इराक़ में शिया धार्मिक नेता मुक़्तदा अल-सद्र का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय

इराक़ की राष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक़ रविवार को हुए संसदीय चुनावों में शिया मुस्लिम धर्मिक नेता मुक़्तदा अल-सद्र की पार्टी जीत की ओर आगे बढ़ रही है. वह देश के नए प्रधानमंत्री बनने की रेस में सबसे आगे हैं.

वोटों की गितनी के ये आंकड़े देश के चुनाव आयोग ने जारी किए हैं. इसके मुताबिक़ मुक़्तदा अल-सद्र की पार्टी 73 सीटों के साथ सबसे आगे है और दूसरे नंबर पर 38 सीटों के साथ मुहम्मद अल हलबोसी की पार्टी है.

वहीं, 37 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर स्टेट ऑफ़ लॉ गठबंधन है. देश में कुल 329 संसदीय सीटें हैं.

अब तक आए नतीज़ों के मुताबिक़ हदी अल-अमीरी के गठबंधन अल-फ़तह को बड़ा नुक़सान होता नज़र आ रहा है. इस गठबंधन को इस बार महज़ 14 सीटें मिली हैं. वहीं, साल 2018 के चुनाव में इसे 45 सीटें मिली थीं.

बीबीसी अरबी के संवाददाता फ़िरास किलानी के मुताबिक़ अब तक के नतीजों से 'इराक़ की राजनीति में बड़ी हलचल नज़र आ रही है.' सभी बड़े गठबंधनों के वोट शेयर के प्रतिशत में भारी गिरावट दर्ज की गई है.

किंगमेकर माने जाते हैं मुक़्तदा अल-सद्र

माना जा रहा है कि प्रगति और सुलह को लेकर बनाया गया गठबंधन इस चुनाव में सबसे प्रभावशाली रहा. सुन्नी गठबंधनों ने इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ा था. चुनाव नतीज़ों के सामने आते ही मुक़्तदा अल-सद्र ने कहा, "आज का दिन मिलिशिया पर जीत हासिल करने का दिन है."

उन्होंने कहा कि मिलिशिया को ख़त्म करने और हथियारों को देश को सौंपने का वक़्त आ गया है. मुक़्तदा अल-सद्र ने कहा है कि लोग भारी संख्या में इस जश्न को मनाने के लिए जुटें लेकिन इस जश्न में हथियारों की कोई जगह नहीं होगी.

शुरुआती रूझान बताते हैं कि जो उम्मीदवार साल 2019 में सुधारों के पक्ष में किए गए प्रदर्शनों से उभर कर सामने आए, उन्हें जीत या बढ़त मिली है. मुक़्तदा अल-सद्र बेहद लोकप्रिय और सत्ता में दमखम रखने वाले धार्मिक नेता रहे हैं.

अमेरिकी हमले के बाद उन्हें इराक़ की सत्ता में किंगमेकर माना जाता रहा है. वे ईरान और अमेरिका किसी की भी ओर से इराक़ में दखलंदाज़ी के ख़िलाफ़ रहे हैं. साल 2003 में उन्होंने अमेरिका के विरुद्ध हथियार उठाया था.

साल 2019 में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और अराजकता के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों के बाद ये पहले आम चुनाव हैं. ये चुनाव अगले साल होने थे लेकिन देश में बढ़ते प्रदर्शनों को देखते हुए इसे तय वक़्त से छह महीने पहले ही कराया गया. इन प्रदर्शनों में सैकड़ों लोग मारे गए.

इराक़ में प्रदर्शनों के बाद पहला चुनाव

पुरानी चुनावी प्रणाली पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट पर आधारित थी, लेकिन इस बार स्वतंत्र उम्मीदवारों को भी जगह दी गई. हालांकि मुख्य शिया ब्लॉक के खाते में ज्यादा सीटें जाती दिख रही हैं.

साल 2003 में अमेरिकी हमले के बाद से ही मुख्य शिया ब्लॉक का दबदबा रहा है. इस हमले ने सद्दाम हुसैन के शासन को उखाड़ फेंका और सांप्रदायिक और जातीय पहचान पर आधारित सत्ता की साझेदारी की प्रणाली की शुरुआत की.

इससे एक छोटे अभिजात वर्ग की सत्ता पर एक मजबूत पकड़ बनी और भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया गया. साल 2019 के विरोध प्रदर्शनों में हज़ारों की संख्या में नौजवान बग़दाद की सड़कों पर उतर आए थे.

नौजवानों की नाराज़गी इस बात पर थी कि विशाल तेल संसाधनों के बावजूद अधिकांश इराक़ी लोग गरीबी में जी रहे हैं और देश की आर्थिक स्थिति ख़राब है. तत्कालीन प्रधानमंत्री अदेल अब्दुल महदी की सरकार ने इन प्रदर्शनों के कारण हफ़्तों के भीतर इस्तीफ़ा दे दिया.

लेकिन इराक़ में फिर भी प्रदर्शन चलते रहे. अक्तूबर और दिसंबर 2019 के बीच अर्धसैनिक बलों के साथ हिंसक झड़प में 550 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए. ये प्रदर्शन तब रुके जब देश में कोविड से निपटने के लिए पाबंदियां लगाई गईं.

आयोग के मुताबिक़ इस बार 41 फ़ीसदी वोटिंग की गई है. ये आंकड़े स्मार्ट इलेक्टोरल कार्ड धारक मतदाताओं में कितने लोगों ने वोट दिया, इस पर आधारित है. 2.2 करोड़ लोगों के पास ये कार्ड है.

इस चुनाव में 90 लाख लोगों ने वोट दिए जबकि देश में कुल योग्य वोटरों की संख्या 2.5 करोड़ है. साल 2018 में 44.5 फ़ीसदी लोगों ने वोट दिया था. इस बार इराक़ के आम चुनाव में 3,200 उम्मीदवार मैदान में थे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)