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कार्बन कटौती पर बातचीत में तेल उद्योग के लोग सबसे ज़्यादा क्यों
ग्लासगो में हुए संयुक्त राष्ट्र के 26वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में किसी भी एक देश के प्रतिनिधिमंडल के मुक़ाबले तेल उद्योग से प्रतिनिधि ज़्यादा संख्या में मौजूद थे.
ग्लोबल विटनेस के नेतृत्व वाले जलवायु संकट पर काम करने वाले समूहों ने सम्मेलन में भाग वालों की संयुक्त राष्ट्र की सूची के अध्ययन के आधार पर इस संख्या का पता लगाया है.
इस अध्ययन के मुताबिक जीवाश्म ईंधन उद्योग से जुड़े 503 लोगों को जलवायु सम्मेलन में शामिल होने की स्वीकृति दी गई थी. ईंधन उद्योग का मतलब कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल आदि से जुड़े उद्योगों से है.
इन प्रतिनिधियों एजेंडा तेल और गैस उद्योग की पैरवी (लॉबी) करना है. पर्यावरण कार्यकर्ता इन्हें प्रतिबंधित करने की मांग करते हैं.
तेल और गैस उद्योग से जुड़े लोगों का जलवायु सम्मेलन में होना इसलिए अहम जाता है क्योंकि जलावयु संकट से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन घटाने पर ज़ोर दिया जा रहा है.
कार्बन उत्सर्जन के लिए कोयले, पेट्रोल, डीजल और गैस जैसे ऊर्जा के साधनों के इस्तेमाल को बड़ा कारण माना जाता है. इसलिए ऊर्जा के अन्य़ नवीकरणीय साधनों को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में सम्मेलन में होने वाले फ़ैसलों का तेल और गैस उद्योगों पर असर होना लाज़मी है.
लॉबी का प्रभाव
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस लॉबी के प्रभाव के चलते जलवायु परिवर्तन सम्मलेन अपने उद्देश्य की तरफ़ नहीं बढ़ पाते हैं.
ग्लोबल विटनेस से मुर्रे वर्दी कहते हैं, "तेल और गैस उद्योग ने जलावायु संकट पर असल कार्रवाई को नकारने या देरी करने में दशकों बिताए हैं. यही वजह है ये इतनी बड़ी समस्या है."
"संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के 25 साल होने पर भी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वास्तविक कटौती नहीं होने की एक बड़ी वजह इस उद्योग का प्रभाव रहा है."
करीब 40 हज़ार लोगों ने ग्लासगो के जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लिया था. संयुक्त राष्ट्र के डाटा के मुताबिक ब्राज़ील से वार्ताकरों की सबसे बड़ी आधिकारिक टीम वहां पहुंची थी जिसमें 479 प्रतिनिधि शामिल थे.
ग्लासगो में सम्मेलन की मेजबानी करने वाले ब्रिटेन से तेल एवं गैस उद्योग के 479 प्रतिनिधि मौजूद थे.
लेकिन, जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में तेल और गैस उद्योग से पैरवी करने वाली मौजूदगी क्या मायने रखती है?
ये अध्ययन करने वाले ग्लोबल विटनेस, कॉरपोरेट अकाउंटेबिलिटी और अन्य पक्षों के मुताबिक एक जीवाश्म ईंधन लॉबिस्ट ऐसा व्यक्ति है जो एक करोबार मंडली के प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा है या तेल और गैस कंपनियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले समूहों का सदस्य है.
कनाडा और रूस से आए प्रतनिधि
अध्ययन में जलवायु सम्मेलन में तेल-गैस कंपनियों के हितों से जुड़े या इसके लिए नियुक्त किए गए 503 लोगों की पहचान हुई है. इसके साथ कुछ और बातें भी सामने आई हैं-
- जीवाश्म ईंधन की पैरवी करने वाले कनाडा और रूस के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य हैं.
- जलवायु सम्मेलन में तेल और गैस उद्योग से आई लॉबी की संख्या उन देशों के आठ प्रतिनिधिमंडलों के मुक़ाबले ज़्यादा थी जो पिछले 20 सालों से जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित रहे हैं.
- जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 100 से ज़्यादा जीवाश्म ईंधन कंपनियों का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जिसमें 30 व्यापार संघ और सदस्यता संगठन भी मौजूद हैं.
अध्ययन के मुताबिक इस लॉबी में सबसे बड़ा समूह इंटरनेशनल एमिशंस ट्रेडिंग एसोसिएशन (आईईटीए) का था जिसमें 103 प्रतिनिधि शामिल थे. इस समूह में तेल और गैस कंपनी बीपी के तीन लोग शामिल थे.
ग्लोबल विटनेस के मुताबिक आईईटीए को कई प्रमुख तेल कंपनियों का समर्थन प्राप्त है जो प्रभाव कम करने और कार्बन ट्रेडिंग को बढ़ावा देती हैं ताकि उन्हें तेल और गैस निकालने की अनुमति मिलती रहे.
मुर्रे वर्दी कहते हैं, "यह एक ऐसा संघ है जिसके सदस्यों में बड़ी संख्या में तेल और गैस कंपनियां शामिल हैं. इसका एजेंडा इन कंपनियों के हितों के मुताबिक संचालित होता है."
"हम देख रहे हैं कि दिखावे के समाधानों को आगे बढ़ाया जाता है जो जलवायु संकट से निपटने की कार्रवाई जैसे दिखते तो हैं लेकिन असल में वो यथास्थिति बनाए रखते हैं. ये उन स्पष्ट व आसान कदमों को उठाने से रोकते हैं जो जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को रोकने में कारगर हों."
क्या कहता है आईईटीए
आईईटीए का कहना है कि उसका काम कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ऐसे बाज़ार आधारित संसाधनों को खोजना है जो सबसे ज़्यादा कारगर हों. इसके सदस्यों में तेल और गैस कंपनियों के अलावा अन्य व्यवसाय भी शामिल हैं.
आईईटीए के प्रवक्ता एलेज़ांद्रो विटेली कहते हैं, "हमारे पास लॉ फर्म है, प्रोजेक्ट डेवलपर्स हैं, दुनिया भर में क्लीन टेक्नोलॉजी पहुंचाने वाले हैं. वो भी हमारे संघ के सदस्य हैं."
"हम आज या कल में बंद नहीं होने जा रहे हैं और अचानक ही जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्सर्जन बंद नहीं होने वाला है. बदलाव की एक प्रक्रिया चल रही है और कार्बन बाज़ार यह सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि बदलाव हो रहा है."
पर्यवारण कार्यकर्ताओं का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तंबाकू पर प्रतिबंध लगाने को लेकर तब तक गंभीर नहीं हुआ था जब तक इस उद्योग के सभी पैरोंकारों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठकों से बाहर नहीं कर दिया गया था.
जलवायु परिवर्तन की समस्या पर काम करने वाले समूह चाहते हैं कि ऐसा ही जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने वाली लॉबी के साथ भी किया जाए.
इस अध्ययन का हिस्सा रही कॉरपोरेट यूरोप ऑब्ज़रवेट्री के पेस्को साबिदो कहती हैं, "जीवाश्म गैस का उत्पादन बढ़ाने को खुले तौर पर स्वीकार करने वालीं शेल और बीपी जैसी कंपनियां भी जलवायु सम्मेलन का हिस्सा होती हैं. अगर हम इसे जलवायु संकट से निपटने के लिए गंभीर हैं तो हमें तेल और गैस पैरवीकारों को ऐसी वार्ताओं से दूर रखना चाहिए."
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