तुर्की और रूस आख़िर दोस्त हैं या दुश्मन?

तुर्की और रूस के संबंध किसी से दबे-छिपे नहीं हैं. ऐसा माना जाता है कि दोनों के बीच अच्छे संबंध हैं लेकिन अगर ध्यान से देखें तो ये संबंध केवल व्यापार और पर्यटन में देखने को ही मिलते हैं.

इन संबंधों में हक़ीक़त ये दिखाई देती है कि कई मोर्चों पर तुर्की और रूस एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

तुर्की ने जब एस-400 मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम रूस से लेने की घोषणा की थी तो अमेरिका समेत नेटो ने उसे ऐसा न करने को कहा था.

यहाँ तक कि अमेरिका ने तुर्की के रक्षा उद्योगों पर भी कुछ पाबंदियां लगा दी थीं लेकिन तुर्की ने घोषणा की थी कि उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता है.

तुर्की के राष्ट्रपति रैचेप तैयप अर्दोआन ने कहा था कि कोई भी देश उनको एस-400 मिसाइल न ख़रीदने को लेकर हुक्म नहीं दे सकता है.

इस घोषणा से साफ़ था कि तुर्की और रूस के संबंध और गहरे होंगे. ये अनुमान सही भी साबित हुए और दोनों के व्यापारिक संबंध और गहरे हुए.

रूस ने इस साल अभी तक तुर्की से अपने इस्तेमाल के लिए तक़रीबन आधी गैस का आयात किया है. पिछले साल पाइपलाइन में ख़राबी के चलते रूस से सिर्फ़ एक तिहाई गैस की ही ख़रीद की गई थी लेकिन अब इसमें ख़ासी बढ़ोतरी हुई है.

दूसरी ओर कोरोना महामारी के शुरू होने से पहले साल 2019 में तुर्की में रूस के 70 लाख सैलानी आए थे जो किसी भी देश से आए सबसे अधिक लोग थे.

वहीं रूस तुर्की के दक्षिण में एक परमाणु प्लांट बना रहा है जो 2023 तक काम करने लगेगा. अभी इसी हफ़्ते जब तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन रूस के दौरे पर गए तो उन्होंने पर्यटन को लेकर रूस के सहयोग की तारीफ़ भी की.

रूस और तुर्की कहाँ नहीं हैं दोस्त?

इतने व्यापारिक सहयोग के बावजूद दोनों देशों के संबंधों के बीच कई जगहों पर बिगाड़ भी हैं और वो है युद्ध के क्षेत्र में. दोनों के लिए सबसे बड़ा युद्ध है सीरिया.

सीरिया में रूस जहां बशर अल असद सरकार समर्थित फ़ौजों के साथ है वहीं तुर्की विद्रोही लड़ाकों को समर्थन देता रहा है.

तुर्की अपने यहाँ पर मौजूद कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) को एक आतंकी संगठन मानता है और उसका मानना है कि सीरिया में लड़ रहा वाईपीजी इसी की शाखा है, जिसे वो ख़त्म करना चाहता है.

हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने रूस का दौरा किया था और वहां पर सोची में उनकी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाक़ात हुई थी.

दौरे से लौटते हुए अर्दोआन ने कहा था कि सीरिया को लेकर रूस के हर फ़ैसले पर तुर्की प्रतिबद्ध रहता है और उस पर क़दम पीछे खींचने का सवाल ही नहीं है.

सीरिया में हालिया हमलों को लेकर अर्दोआन ने कहा कि वाईपीजी/पीकेके आतंकी समूह को क्षेत्र से ख़त्म करने के लिए रूस के साथ समझौता हुआ है जिसे पूरा किया जाएगा.

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि अपने रूस दौरे पर उन्होंने वाईपीजी/पीकेके आतंकी समूह की मौजूदगी का मुद्दा गंभीरता से उठाया है और पुतिन को याद दिलाया है कि उन्हें आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में मज़बूती से सहयोग करना चाहिए.

अर्दोआन ने और क्या कहा

तुर्की मानता है कि पीकेके के 35 साल के आक्रामक अभियान के दौरान कम से कम 40 हज़ार लोगों की जान गई है, जिनमें महिलाएं, बच्चे और नवजात शामिल हैं. इस संगठन को तुर्की, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने आतंकी संगठनों की सूची में डाला हुआ है.

सीरिया की लड़ाई में एक तीसरा पक्ष अमेरिका का भी रहा है जो एक समय पीकेके समेत विद्रोही लड़ाकों को समर्थन देता रहा है.

रूस दौरे से लौटते समय अर्दोआन ने कहा कि वो रोम में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिलेंगे.

अर्दोआन ने कहा कि मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के व्हाइट हाउस कॉर्डिनेटर ब्रेट मैकगर्क एक तरह से 'पीकेके/वाईपीजी/पीवाईडी के निदेशक' की तरह हैं और तुर्की जिस क्षेत्र में लड़ रहा है वो वहां पर 'आतंकी समूहों के साथ बांहों में बांहें डाले' हुए हैं.

अर्दोआन ने कहा कि अमेरिका को सीरिया जल्द से जल्द छोड़ देना चाहिए और इसे सीरिया के लोगों के हवाले कर देना चाहिए.

बुधवार को रूस के सोची से लौटते समय उन्होंने विमान में पत्रकारों से कहा कि तुर्की सीरियाई शरणार्थियों के उनके घर सुरक्षित लौटने को लेकर सभी ज़रूरी काम कर रहा है, अब तक 10 लाख सीरियाई शरणार्थी अपने घरों को लौट चुके हैं जिनमें 4 लाख इदलिब के निवासी हैं.

तुर्की और रूस ने एक समझौते के तहत इदलिब को एक डी-एस्केलेशन ज़ोन घोषित किया हुआ है.

टीआरटी वर्ल्ड वेबसाइट लिखती है कि कई संघर्ष-विराम समझौतों के बावजूद ये क्षेत्र कई बार निशाना बनाया गया है और सीरियाई शासन और उसके सहयोगियों ने इसको कई बार तोड़ा है.

रूस-तुर्की और भी जगहों पर हैं आमने-सामने

लीबिया में तुर्की ने अतंरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की मदद के लिए त्रिपोली में सैन्य दख़ल दिया था लेकिन ख़लीफ़ा हफ़्तार के बलों ने उन पर हमला कर दिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ कहते हैं कि रूस के वैगनर समूह ने हफ़्तार की मदद के लिए लड़ाके भेजे थे जबकि तुर्की ने त्रिपोली सरकार की मदद के लिए सीरियाई लड़ाकों को भेजा था.

पिछले साल अक्तूबर में संघर्ष विराम समझौतों पर दोनों पक्ष पहुंचे थे लेकिन विदेशी लड़ाकों को जनवरी तक लीबिया छोड़ना था. अब तक दोनों ने इस अंतिम तारीख़ को नज़रअंदाज़ किया हुआ है.

इसके अलावा तुर्की अज़रबैजान और अर्मीनिया की लड़ाई में खुले तौर पर अज़रबैजान का पक्ष ले चुका है. पिछले साल दक्षिणी काकेशस पर्वतीय क्षेत्र के नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े पर क़ब्ज़े की लड़ाई के दौरान आर्मीनिया के पक्ष में रूस था.

रूस का आर्मीनिया के साथ समझौता है कि वो उसका अपने दक्षिणी हिस्से की तरह उसकी रक्षा करेगा क्योंकि पूर्व सोवियत काल में यह उसी का हिस्सा हुआ करता था. पुतिन ने लड़ाई और आर्मीनिया की पूरी तरह हार को रोकने के लिए एक शांति समझौते की मध्यस्थता की थी.

इसके अलावा रूस के क्राइमिया पर क़ब्ज़े को भी तुर्की मान्यता नहीं देता है. तुर्की का कहना है कि यूक्रेन की संप्रभुता को बरक़रार रखना ज़रूरी है.

तुर्की के इस बयान से रूस ख़ासा नाराज़ा हुआ था लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करते हुए पिछले ही महीने संयुक्त राष्ट्र में अर्दोआन ने इस बात को फिर एक बार दोहरा भी दिया.

अप्रैल में अर्दोआन ने यह भी कह दिया था कि वो यूक्रेन को सीमा पर रूसी बलों के ख़िलाफ़ उसे मदद देगा तो रूस ने तुर्की को चेताते हुए कहा था कि वो 'सैन्य भावना' भड़काने की कोशिशें न करे.

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