ऑस्ट्रेलिया से समझौते पर अमेरिका और ब्रिटेन की हो रही है आलोचना, फ़्रांस ने कहा ट्रंप की तरह हैं बाइडन

इमेज स्रोत, Getty Images
चर्चित ऑकस समझौते को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन को आलोचना झेलनी पड़ रही है. फ़्रांस और चीन ने कड़ी आपत्ति जताई है, तो यूरोपीय संध ने भी इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को सांसदों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा, तो अमेरिका ने भी इस पर स्पष्टीकरण दिया है.
एक तरफ़ जहाँ चीन ने इसे ग़ैर ज़िम्मेदार कहा है, वहीं फ़्रांस ने राष्ट्रपति जो बाइडन पर पीठ में छुरा भोंकने का आरोप लगाया है.
ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुए इस समझौते के तहत अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पन्नडुब्बी की तकनीक भी मुहैया करवाएगा.
इस समझौते की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ किया सौदा रद्द कर दिया है. वर्ष 2016 में ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए फ़्रांसीसी डिज़ाइन की 12 पनडुब्बियों के निर्माण का फ़्रांस को कॉन्ट्रैक्ट मिला था.
इस अनुबंध की लागत क़रीब 50 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर थी. यह सौदा ऑस्ट्रेलिया का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना गया था.
ऑकस समझौते से नाराज़ फ़्रांस ने यहाँ तक कह दिया है कि बाइडन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरह व्यवहार कर रहे हैं.
फ़्रांस के विदेश मंत्री यां इव्स ली द्रियां ने फ़्रांसइन्फ़ो रेडियो से बातचीत में कहा, "इस क्रूर, एकतरफ़ा और अप्रत्याशित फ़ैसले से ट्रंप की याद आती है, जो ऐसा ही करते थे. मैं ग़ुस्से में हूँ और मुझे कड़वा भी लगा है. सहयोगियों के बीच ऐसा नहीं होना चाहिए."
दो सप्ताह पहले ही ऑस्ट्रेलिया के रक्षा और विदेश मंत्रियों ने फ़्रांस के साथ समझौते को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताई थी. और फ़्रांस ने भी ऑस्ट्रेलिया के साथ भविष्य में और सहयोग की बात की थी.
ताज़ा घटनाक्रम पर फ़्रांस के विदेश मंत्री ने कहा, "ये पीठ में छुरा भोंकना है. हमने ऑस्ट्रेलिया के साथ भरोसे का रिश्ता बनाया था, लेकिन वो भरोसा अब टूट गया है."

इमेज स्रोत, JOSE LUIS ROCA
इस समझौते को लेकर फ़्रांसीसी राजनयिकों ने वॉशिंगटन में होने वाले एक समरोह को रद्द कर दिया है. ये कार्यक्रम अमेरिका और फ़्रांस के रिश्तों को लेकर होना था.
अमेरिका में फ़्रांस के पूर्व राजदूत जेरार्ड अरॉड ने बीबीसी वर्ल्ड टूनाइट प्रोग्राम में कहा- अमेरिका जानता था कि ये अनुबंध फ़्रांस के राष्ट्रीय हित में था, लेकिन अमेरिका ने इसकी परवाह नहीं की.
दूसरी ओर चीन ने भी ऑकस समझौते को लेकर अपनी नाराज़गी जताई है. चीन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ज़ाओ लिजियान ने कहा कि इस समझौते ने इंडो-पैसेफ़िक क्षेत्र की सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया है.
उन्होंने कहा, "इस प्रकार का सहयोग क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के साथ-साथ परमाणु अप्रसार की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को गंभीर रूप से कमज़ोर करता है."
लिजियान ने कहा, "ये समझौता ये भी दिखाता है कि कैसे ये देश परमाणु निर्यात को एक भूराजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. ये बेहद ग़ैर ज़िम्मेदाराना है. उन्हें शीत युद्ध की अपनी मानसिकता छोड़ देनी चाहिए और शांति और स्थिरता के लिए योगदान देना चाहिए. अन्यथा आख़िर में उन्हें ख़ुद ही नुक़सान होगा."
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी इस समझौते की आलोचना की है. अख़बार ने लिखा है कि ऑस्ट्रेलिया चीन का विरोधी बन गया है.

इमेज स्रोत, GREG BAKER
इस बीच विदेश नीति के लिए यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि जोसेप बोरेल ने कहा है कि ईयू को पहले ऑकस समझौते के बारे में नहीं बताया गया था.
उन्होंने कहा कि ऑकस समझौते की घोषणा यूरोपीय संघ को ये मौक़ा देती है कि वो अपनी "रणनीतिक स्वायत्तता" के बारे में सोच को आगे बढ़ाए.
इस समझौते को लेकर जानकार ये कह रहे हैं कि दरअसल ये चीन को घेरने की कोशिश है. लेकिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सांसदों से कहा कि इसका मक़सद चीन का विरोध नहीं है.
लेकिन ब्रिटेन की पूर्व पीएम टेरेसा मे बोरिस जॉनसन से ये सवाल किया था कि क्या इस सौदे से ब्रिटेन को चीन के साथ युद्ध में घसीटा जा सकता है?
उन्होंने प्रधानमंत्री से ताइवान पर चीन के आक्रमण की स्थिति में इस समझौते के असर के बारे में भी सवाल किया.
इसके जवाब में बोरिस जॉनसन ने कहा, "ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय क़ानून की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और यही सलाह हम दुनियाभर में अपने दोस्तों को देते हैं और यही सलाह हम चीन की सरकार को भी देंगे."
ताइवान अपने को एक स्वायत्त राष्ट्र मानता है, लेकिन चीन इसे अपना हिस्सा मानता है.
उधर अमेरिका ने इस समझौते को लेकर फ़्रांस की नाराज़गी को कम करने की कोशिश शुरू कर दी है.

इमेज स्रोत, ATTILA KISBENEDEK
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने फ़्रांस को एक अहम साझेदार कहा. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब भी फ़्रांस के साथ निकटता से मिलकर काम करेगा.
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी जेन साकी ने फ़्रांस की आलोचनाओं को ख़ारिज किया है.
उन्होंने कहा, "कई साझेदारियाँ हैं, जिनमें फ़्रांस शामिल है और कुछ ऐसी भी हैं, जिनमें फ़्रांस नहीं है. फ़्रांस भी कई ऐसे समझौते करता है, जिनमें अमेरिका नहीं है. दरअसल ये वैश्विक कूटनीति का हिस्सा है और ये ऐसे ही काम करता है."
ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री पीटर डटन ने चीन की प्रतिक्रिया को ख़ारिज किया है.
उन्होंने कहा, "ऐसा पहली बार नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया की स्थिति को लेकर चीन ने ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. हम अपने क्षेत्र के एक गौरवशाली लोकतंत्र है. हम स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने पड़ोसियों के साथ खड़े हैं और यह सहयोग इसे एक सुरक्षित क्षेत्र बनाता है. ये वास्तविकता है और कोई भी दुष्प्रचार इन तथ्यों को ख़ारिज नहीं कर सकता."
क्या है ऑकस

इमेज स्रोत, Getty Images
50 सालों में यह पहली बार है जब अमेरिका अपनी पनडुब्बी तकनीक किसी देश से साझा कर रहा है. इससे पहले अमेरिका ने केवल ब्रिटेन के साथ यह तकनीक साझा की थी.
इसका मतलब यह है कि ऑस्ट्रेलिया अब परमाणु-संचालित पनडुब्बियों का निर्माण करने में सक्षम होगा जोकि पारंपरिक रूप से संचालित पनडुब्बियों के बेड़े की तुलना में कहीं अधिक तेज़ और मारक होंगी. ये ख़ास पनडुब्बियां महीनों तक पानी के भीतर रह सकती हैं और लंबी दूरी तक मिसाइल दाग सकती हैं.
इससे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने एक संयुक्त वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में 'ऑकस' समझौते की जानकारी दी.
हालांकि इस दौरान किसी ने भी सीधे तौर पर चीन का उल्लेख नहीं किया था लेकिन तीनों नेताओं ने बार-बार क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताओं का ज़िक्र ज़रूर किया था.
ऑकस सुरक्षा समझौते पर एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया, "ऑकस के तहत पहली पहल के रूप में हम रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
विश्लेषकों का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तीन देशों के बीच हुआ यह गठबंधन (ऑकस) अब तक का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा समझौता है.
इस साझेदारी के बाद ऑस्ट्रेलिया के पास पहली बार परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी. इसका मतलब है कि ऑस्ट्रेलिया परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को संचालित करने वाला दुनिया का सातवां देश बन जाएगा.
अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, भारत और रूस के पास ही ये तकनीक पहले से मौजूद है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












