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तालिबान, मुजाहिदीन और अमेरिका: तीनों को एक साथ कैसे साधा हामिद करज़ई ने
- Author, ग्रिगोर एटानेस्यान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
काबुल में तालिबान के दाखिल होने से पहले ही राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश छोड़कर चले गए, लेकिन पिछले दो दशकों से अफ़ग़ानिस्तान के सबसे लोकप्रिय नेताओं में रहे पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई वहीं बने हुए हैं.
ये बात इसलिए भी मायने रखती है कि तालिबान ने उन्हें कई बार मारने की कोशिश की थी. करज़ई को निशाना बनाकर किए गए तालिबान के हमलों में उनके कई क़रीबी सहयोगी मारे जा चुके हैं.
अस्सी के दशक में करज़ई ने सोवियत फ़ौज से लोहा लिया था. नब्बे के दशक में वे मुजाहिदीनों की सरकार में शामिल हुए. हामिद करज़ई ने तालिबान का भी समर्थन किया था. लेकिन जब तालिबान ने उनके पिता की हत्या कर दी तो उनका रुख़ बदल गया.
तालिबान की हार के बाद करज़ई ने अमेरिका के समर्थन से अफ़ग़ानिस्तान की बागडोर संभाली, लेकिन ऐसा वक़्त भी आया जब वे अमेरिका की नज़र से उतर गए.
इस 15 अगस्त को जब तालिबान काबुल में दाखिल हो रहे थे तो विदेशी सैनिक और नागरिक, डिप्लोमैट्स और बड़ी संख्या में अफ़ग़ान लोग उसी एयरपोर्ट के रास्ते आनन-फ़ानन में देश छोड़ रहे थे जिसका नाम पूर्व राष्ट्रपति करज़ई के नाम पर है.
लेकिन हामिद करज़ई ने फ़ैसला किया कि वो इस शहर और मुल्क की सियासत में बने रहेंगे.
तालिबान और मुजाहिदीनों के साथ
हामिद करज़ई पश्तूनों की दुर्रानी बिरादरी से आते हैं जिन्हें पोपलज़ई भी कहा जाता है. एकीकृत अफ़ग़ानिस्तान के गठन के पीछे उनकी बिरादरी की अहम भूमिका रही है.
उनके नेता अहमद शाह दुर्रानी अफ़ग़ानिस्तान पर हुक़ूमत करने वाले दुर्रानी साम्राज्य के पहले शाह थे. उन्होंने 1747 में कंधार में अपने साम्राज्य की नींव रखी थी.
हामिद करज़ई के पिता अब्दुल अहद करज़ई आख़िरी अफ़ग़ान बादशाह ज़ाहिर शाह के क़रीबी सहयोगी थे. वे अफ़ग़ान संसद के डिप्टी स्पीकर भी रहे. हामिद करज़ई का रुझान राजशाही के लिए बना रहा. सत्ता में आने के बाद उन्होंने राजशाही के झंडे को फिर से अपनाया और ज़ाहिर शाह को 'राष्ट्रपिता का दर्जा' देने का एलान किया.
सोवियत फ़ौज जब अफ़ग़ानिस्तान पहुंची तो करज़ई का परिवार पाकिस्तान के क्वेटा शहर चला आया जहां से उन्होंने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ अपना विरोध जारी रखा.
हामिद करज़ई बाद में मुजाहिदीनों के एक संगठन से जुड़ गए. उन्होंने जंग में हिस्सा तो नहीं लिया, लेकिन वे प्रेस सचिव और इंटरप्रेटर की भूमिका निभाते रहे. उन्होंने भारत में पढ़ाई की थी. हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़्रेंच, पश्तो और दारी जैसी ज़ुबानों पर उनकी अच्छी पकड़ है.
साल 1992 में रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अफ़ग़ानिस्तान की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार को हथियारों की आपूर्ति बंद कर दी जिसके बाद मुजाहिदीनों ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया. उस वक़्त के राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह ने भागकर संयुक्त राष्ट्र के दफ़्तर में पनाह ली जहां वे तालिबान के आने तक चार सालों तक छुपे रहे. तालिबान ने उनकी हत्या करके उनकी लाश को राष्ट्रपति भवन के बाहर एक ट्रैफ़िक लाइट पर लटका दिया था.
मुजाहिदीनों की सरकार में हामिद करज़ई उप-विदेश मंत्री बनाए गए. लेकिन अलग-अलग धड़ों के बीच मतभेद के कारण करज़ई को काबुल छोड़ना पड़ा.
साल 1996 में पाकिस्तान में अपने पिता के घर से उन्होंने तालिबान को सत्ता पर क़ाबिज़ होते हुए देखा. देश के नए हुक्मरानों से उनकी सहानुभूति भी थी. और एक वक़्त तो संयुक्त राष्ट्र में तालिबान के अनौपचारिक राजदूत के तौर पर उन्हें भेजने के लिए विचार भी किया जा रहा था.
साल 1998 में हामिद करज़ई ने कहा था, "तालिबान में कुछ बहुत अच्छे लोग थे, कई उदारवादी और वतनपरस्त लोग थे. लेकिन अरबों और पाकिस्तानियों ने उन्हें ख़राब कर दिया."
तालिबान के ख़िलाफ़ पश्चिमी ताक़तों के साथ
साल 1999 में करज़ई के पिता की हत्या कर दी गई. इस हत्या के पीछे तालिबान का हाथ बताया गया. उस वक़्त तक उनके बड़े भाई अमेरिका सेटल हो गए जहां उनका अफ़ग़ान रेस्तरां चेन है.
हामिद करज़ई को अपने कबीले का नया नेता चुना गया. अगले कुछ साल हामिद करज़ई ने पश्चिमी देशों के साथ संपर्क स्थापित करने में गुजारे. इस्लामाबाद में तैनात रह चुके राजनयिक बताते हैं कि हामिद करज़ई तालिबान के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों के दूतावास जाकर समर्थन जुटाने की मुहिम में लग गए.
साल 2001 में जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोला तो करज़ई अपने वफ़ादार लड़ाकों के साथ देश वापस लौटे. माना जाता है कि तब तक उन्हें अमेरिका का समर्थन मिल गया था. ख़ासकर इस्लामाबाद का सीआईए ब्यूरो उनके साथ था.
उसी साल 5 दिसंबर को उनका कारवां ग़लती से अमेरिकी गोलाबारी की जद में आ गया. हालांकि वे मामूली चोटों के साथ बच गए, लेकिन इस हमले में कई लोगों की मौत हुई थी.
उसी दिन जर्मनी के बॉन शहर में संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में एक कॉन्फ़्रेंस हुआ जिसमें अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक दल हिस्सा ले रहे थे. उस कॉन्फ़्रेंस में हामिद करज़ई को अंतरिम सरकार के प्रमुख के तौर पर चुना गया. करज़ई याद करते हैं कि ये जानकारी उन्हें बीबीसी के एक संवाददाता ने दी थी.
उन्होंने न्यूयॉर्कर को एक इंटरव्यू में बताया, "अस्पताल में नर्स ख़ून से सना मेरा चेहरा साफ़ कर रही थी. तभी फ़ोन की घंटी बजी और जब मैंने फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ बीबीसी संवाददाता लीस ड्यूसेट थीं. उनके पास बॉन से मेरे लिए ख़बर थी. उन्होंने कहा, आपको सरकार का प्रमुख चुना गया है."
अगली गर्मियों में उन्हें देश का अंतरिम राष्ट्रपति बना दिया गया.
करज़ई का दशक
हामिद करज़ई ने 13 साल तक देश की बागडोर संभाली. साल 2001 के आख़िर में वे कार्यकारी राष्ट्रपति बने. साल 2004 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता और साल 2009 में वे फिर से चुने गए.
करज़ई के दौर में अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा बंटा हुआ, बिखरा मुल्क बना रहा जिसमें ताक़तवर क्षत्रपों की अहम भूमिका थी और ये क्षत्रप अपने वफ़ादार कुनबों के बलबूते पर ताक़तवर बने हुए थे.
करज़ई हुक़ूमत की सत्ता का दायरा इतना सीमित था कि कुछ लोग मज़ाक में उन्हें 'काबुल का मेयर' तक कहते थे. दशकों तक चले गृह युद्ध के कारण अफ़ग़ान सूबों पर वॉरलॉर्ड्स का दबदबा था जिनके अपने लड़ाके हुआ करते थे.
साल 2001 में अमेरिका ने इन्हीं ताक़तों का इस्तेमाल तालिबान को हराने के लिए किया और जब लड़ाई ख़त्म हुई तो उन्हें करज़ई के साथ सत्ता में हिस्सेदारी मिली.
लीजेंड कहे जाने वाले कमांडर अब्दुल रशीद दोस्तम जिनका नाम युद्ध अपराधों में शामिल रहा था, वे करज़ई कैबिनेट में मंत्री बने. इसके ठीक उलट करज़ई एक राजनेता थे, न कि कोई फ़ील्ड कमांडर.
उनकी सत्ता के स्रोत अमेरिका और नेटो के सदस्य देशों के सैनिक थे.
शोधकर्ताओं का कहना है कि तीस साल पहले सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान में जो किया था, अमेरिका ने उसी तर्ज़ पर वहां एक कठपुतली सरकार को बिठा दिया.
आधिकारिक सरकार के समांतर अमेरिकी सलाहकारों और अफ़ग़ानिस्तान रिकंस्ट्रक्शन टीम के लोग काबुल में इकट्ठा हो गए. विशेषज्ञ इन लोगों को 'शैडो गवर्नमेंट' (परदे के पीछे से सरकार चलाने वाले लोग) कहते थे.
अमेरिका नई सरकार के हर क़दम को कंट्रोल करना चाहता था. कई बार जानलेवा हमलों की जद में आ चुके करज़ई लंबे समय तक राष्ट्रपति भवन से बाहर नहीं निकले. एक प्राइवेट मिलिट्री कंपनी के अमेरिकी अंगरक्षकों का दस्ता उनकी हिफ़ाज़त में लगा रहता था.
कई लोगों ने उनके इस रवैये को अपने लोगों पर भरोसा न होने के संकेत के तौर पर देखा.
विदेशी मदद जल्द ही करज़ई के लिए बोझ बन गया, लेकिन अमेरिका के साथ उनके रिश्ते बेहतर रहे. करज़ई के दोस्त और अफ़ग़ान मूल के अमेरिकी नागरिक ज़ालमई ख़लीलज़ाद अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के राजदूत बनाए गए. खलीलज़ाद अस्सी के दशक में मुजाहिदीनों और अमेरिका के बीच संपर्क सूत्र की भूमिका निभा चुके थे.
खलीलज़ाद ने अफ़ग़ानिस्तान में नए संविधान को तैयार करने के काम में हिस्सा लिया. ये संविधान अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की नीतियों को ज़्यादा लागू करता हुआ मालूम देता था. पत्रकार ज़ालमाई खलीलज़ाद को 'वायसराय' कहा करते थे और ऐसी रिपोर्टें भी आईं कि राष्ट्रपति अमेरिकी राजदूत के साथ हफ़्ते में तीन बार खाना खाते हैं.
साल 2005 में खलीलज़ाद को इराक़ का राजदूत बना दिया गया. लेकिन खलीलज़ाद के बाद आए अमेरिकी राजदूत के लिए चीज़ें बदल गई थीं. करज़ई का भरोसा अमेरिकी डिप्लोमैट्स पर डिगने लगा था.
उसी साल करज़ई अमेरिका के दौरे पर गए. वहां उन्होंने विदेशी सैनिकों की कमान अपने हाथ में लेने की पूरी कोशिश की. इसकी वजह ये थी कि अमेरिकी सैनिकों ने दो अफ़ग़ान क़ैदियों को पीट-पीट कर मार दिया था.
करज़ई, ब्रिटेन और अमेरिका
अफ़ग़ानिस्तान में ये माना जाता है कि सबसे मुश्किल काम नशीले पदार्थों की तस्करी के ख़िलाफ़ लड़ाई है. अमेरिका ने हेलमंद की ज़िम्मेदारी ब्रिटेन को सौंपी थी.
करज़ई ने शेरा कबीले के नेता मोहम्मद अख़ुंदज़ादा को हेलमंद का गवर्नर बनाया. ब्रिटेन को ये अंदेशा था कि वे नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल हैं. साल 2005 में अखुंदज़ादा के घर से नौ टन नशीले पदार्थों की बरामदगी हुई.
ब्रिटेन के कहने पर मोहम्मद अख़ुंदज़ादा को हेलमंद के गवर्नर पद से हटा दिया गया. करज़ई ने उन्हें दोबारा से गवर्नर बनाने की कोशिश की, लेकिन ब्रिटेन ने ऐसा होने नहीं दिया. इसके ठीक बाद हेलमंद में अंतरराष्ट्रीय बलों और तालिबान के बीच ख़ूनी संघर्ष का सिलसिला शुरू हो गया.
बाद में मोहम्मद अखुंदज़ादा ने ये माना कि उन्होंने अपने 3000 लड़ाकों को तालिबान के पास भेज दिया था क्योंकि वे ख़ुद ऐसा नहीं कर सकते थे. पश्चिमी देशों को करज़ई के सौतेले भाई अहमद वली पर संदेह था कि वे नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल हैं.
मीडिया रिपोर्टों में अहमद वली का नाम अफ़ीम और हेरोइन की तस्करी से जोड़ा जाता था. अमेरिकी डिप्लोमैट्स ने अपना संदेश करज़ई के साथ शेयर भी किया. अहमद वली पर अमेरिका में आपराधिक मुक़दमा चल रहा था. साल 2011 में एक बॉडीगार्ड ने उन्हें गोली मार दी.
मोहम्मद अख़ुंदज़ादा और अहमद वली पर साल 2009 के अफ़ग़ान चुनावों में धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया था. ये वही चुनाव थे जिनमें करज़ई दोबारा चुनकर राष्ट्रपति बने थे.
अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि रहे पीटर गॉलब्रायथ ने चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप लगाया, लेकिन इस बयान के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया.
इससे एक साल पहले अमेरिका में भी राष्ट्रपति चुनाव हुए थे. करज़ई के रिश्ते नई अमेरिकी हुकूमत के साथ पहले जैसे नहीं रहे. काबुल में उनके शपथ ग्रहण समारोह में ओबामा प्रशासन की टीम ने हिस्सा नहीं लिया.
साल 2008 में हिलेरी क्लिंटन ने अफ़ग़ानिस्तान को ड्रग स्टेट करार दिया और करज़ई हुक़ूमत पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया.
इसके बाद करज़ई अमेरिका के दोस्त से आलोचक बन गए. उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन पर साम्राज्यवादी रवैया रखने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा कि पश्चिमी ताक़तें तालिबान के साथ गुपचुप तरीके से साठगांठ कर रही हैं.
काबुल का पतन
सत्ता छोड़ने के बाद करज़ई काबुल में ही एक सरकारी इमारत में सुरक्षा घेरे के बीच रहने लगे. अपने पुराने आकाओं के ख़िलाफ़ उनकी शिकायतें जारी रहीं.
उन्होंने कहा कि अल-क़ायदा ने कभी भी अफ़ग़ानिस्तान से काम नहीं किया और न ही अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन से सितंबर 11 के हमलों को अंजाम दिया.
उन्होंने कहा कि इस्लामिक स्टेट अमेरिका का औज़ार है और वे अमेरिका और आईएस के बीच कोई फ़र्क़ नहीं देखते हैं.
साल 2018 में करज़ई ने ट्रंप प्रशासन और तालिबान के बीच की बातचीत का समर्थन किया. शायद इसकी वजह ये थी कि उनके पुराने दोस्त ख़लीलज़ाद इस बातचीत के लिए ज़िम्मेदार थे.
करज़ई ने तालिबान के साथ संपर्क बनाने की भी कोशिश की. साल 2019 में वे मॉस्को में अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य पर आयोजित एक कॉन्फ़्रेंस में हिस्सा लिया जिसमें तालिबान के नेता भी शामिल थे.
उस वक़्त हामिद करज़ई ने कहा, "तालिबान भी अफ़ग़ान हैं. उन्होंने भी दूसरे अफ़ग़ानों की तरह कुछ कम नहीं खोया है. उनके बच्चों की भी जान गई है. उनके घर भी उजड़े हैं. उन पर भी बम गिराये गए हैं. गोलियां चलाई गई हैं. उनके घरों की भी तलाशी ली गई है."
काबुल में तालिबान के दाख़िल होने और राष्ट्रपति ग़नी के मुल्क छोड़ने के बाद भी करज़ई वहीं बने हुए हैं. उनके राजनीतिक विरोधी अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी काबुल में ही हैं.
एक समावेशी सरकार के गठन के लिए तालिबान करज़ई और अब्दुल्ला दोनों से बातचीत कर रहा है. करज़ई ने अपने घर के बाहर से एक वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया. उनकी बेटियां उनके साथ खड़ी थीं. उन्होंने वादा किया है कि वे काबुल नहीं छोड़ेंगे और सत्ता हस्तांतरण को शांतिपूर्वक तरीके से कराने की कोशिश करेंगे.
तालिबान ने हक़्क़ानी नेटवर्क के अनस हक़्क़ानी और करज़ई के साथ मीटिंग की तस्वीरें शेयर की हैं.
हालांकि उस बीच सीएनएन टेलीविज़न की एक रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि करज़ई और अब्दुल्ला अब्दुल्ला को घर में नज़रबंद कर दिया गया है, लेकिन इस ख़बर का खंडन आने में ज़्यादा देर नहीं लगी.
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