मॉस्को वार्ता : अफ़ग़ानिस्तान पर फिर से सक्रिय हुआ रूस, क्या तालिबान के लिए ख़ुशख़बरी है ?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस ने अफ़ग़ानिस्तान मुद्दे पर चर्चा के लिए 20 अक्टूबर को अहम बैठक बुलाई है.
'मॉस्को फॉर्मेट' वार्ता नाम से होने वाली बैठक के लिए तालिबान के अलावा अमेरिका, चीन, भारत, ईरान और पाकिस्तान समेत 10 देशों को न्योता भेजा गया है.
अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी के बाद रूस, पहली बार इस बैठक का आयोजन कर रहा है.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक अमेरिका ने इस बैठक में शामिल होने में असमर्थता जताई है.
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ख़बर के मुताबिक़ अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है, "हम मॉस्को-वार्ता में शामिल नहीं होंगे. 'ट्रॉइक- प्लस' एक प्रभावी और रचनात्मक मंच है. हम आगे चल कर इस फोरम में शामिल होने की आशा रखते हैं. लेकिन इस सप्ताह होने वाली बैठक में भाग लेने की स्थिति में नहीं हैं."
भारत ने इस बैठक में अपना प्रतिनिधि भेजने की बात स्वीकार की है. तालिबान का प्रतिनिधिमंडल मंगलवार को मॉस्को के लिए रवाना हो गया है.
ऐसा माना जाता है कि तालिबान के उदय में रूस की भूमिका रही है. दोनों के बीच की शुरुआती दुश्मनी के बाद दोस्ती और फिर वर्तमान में अफ़ग़ानिस्तान शांति वार्ता की पहल से लेकर तालिबान की सत्ता में वापसी तक का इतिहास कई उतार चढ़ाव से होकर गुज़रा है.
दरअसल अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर 'मॉस्को फॉर्मेट' की शुरुआत 2017 में हुई थी. इसमें छह देशों रूस, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान और भारत को शामिल किया गया था.

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मॉस्को फॉर्मेट मीटिंग का मक़सद
हालांकि बैठक के मेज़बान देश रूस के मुताबिक़ इस बैठक का मुख्य उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी के बाद वहाँ पुनर्निर्माण के कार्यों में तेज़ी और मानवीय सहायता के लिए सहयोग बढ़ाना है.
अफ़ग़ानिस्तान के न्यूज़ चैनल, टोलो न्यूज़ के मुताबिक, तालिबान के प्रतिनिधिमंडल को इस बैठक से काफी उम्मीदें है. उन्हें लगता है कि इस सम्मेलन के जरिए अन्य देशों के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंधों में सुधार होगा और वर्तमान सरकार की मान्यता के लिए आधार तैयार करने में मदद मिलेगी.
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विदेश मामलों की वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स ऑफ़ इंडिया की डिप्लोमेटिक एडिटर इंद्राणी बागची कहती हैं, "इस बैठक के ज़रिए रूस एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान मसले पर एक 'अहम रोल' अदा करने की एक कोशिश कर रहा है. लेकिन इसमें रूस को दिक़्कतों का सामना करना पड़ रहा है. पहले उन्हें लग रहा था कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद वो अपने 'वादों को पूरा करेंगे' और दूसरे देश उनके साथ 'संबंध स्थापित' करेंगे. लेकिन वैसा होता नहीं दिख रहा है. इसलिए अब रूस दुविधा में है.
'फंड फ्रीज़' हो जाने की वजह से तालिबान को अब आर्थिक दिक़्क़त का सामना करना पड़ रहा है. रूस के पास पैसा नहीं है. चीन, अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक मदद करना नहीं चाहता और पाकिस्तान ख़ुद कर्ज़ में डूबा है.
दूसरी तरफ़ आईएसआईएस के निशाने पर शिया मुसलमान है, जिससे ईरान नाराज़ है. मध्य एशिया के दूसरे पड़ोसी देश भी तालिबान सरकार से खुश नहीं है.
इतना ही नहीं, तालिबान के साथ बातचीत के दौरान जो चेहरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा दिखते थे, जैसे मुल्ला बरादर और शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ई , अंतरिम सरकार में वो बहुत ताकतवर नहीं रह गए हैं."
इंद्राणी नहीं मानती कि इस बैठक का मक़सद तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए पहल करना है. वो कहती हैं कि इस बैठक का मकसद है 'इंट्रा-अफ़ग़ान डायलॉग' जारी रखना चाहता है. मॉस्को-फॉर्मेट मीटिंग की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई थी.

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इंद्राणी की बात से अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद भी सहमत नज़र आते हैं.
वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता है कि इस बैठक का मक़सद तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाना है. हाल ही में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लवरोफ़ ने कहा था कि रूस तालिबान को मान्यता देने की जल्दी में नहीं है. जब तक वो अपने किए वादे पूरे नहीं करते उनसे 'बातचीत' जारी रखनी चाहिए. उन्होंने अंग्रेजी का शब्द 'इंटरएक्ट' इस्तेमाल किया था. ये वक्तव्य अपने आप में साफ़ इशारा करता है कि रूस इस बैठक से क्या चाहता है."
"इस बैठक में रूस ये कोशिश करेगा कि सभी देश जो इसमें शामिल हो रहे हैं वो एक आवाज़ में तालिबान को संदेश दें कि अगर उन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहिए तो पहले किए गए समझौते और वादों पर काम करें."
दरअसल तालिबान ने वादा किया था कि वो 'समावेशी' सरकार बनाएंगे - लेकिन अंतरिम सरकार के गठन में उस वादे को पूरा नहीं किया.
अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोस में मध्य एशिया के देश ताज़िकिस्तान और उज़्बेकिस्तान - भी रूस की ही तरह तालिबान सरकार को लेकर एक चिंतित हैं. उन्होंने कहा है कि जो वादे तालिबान सरकार ने सार्वजनिक रूप से किए हैं, उन्हें पूरा नहीं किया है.
हाल के दिनों में रूस ने अपनी सेना की मौजूदगी ताजिकिस्तान सीमा पर बढ़ा दी है.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. स्वास्ति राव कहती हैं, "रूस के लिए अफ़ग़ानिस्तान अस्सी के दशक से एक अहम देश रहा है. रूस का डर है कि तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ चरमपंथी संगठन फिर से मध्य एशिया में दोबारा से सक्रिया ना हो जाएं. रूस चाहता है कि तालिबान उसके यहाँ और मध्य एशिया में पृथकतावादियों और आतंकवादियों को समर्थन न दे. इसके साथ ही वो ये भी चाहता है कि अमेरिका का प्रभुत्व एशिया के इस हिस्से में न बढ़े."
चूंकि अमेरिका इस मॉस्को फॉर्मेट का हिस्सा रहा है, इस वजह से न्योता उसे भी भेजा गया है. लेकिन अमेरिका ने इस बैठक से पहले ही दोहा में तालिबान के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की है और अब इस बैठक में शामिल नहीं हो रहा है.

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अमेरिका के शामिल न होने के मायने
अमेरिका और रूस के आपसी रिश्ते इस वक़्त अपने निम्नतम स्तर पर हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद, अमेरिका के इस बैठक में शामिल न होने को उनकी अंदरूनी राजनीति से जोड़ कर भी देखते हैं.
राकेश सूद कहते हैं, "अमेरिका के इस बैठक में शामिल न होने की कई वजहें हो सकती हैं. सोमवार को ही अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के विशेष दूत ज़ालमय ख़लीलज़ाद ने इस्तीफ़ा दे दिया है, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है. ज़ालमय ख़लीलज़ाद ने तालिबान के साथ अमेरिकी वार्ता का नेतृत्व किया था, लेकिन महीनों तक चली कूटनीतिक वार्ता भी तालिबान को क़ब्ज़े से रोकने में विफल रही. इस वजह से सरकार को काफी आलोचना झेलनी पड़ी है.
इतना ही नहीं अमेरिकी सेना की वापसी के तरीकों और प्रक्रिया पर कांग्रेस की तरफ़ से एक इन्क्वायरी भी चल रही है.
हाल ही में तालिबान के साथ अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधि की दोहा में द्विपक्षीय वार्ता भी हुई है. ऐसे में इस बहुपक्षीय बातचीत से अमेरिका को बहुत ज़्यादा हासिल होने की उम्मीद नहीं होगी. ये तमाम वजहें भी हो सकती हैं अमेरिका के इस वार्ता से दूरी बनाए रखने की."

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भारत का शामिल होना
इसी साल मार्च महीने में अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता को लेकर रूस ने एक कॉन्फ़्रेंस का आयोजन किया था. इसमें अमेरिका, पाकिस्तान और चीन को आमंत्रित किया गया था, लेकिन भारत को नहीं बुलाया गया. इस सम्मेलन में अफ़ग़ानिस्तान की सरकार और तालिबान के प्रतिनिधि भी शामिल थे.
इसे लेकर भारत में काफ़ी चर्चा हुई थी.
लेकिन मॉस्को-वार्ता में भारत को भी न्योता भेजा गया है.
इसके पीछे की वजह गिनाते हुए इंद्राणी कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में विकास कार्यों में मदद का जब भी ज़िक्र आता है तो भारत का नाम आता है. ये सब जानते हैं कि भारत ने संसद बनाने से लेकर स्कूल और दूसरी परियोजनाओं में वहाँ मदद पहुँचाई है. इसके साथ-साथ, वहाँ की अंतरिम तालिबान सरकार ने भी भारत से व्यापार शुरू करने की बात की है. इसलिए अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण के कार्यों और मानवीय सहायता की जहाँ भी बात होगी, भारत को शामिल किया जाएगा"
हालांकि उनका मानना है कि भारत इस बैठक में किसी तरह का कोई ठोस वादा करने से बचेगा. दोनों जानकार मानते हैं कि इस बैठक से बहुत आस नहीं लगानी चाहिए.
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