम के तहत साढ़े सात लाख एके-203 असॉल्ट राइफ़ल के उत्पादन के लिए समझौता कर सकते हैं.

भारत ने साल 2018 में रूस से 5.43 अरब डॉलर में एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम ख़रीदने का सौदा भी किया था. इसकी डिलीवरी को लेकर भी दोनों देशों में बातचीत होनी है.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस एंड कंफ्लिक्ट स्टडीज़ की विश्लेषक तारा कार्था कहती हैं, "इस सिस्टम की क्षमता 400 किलोमीटर तक है. इसका मतलब ये है कि ये पाकिस्तान में कहीं भी उड़ान भर रहे विमान को पकड़ सकता है. इसके साथ ही ये चीन से साथ सटी देश की सीमा की भी निगरानी कर सकता है. इसका मतलब ये है कि चीन जो अपनी तरफ़ हवाई अड्डे बना रहा है और मिसाइलें तैनात कर रहा है ये सिस्टम उनसे भी सुरक्षा दे पाएगा."

चीन के पास पहले से ही एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली है. रूस ने चीन को पहले सिस्टम साल 2018 में भेजे थे. भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक चीन ने ये सिस्टम शिनजियांग और तिब्बत में तैनात किए हैं.

ज़ी-न्यूज़ जैसे भारत के टीवी चैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन भारत को एस-400 रक्षा प्रणाली मिलने से नाराज़ है क्योंकि उसका मानना है कि भारत इसे चीन की सीमा पर तैनात करने जा रहा है.

भारत ऊर्जा क्षेत्र में भी रूस के साथ सहयोग बनाने को लेकर उत्सुक है.

2 दिसंबर को प्रकाशित एक लेख में इकोनॉमिक टाइम्स ने कहा था, "रूस के ऊर्जा समृद्ध पूर्वी इलाक़ों के लिए भारत की महत्वाकांक्षी परियोजना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में व्लादिवोस्तोक में भारत की एक्ट फार ई्स्ट नीति की घोषणा करते हुए इस क्षेत्र में कई परियोजनाओं के लिए एक अरब डॉलर की लाइन ऑफ़ क्रेडिट (एलओसी) की घोषणा भी की थी. 6 दिसंबर की वार्ता इस क्षेत्र में भारत की भागीदारी को और मज़बूत करेगी."

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर मतभेद

मोदी और पुतिन की वार्ता में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भी चर्चा हो सकती है. लेकिन इस मोर्चे पर भारत और रूस के बीच सबकुछ ठीक नहीं है.

रूस ने जब मार्च में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर वार्ता की (एक्सटेन्डेड ट्रोइका) तो उसने इसके लिए चीन और पाकिस्तान को तो बुलाया लेकिन भारत को न्योता नहीं दिया.

विश्लेषक मानते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि रूस और भारत का तालिबान को लेकर नज़रिया एक जैसा नहीं है. रूस तालिबान के साथ बेहतर रिश्ते चाहता है जबकि भारत तालिबान पर पाकिस्तान के प्रभाव को लेकर चिंतित है.

गेटवे हाउस थिंक टैंक के विश्लेषक समीर पाटिल कहते हैं, "रूस के नेतृत्व में मार्च में हुई एक्सटेंडेड ट्रोइका में भारत की ग़ैरमौजूदगी (अगस्त में इसकी एक और बैठक हुई) तालिबान के साथ संपर्क ना करने की जायज़ क़ीमत है जो भारत ने चुकाई है. हालांकि भारत ने पिछले कुछ महीनों में तालिबान के साथ वार्ता की कोशिशें की हैं लेकिन भारत को तालिबान के साथ सक्रिय होने में अभी और वक्त लगेगा."

रशियन एकेडमी ऑफ़ साइंस के इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज़ से जुड़े एलेक्सी ज़ख़ारोफ़ कहते हैं, "रूस अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भारत को बाइपास करके पाकिस्तान का सहयोग कर रहा है."

एलेक्सी इसे रूस के पाकिस्तान के साथ बेहतर होते संबंधों के रूप में देख रहे हैं.

वो कहते हैं, "रूस और पाकिस्तान के रिश्ते ऐसे समय में ही बेहतर होने शुरू हुए जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में गर्मजोशी आई."

वहीं, नवंबर में रूस ने भारत में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर हुई बैठक में हिस्सा लिया. इस पर टिप्पणी करते हुए रूसी अख़बार नेज़ावीसीमाया गज़ट ने कहा, "रूस ने स्पष्ट रूप से भारत की पहल का समर्थन किया है."

अमेरिका और चीन

अमेरिका की तरफ़ से प्रतिबंधों की धमकी के बावजूद भारत रूस के साथ एस-400 सौदे पर आगे बढ़ रहा है, इससे ज़ाहिर तौर पर अमेरिका असहज होगा.

हालांकि कुछ विश्लेषकों को लगता है कि इन सबके बावजूद पुतिन की यात्रा के नतीजे भारत के लिए सकारात्मक होंगे.

पूर्व मेजर जनरल और विश्लेषक हर्ष कक्कड़ कहते हैं, "अब भले ही ये स्थापित तथ्य हो कि भारत अमेरिकी कैंप का हिस्सा है और अमेरिका रूस का विरोधी है, बावजूद इसके भारत के रूस के साथ रिश्ते आगे बढ़ रहे हैं. भारत की रणनीति में बदलाव और अमेरिका के क़रीब जाने की वजह से जो मामूली मतभेद हुए थे वो सब अब ख़त्म हो जाएंगे."

इसके साथ ही, बदल रहे भू-राजनैतिक समीकरणों की वजह से रूस भी इस समय मुश्किल परिस्थितियों में है.

थिंक टैंक रशियन इंटरनेशनल अफ़ेयर्स काउंसिल के प्रमुख आंद्रेई कोर्तुनोफ़ कहते हैं, "रूस को भारत और अमेरिका के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ रहे सहयोग से असहज नहीं होना चाहिए."

कोर्तुनोफ़ कहते हैं, "इससे अभी तक सीधे तौर पर रूस के लिए कोई ख़तरा नहीं है, बल्कि ये चीन के लिए ज़्यादा बड़ी चुनौती है."

(इस रिपोर्ट के लिए बीबीसी मॉनिटरिंग और बीबीसी रूसी सेवा ने सहयोग किया.)

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