AUKUS: फ्रांस ने अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया से राजदूत वापस बुलाने के बाद ब्रिटेन को भी दिया झटका

    • Author, एलेक्स थेरियन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए नए रक्षा समझौते ऑकस को लेकर चल रहे विवाद के बीच फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने अपने ब्रितानी समकक्ष के साथ होने वाली बातचीत रद्द कर दी है.

फ्रांस इस बात से नाराज़ है कि ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु शक्ति से संपन्न मिसाइलों के निर्माण के लिए ऑकस समझौते पर दस्तखत किए और इस वजह से फ्रांस को पहले से मिला ठेका रद्द कर दिया गया है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि ऑकस समझौते को लेकर फ्रांस के पास चिंता करने का कोई कारण नहीं है.

लेकिन फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली की ब्रितानी रक्षा मंत्री बेन वैलेस के साथ लंदन में इस हफ़्ते वाली मुलाकात रद्द कर दी गई है.

फ्रांस में ब्रिटेन के राजदूत रह चुके लॉर्ड रिकेट्स दो दिनों तक चलने वाली इस मीटिंग में शामिल होने वाले थे.

फ्रांस ने मीटिंग रद्द की

लॉर्ड रिकेट्स ने बीबीसी से बातचीत में इस बात की पुष्टि की कि फ्रांसीसी रक्षा मंत्री की ब्रितानी रक्षा मंत्री से होने वाली मुलाकात को 'बाद की तारीख के लिए स्थगित कर दिया गया' है.

पिछले हफ़्ते ऑकस समझौते का एलान किया गया था. इस समझौते को दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते असर को रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

लेकिन ऑकस समझौते की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ साल 2016 में किया गया का वो करार तोड़ दिया है जिसके तहत फ्रांसीसी कंपनी नैवल ग्रुप को 12 पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए 37 अरब डॉलर का ठेका दिया गया था.

फ्रांसीसी विदेश मंत्री ज्यां य्वेस ले ड्रायन ने इस समझौते को 'फ्रांस की पीठ में घोंपा गया खंजर' करार दिया है. उन्होंने कहा कि सहयोगी और साझीदार देशों के बीच इस तरह का बर्ताव अस्वीकार्य है.

बात यहीं पर नहीं रुकी और एक तरह से अभूतपूर्व फ़ैसला लेते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से अपने राजदूतों का वापस बुलाने का एलान कर दिया.

'बेहद दोस्ताना रिश्ते'

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के लिए न्यूयॉर्क रवाना होने से पहले ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि फ्रांस को गठबंधन को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ब्रिटेन और फ्रांस के रिश्ते इतने मजबूत हैं कि उन्हें नुक़सान नहीं पहुंचाया जा सकता है.

बोरिस जॉनसन ने कहा कि ब्रिटेन और फ्रांस के 'बेहद दोस्ताना रिश्ते' रहे हैं और उसकी 'बहुत अहमियत' है.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, "फ्रांस के लिए हमारा प्यार कभी नहीं ख़त्म होने वाला है."

"ऑकस किसी भी तरह से नफ़े-नुक़सान को बराबर करने का खेल नहीं है. न ही इसका मक़सद किसी को दरकिनार करना है. ये ऐसा नहीं है कि इसे लेकर किसी को चिंता करने की ज़रूरत है और ख़ास तौर से हमारी फ्रांसीसी दोस्तों को तो बिलकुल नहीं."

ब्रितानी विदेश मंत्री की दलील

बोरिस जॉनसन के साथ इस दौरे पर नवनियुक्त विदेश मंत्री लिज़ ट्रूस भी जा रही हैं. लिज़ ट्रूस ने हाल ही में संडे टेलीग्राफ़ में ऑकस समझौते के बचाव में एक लेख लिखा था.

लिज़ ट्रूस का कहना है कि ये समझौता दिखाता है कि ब्रिटेन अपने हितों की रक्षा में किस हद तक सख़्त फ़ैसले लेने के लिए तैयार है. इस समझौते से नौकरियों के सैकड़ों अवसर पैदा होंगे.

इस बीच ऑस्ट्रेलिया ने भी ऑकस समझौते के लिए फ्रांस के साथ करार तोड़ने के अपने फ़ैसले का बचाव किया है.

ऑस्ट्रेलिया पर लगाए झूठ बोलने के आरोपों का प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने खारिज किया है. उन्होंने कहा कि फ्रांस को इसके लिए आगाह किया गया था और उसे करार तोड़े जाने की स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए था.

रविवार को स्कॉट मॉरीसन ने कहा, "आख़िरकार हमें इस बात पर फ़ैसला लेना था कि ऑस्ट्रेलियाई करदाताओं के पैसे से जो पनडुब्बियां बनाई जा रही थीं, वो उस काम को करने के लिए सक्षम होंगी या नहीं, जिस काम के लिए हमें इनकी ज़रूरत है. हमें विशेषज्ञों ने ये सलाह दी कि ये पनडुब्बियां ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं होंगी. हमने इसी बुनियाद पर ये रणनीतिक फ़ैसला लिया है."

इस समझौते के बाद ऑस्ट्रेलिया परमाणु पनडुब्बियों की ताक़स से लैस दुनिया का सातवां देश बन जाएगा. इस समझौते के तहत भागीदार देश आपस में अपनी साइबर क्षमताएं, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और अन्य सामुद्रिक टेक्नोलॉजी भी शेयर करेंगे.

क्या है 'ऑकस'

ऑकस यानी ऑस्टेलिया, यूके और यूएस. इन तीनों देशों के बीच हुए इस रक्षा समझौते को 'ऑकस' नाम दिया गया है. इसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर साझेदारी भी शामिल है.

ऑकस सुरक्षा समझौते पर एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया है, "ऑकस के तहत पहली पहल के रूप में हम रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा और ये हमारे साझा मूल्यों और हितों के समर्थन में तैनात होंगी."

इन पनडुब्बियों के मिलने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन सात देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिनके पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी. इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, भारत और रूस के पास ही ये तकनीक थी.

ये पनडुब्बियाँ पारंपरिक रूप से संचालित पनडुब्बियों से ज़्यादा तेज़ होंगी और और इनका पता लगाना बेहद कठिन होगा. ये महीनों तक पानी में डूबे रह सकती हैं और मिसाइलों से लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं.

ये समझौता इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले 50 सालों में अमेरिका ने अपनी सब-मरीन तकनीक, ब्रिटेन के अलावा किसी के साथ साझा नहीं की है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)