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उत्तर और दक्षिण कोरिया की 'मिसाइल रेस' पर दुनिया भर में उठते सवाल
- Author, श्रेयस रेड्डी
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया दोनों ने ही सितंबर महीने में नई मिसाइलों का परीक्षण किया है, जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में "हथियारों की दौड़" को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है.
प्योंगयांग के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा रहे हैं लेकिन अब सोल भी, मई महीने में लंबे समय से लगे प्रतिबंध हटने के बाद अपने मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहता है.
दक्षिण कोरिया की हालिया गतिविधियों ने उसकी परमाणु हथियारों की महत्वाकांक्षाओं पर कई सवाल उठाए हैं.
13 सितंबर को उत्तर कोरियाई मीडिया ने कहा था कि रक्षा विज्ञान अकादमी ने 11 और 12 सितंबर को "नई प्रकार की लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों" का परीक्षण किया है.
कथित तौर पर नई क्रूज मिसाइलों ने अंडाकार और आठ की आकृति के उड़ान पैटर्न में दो घंटे से अधिक समय तक उड़ान भरी. सरकारी मीडिया ने दावा किया कि यह मिसाइल 1500 किमी दूर लक्ष्य को मारने में सक्षम है.
उस घोषणा के दो दिन बाद उत्तर कोरिया ने एक नई "रेलवे बोर्न मिसाइल रेजिमेंट" (ऐसी मिसाइल जो चलती हुई ट्रेन से दागी जा सके) का परीक्षण किया, जिसमें एक मोडिफ़ाइड ट्रेन से मिसाइलों को लॉन्च किया गया.
उत्तर कोरिया बनाम दक्षिण कोरिया
28 सितंबर को उत्तर कोरिया ने नई ह्वासोंग-8 हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया. जहां उत्तर कोरिया अपने नए मिसाइल सिस्टम का परीक्षण कर रहा है, वहीं दक्षिण कोरिया अपने स्वदेशी हथियारों पर से पर्दा हटा रहा है.
15 सितंबर को राष्ट्रपति मून जे-इन ने अपने पहले स्थानीय रूप से विकसित पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) के परीक्षण का निरीक्षण किया. कथित तौर पर इसे Hyunmoo 4-4 कोडनेम दिया गया था और माना जाता है कि यह पुराने Hyunmoo-2B शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक का ही एक विकसित रूप है.
एसएलबीएम और ये पनडुब्बियां दक्षिण कोरिया की एकमात्र हालिया कामयाबी नहीं है.
सोल में रक्षा मंत्रालय ने उसी दिन अपनी सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और एक ताकतवर बैलिस्टिक मिसाइल के भी बारे में जानकारी दी थी.
उत्तर कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम
साल 2019 से उत्तर कोरिया अपनी परमाणु क्षमताओं को गुणात्मक तरीक़े से बेहतर करने की दिशा में लगा हुआ है.
फ़रवरी 2019 में वियतनाम के हनोई में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर सम्मेलन की असफलता के बाद उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों में निवेश जारी रखने का संकल्प दोहराया था ताकि राष्ट्रीय रक्षा रणनीति की दिशा में देश 'आत्मनिर्भर' बन सके.
लेकिन 1960 के दशक तक उत्तर कोरिया मौजूदा कई रॉकेट लॉन्चरों के अपने संस्करणों के उत्पादन तक ही सीमित था.
इसमें बदलाव आना शुरू हुआ 1965 से, जब देश के संस्थापक किम इल-सुंग ने बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास का आह्वान किया.
युद्ध की स्थिति में अमेरिका और जापान को रोकने के लिए, उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया को "रॉकेट बनाने में सक्षम होना चाहिए जो जापान तक मार कर सकते हों."
सोवियत संघ और चीन
1960 और 1970 के दशक के अंत में प्योंगयांग ने सोवियत संघ और चीन जैसे सहयोगियों से मिसाइलें खरीदीं और हथियारों के लिए ज़रूरी चीज़ों को स्थानीय रूप से इकट्ठा करने और उत्पादन करने के लिए अपनी सुविधाओं की शुरुआत की.
1976 और 1981 के बीच कभी-कभी इसने मिस्र से सोवियत SCUD-B मिसाइलें भी लीं, जो प्योंगयांग के मिसाइल कार्यक्रम का आधार बनीं.
उत्तर कोरिया ने 1984 में ह्वासोंग-5 का परीक्षण किया, जो घरेलू स्तर पर निर्मित पहली एससीयूडी-बी मिसाइल थी. हालांकि बाद के सालों में भी इसने अपने सहयोगियों के साथ हथियार विकसित करना और बेचना जारी रखा.
साल 1993 में उत्तर कोरिया ने अपनी पहली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल नोडोंग का परीक्षण किया और 1998 में उसने ताइपोडोंग-1 बैलिस्टिक मिसाइल का उपयोग करके एक उपग्रह को स्थापित करने की कोशिश की. हालांकि इसमें वह असफल रहा.
जैसे-जैसे उत्तर कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम आगे बढ़ा, चिंता बढ़ीं. साल 2003 में उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों के अप्रसार (एनपीटी) पर संधि से पीछे हट गया, जिस पर उसने 1985 में हस्ताक्षर किए थे.
उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण
9 अक्टूबर, 2006 को उत्तर कोरिया ने एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया. तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और प्रतिबंधों के बावजूद इसने 2009 में दूसरा परमाणु परीक्षण किया.
साल 2011 में वर्तमान नेता किम जोंग-उन के कार्यभार संभालने के बाद भी उत्तर कोरिया के मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रम जारी रहे. परीक्षणों की एक श्रृंखला शुरू हुई जो 2016 और 2017 में चरम पर रही.
साल 2018-19 में ओलंपिक प्रेरित शांति की अपील के तहत उत्तर कोरिया ने कूटनीति की ओर रुख किया. साल 2019 में ये देश हथियारों के विकास के क्षेत्र में लौट आया.
तब से, प्योंगयांग ने कई नई हथियार प्रणालियों से दुनिया को चौंकाया है, जिसमें नई अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम), एसआरबीएम और एसएलबीएम शामिल हैं.
दक्षिण कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम
दक्षिण कोरिया ने 1971 में अपना बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम शुरू किया. सैन्य तानाशाह पार्क चुंग साल 1975 तक 200 किमी की रेंज वाली मिसाइल बनाने को इच्छुक थे.
हालांकि, इस कार्यक्रम से वैसे परिणाम कभी नहीं मिले जिसकी उम्मीद थी. लेकिन साल 1979 में सोल और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ. समझौते के तहत, अमेरिका दक्षिण कोरिया को मिसाइलों का उत्पादन करने के लिए आवश्यक तकनीक और सामग्री की आपूर्ति तो करता, लेकिन मिसाइल की सीमा 180 किमी तक सीमित कर दी गई.
साल 1986 में, दक्षिण कोरिया ने अपनी पहली बैलिस्टिक मिसाइल, ह्यूनमू -1 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया. लेकिन 1979 के सौदे ने इसे प्योंगयांग के तेजी से आगे बढ़ने वाले मिसाइल कार्यक्रम से पीछे छोड़ दिया.
इस समझौते ने सोल की शक्तिशाली मिसाइलों को विकसित करने की क्षमता को सीमित कर दिया था. लेकिन 1990 के दशक में इसके हथियार कार्यक्रम को रूस से बढ़ावा मिला.
आगे बढ़ाने का रास्ता साफ़ हो गया
साल 1994 में शुरू हुए "ऑपरेशन साइबेरियन ब्राउन बियर" के तहत दक्षिण कोरिया ने अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाना शुरू किया.
2001 में अमेरिका के लगाए गए प्रतिबंधों में भी आंशिक रूप से ढील दी गई और 2012 तक मिसाइलों का सीमा बढ़कर 800 किमी हो गई.
इन नई शर्तों के तहत, दक्षिण कोरिया ने 2008 और 2020 के बीच कई ह्यूनमू श्रृंखला बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का परीक्षण करते हुए अपने मिसाइल कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखा है.
मई 2021 में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और मून जे-इन ने लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की. इससे दक्षिण कोरिया के मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रमों को और आगे बढ़ाने का रास्ता साफ़ हो गया है.
हथियारों की दौड़
दोनों कोरियाई देशों की अपनी कमज़ोरियां और ताक़त हैं और ये साफ़ तौर पर यह दर्शाती हैं कि कोरियाई युद्ध के बाद से वे कैसे विकसित हुए हैं.
सैन्य विश्लेषण साइट ग्लोबल फायरपावर ने अपने मूल्यांकन के आधार पर 140 सैन्य बलों में से उत्तर कोरिया को 28वें स्थान पर रखा है, जबकि दक्षिण कोरिया को छठे स्थान पर जगह दी है.
उत्तर कोरिया में 13 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी हैं जोकि दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना भी है जबकि दक्षिण कोरिया के पास छह लाख सैनिक हैं.
उत्तर कोरिया अपने हालिया हथियारों के विकास के साथ साथ अपनी सेना के आधुनिकीकरण में भी सक्रिय तौर पर काम कर रहा है लेकिन अभी के लिए इसके परमाणु हथियार इसकी सबसे बड़ी संपत्ति हैं, जिसे लेकर दुनियाभर में चिंता ज़ाहिर की जाती रही है.
दक्षिण कोरिया ने भी पहले परमाणु हथियारों का रुख़ किया था लेकिन अमेरिकी दबाव में उसने एनपीटी पर हस्ताक्षर किए और अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक ही सीमित कर दिया.
अपने हालिया परीक्षण के साथ दक्षिण कोरिया एसएलबीएम की क्षमता से संपन्न एकमात्र गैर-परमाणु शक्ति राष्ट्र बन गया है. हालांकि इससे उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं.
साल 2020 में सोल नेशनल यूनिवर्सिटी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, दक्षिण कोरिया के 46.9% लोग परमाणु हथियार रखने के विचार का समर्थन करते हैं, जबकि 21.8% इसका विरोध करते हैं.
परमाणु हथियारों विकसित करने के लिए पहली वजह उत्तर कोरियाई हमलों के ख़िलाफ़ जवाब देना है.
15 सितंबर के परीक्षण के बाद राष्ट्रपति मून जे-इन ने नए एसएलबीएम और अन्य हथियारों को प्योंगयांग के "उकसावे" के ख़िलाफ़ "जवाब" के रूप में परिभाषित किया था.
किम यो-जोंग ने प्योंगयांग के हथियारों पर सवाल उठाने के लिए मून की आलोचना की थी.
हालांकि 21 सितंबर को मून के कोरियाई युद्ध को समाप्त करने के प्रस्ताव के बाद उनके लहज़े में थोड़ी नरमी ज़रूर आयी.
इस प्रस्ताव की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक सराहनीय विचार है लेकिन इसे संभव बनाने के लिए दक्षिण को पहले अपने "दोहरे व्यवहार" से किनारा करना होगा.
उत्तर कोरिया के उप विदेश मंत्री री था-सॉन्ग ने मौजूदा स्थिति के बीच मून के प्रस्ताव पर संदेह जताते हुए हथियारों के अंतहीन दौड़ की चेतावनी दी है.
दोनों कोरियाई मुल्क़ अपनी पूरी ताक़त के साथ अपने मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रमों का विस्तार करना चाहते हैं. लेकिन उन्हें "उकसावे" और 'आगे बढ़ने के अपने लक्ष्य' के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है.
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